एक आम सी प्रेम कहानी
भाग - ७
लेखिका "अनामिका"
स्क्रीन पर चमकते अनजान नंबर को देखकर निहारिका का दिल ज़ोर से धड़क उठा। एक उम्मीद के साथ उसने झट से कॉल उठाया।
"हेलो?" उसकी आवाज़ में उत्सुकता साफ़ झलक रही थी।
"हेलो..." दूसरी तरफ़ से मलय की आवाज़ आई।
उस एक शब्द ने जैसे दोनों को वहीं थाम दिया। दोनों तुरंत समझ गए कि फोन पर कौन है। अगले कुछ सेकंड तक दोनों तरफ़ सिर्फ़ एक गहरी खामोशी तैरती रही—ऐसी खामोशी जिसमें बिना कहे बहुत कुछ बयाँ हो रहा था।
आख़िरकार मलय ने चुटकी लेते हुए खामोशी तोड़ी, "लगता है मेरा ही इंतज़ार कर रही थी?"
निहारिका ने झेंपते हुए तुरंत संभलकर जवाब दिया, "जी नहीं! मैं भला आपका इंतज़ार क्यों करने लगी? कोई काम-धंधा नहीं है क्या मुझे?"
"अच्छा? पर कॉल तो तुमने पहली ही रिंग में उठा लिया," मलय ने हँसते हुए छेड़ा।
"वो तो बस इत्तेफाक था! फोन हाथ में ही था," निहारिका ने थोड़ा शर्माते हुए कहा।
मलय के होठों पर एक मुस्कान तैर गई, "चलो मान लिया इत्तेफाक था। वैसे, कैसी हो?"
"मैं ठीक हूँ। आप बताइए, अचानक कैसे याद किया?"
"बस ऐसे ही... सोचा पूछ लूँ कि पढ़ाई कैसी चल रही है," मलय ने सहज अंदाज़ में कहा।
"मेरी पढ़ाई एकदम बढ़िया चल रही है," निहारिका ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
इसी तरह की छोटी-मोटी मीठी नोक-झोंक और हँसी-मज़ाक के बीच दोनों की बातें चलती रहीं। उस दिन की वो पहली छोटी सी बातचीत, उन दोनों के बीच एक नए रिश्ते की शुरुआत कर चुकी थी।
दोनों की बातचीत हंसी-मजाक और नोक-झोंक के साथ आगे बढ़ रही थी।
"तुम्हें पता है मलय, तुम बातें बहुत कम और टांग ज्यादा खींचते हो!" निहारिका ने हंसते हुए कहा।
"और तुम चिढ़ती बहुत जल्दी हो," मलय ने तुरंत चुटकी ली।
अचानक दोनों को ख्याल आया कि अगले दिन सुबह मलय को कल ऑफिस और निहारिका को कॉलेज जाना है।
सोने से पहले मलय ने झिझकते हुए पूछा, "क्या हम इस संडे मिल सकते हैं?"
सवाल सुनते ही निहारिका थोड़ी घबरा गई और संभलकर बोली, "क्यों, क्यों मिलना है? कोई खास वजह?"
मलय ने बात को संभालते हुए सहजता से कहा, "बस ऐसे ही... सामने बैठकर थोड़ी और टांग खींचनी है तुम्हारी! खैर, अगर तुम्हारा मन नहीं है, तो कोई बात नहीं, रहने दो।"
निहारिका ने उसकी बात काटते हुए तुरंत कहा, "नहीं-नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है... मैं कब मना कर रही हूं!"
थोड़ी सी हिचकिचाहट और मुस्कुराहट के बाद आखिरकार दोनों ने आने वाले रविवार को मिलने का प्लान पक्का कर लिया।
रविवार की शाम ढलते ही दोनों के दिलों में एक अजीब सी हलचल बढ़ने लगी थी।
मलय से मिलने की बेताबी में निहारिका ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी बार-बार अपना दुपट्टा सेट कर रही थी। इतने दिनों बाद उससे दोबारा मिलने की खुशी उसके चेहरे पर साफ चमक रही थी। वह कभी बालों की लट संवारती, तो कभी आईने में खुद को निहारकर मुस्कुरा देती। अपने लुक्स को लेकर उसके मन में एक हल्की सी घबराहट भी थी, इसीलिए वह दो-तीन बार आईने के सामने जाकर खुद को सही से देखती है।
उधर कैफे की एक कोने वाली टेबल पर बैठा मलय बेसब्री से निहारिका का इंतजार कर रहा था। वह हर दो मिनट में अपनी कलाई घड़ी पर नजर दौड़ाता और फोन की स्क्रीन में देखकर बार-बार अपने बाल ठीक करता। टेबल पर रखी कॉफी ठंडी हो रही थी, लेकिन उसका पूरा ध्यान सिर्फ कैफे के मुख्य दरवाजे पर था। हर बार दरवाजा खुलते ही उसकी नजरें टिक जातीं और सांसें थम जातीं कि शायद वही आई हो। दोनों तरफ बेसब्री अपने चरम पर थी।
जैसे ही निहारिका अंदर आई, दोनों की नज़रें मिलीं और कुछ पलों के लिए मानों सब ठहर सा गया। दोनों बिना कुछ बोले बस एक-दूसरे को देखते रहे। फिर मलय ने झिझकते हुए चुप्पी तोड़ी, "क्या लेना पसंद करोगी?"
निहारिका ने मुस्कान दबाते हुए कहा, "जो आप मँगवा दें, वैसे भी देरी तो आपकी वजह से हुई है।"
"मेरी वजह से? मैं तो आधे घंटे से बैठा यहाँ टेबल का कोना घिस रहा हूँ!" मलय ने हैरानी का नाटक किया।
"हाथ में घड़ी किसलिए पहनी है फिर? दो मिनट पहले आने को टाइम पर आना नहीं कहते," निहारिका ने शिकायत वाले अंदाज़ में मुँह बनाया।
"अच्छा बाबा गलती हो गई, अब दो कॉफ़ी के साथ आपकी ये प्यारी सी डाँट का बिल भी मैं ही भर देता हूँ," मलय ने मुस्कुराते हुए कहा।
निहारिका अपनी हँसी नहीं रोक पाई। कॉफ़ी की चुस्कियों के बीच उनकी यह मासूम सी नोंक-झोंक और मीठी तकरार यूँ ही चलती रही।
उन छोटी-छोटी मुलाकातों और देर रात के मैसेजेस ने उनके बीच की दूरियों को मिटा दिया था। दिन भर की थकान के बाद एक-दूसरे की आवाज़ सुनना ही उनके लिए सुकून का जरिया बन गया।
बिना किसी बड़े वादे के, उनका रिश्ता खामोशी में भी एक-दूसरे की नीयत और परवाह को महसूस करने लगा था। यह सिर्फ प्यार नहीं, बल्कि एक ऐसा गहरा भरोसा बन चुका था जहाँ शब्द कम और जज़्बात ज़्यादा बोलने लगे थे।
सातवां भाग समाप्त, कहानी जारी हे.....