एक आम सी प्रेम कहानी - 5 Anamika द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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एक आम सी प्रेम कहानी - 5

एक आम सी प्रेम कहानी 

भाग - ५

लेखिका "अनामिका"

गर्मी की छुट्टियां बीत चुकी थीं। कॉलेज में थर्ड ईयर के पहले दिन कदम रखते हुए ​मलय के मन में एक अजीब सी बेचैनी थी। वह रोज की तरह बस स्टॉप की तरफ बढ़ा, लेकिन वहां का नजारा देखकर उसके कदम वहीं जम गए।

​निहारिका आज सड़क के उस पार नहीं, बल्कि सीधे उसी के स्टॉप पर खड़ी थी। स्कूल यूनिफॉर्म की जगह सादे कपड़ों में वह बेहद शांत और अलग लग रही थी। 10थ क्लास में कदम रख चुकी निहारिका के चेहरे पर घबराहट थी, लेकिन इस बार उसने अपनी झिझक को दरकिनार कर दिया। उसने खुद कदम बढ़ाए और मलय के करीब आकर खड़ी हो गई।

​दोनों के दिलों की धड़कनें तेज थीं। जब नजरें मिलीं, तो चेहरों पर एक भीनी सी मुस्कान तैर गई—बिना कहे ही ढेरों बातें हो गईं। पर निहारिका की आंखों में खुशी के साथ एक गहरी बेबसी छाई थी।

​मलय ने फिक्र के साथ पूछा, "सब ठीक तो है?"

​निहारिका ने हल्की सी उदासी के साथ कहा, "नाइंथ के एग्जाम्स के बाद घरवालों ने मेरा एडमिशन हॉस्टल में करवा दिया है... मैं 10थ की पढ़ाई वहीं से करूंगी। आज बस तुमसे मिलने आई थी।"

​यह सुनते ही मलय के चेहरे की रंगत उड़ गई। दोनों के बीच एक भारी सन्नाटा छा गया। अब तक भले ही खुलकर बातें न होती हों, लेकिन रोज दूर से ही सही, एक-दूसरे को देख लेने का एक सुकून तो था। अब वह आखिरी सहारा भी छिन रहा था। वे दोनों बेबस होकर एक-दूसरे को देखते रहे, यह जानते हुए कि वक्त के इस फैसले के आगे वे कुछ नहीं कर सकते।

°लड़के का नजरिया ( मलय: उसका आंतरिक संघर्ष)

​जब उसने कहा कि वह हॉस्टल जा रही है, तो मेरे सीने में जैसे कोई भारी पत्थर आ गिरा। अचानक मेरे आसपास का सारा शोर मद्धम पड़ गया और सिर्फ एक गहरी, डरावनी खामोशी रह गई। मैं कुछ कहना चाहता था—उसे रोकना चाहता था, किस्मत से लड़ना चाहता था—लेकिन जानता था कि मेरे शब्द बेबस हैं।

​उस भीड़-भाड़ वाली जगह पर, जब मैंने हिम्मत जुटाकर उसका हाथ थामा, तो वह सिर्फ एक उंगलियों का उलझना नहीं था। वह मेरा उसे थामे रखने का आखिरी प्रयास था। उसकी ठंडी पड़ती हथेलियों में मुझे अपनी ही बेबसी का अहसास हुआ। तभी दूर से मेरी बस की हॉर्न सुनाई दी और उसकी लाइटें हमारे सामने आकर रुक गईं। उस एक पल ने दिल तोड़ दिया, क्योंकि उसके भी घर लौटने का वक्त हो चला था। हम दोनों एक ही राह पर साथ खड़े थे, फिर भी दूरियों की आहट हमारे बीच आ चुकी थी। मेरा मौन चीख-चीख कर कह रहा था—"काश मैं वक्त को यहीं रोक पाता।"

​°लड़की का नजरिया ( निहारिका: खामोश टीस )

​हॉस्टल जाने की बात मेरे होंठों से निकली ही थी कि उसकी आँखों में एक सन्नाटा छा गया। उस सन्नाटे ने मुझे अंदर तक तोड़ दिया। हम अगल-बगल खड़े थे, इतने करीब कि उसकी साँसों की तपिश महसूस हो रही थी, फिर भी किस्मत ने हमारे बीच एक अनकही दूरी खींच दी थी।

​जब उसने कांपते हाथों से मेरा हाथ थामा, तो दिल किया कि बस रो पड़ूँ। उसके उस एक स्पर्श में कितना डर, कितना प्यार और कितनी उदासी छिपी थी, यह बिना एक भी शब्द कहे मुझे समझ आ रहा था। लेकिन तभी उसकी बस सामने आकर खड़ी हो गई, और मुझे भी याद आया कि मेरे घर जाने का समय हो चुका है। वक्त की इस बेरहमी ने हमारे हाथों की पकड़ को ढीला करने पर मजबूर कर दिया। उस भीड़ भरे शहर में, हम दोनों अपने ही दुखों के घेरे में एक मूक मूर्ति की तरह खड़े थे। उसकी उंगलियों की पकड़ मुझे बता रही थी कि बिछड़ना जितना मुश्किल मेरे लिए है, उतना ही उसके लिए भी।

दोनों के मिलने के ठीक अगले दिन जब निहारिका हॉस्टल के लिए पापा के साथ निकली तो पापा ने वही रास्ता लिया जिस रास्ते मे वो बसस्टॉप पड़ता हे।

​जैसे ही ट्रैफिक लाइट लाल हुई, पापा की कार बस स्टॉप के ठीक सामने आकर थम गई। उसी पल उसकी नज़रें बाहर गईं और मलय की बेबस निगाहों से जा टकराईं।

​निहारिका का दिल एक पल को रुक सा गया। पापा की बगल में बैठे-बैठे उसने चुपचाप खिड़की से बाहर देखा—सामने वही जाना-पहचाना चेहरा खड़ा था। उसके भीतर एक तूफान सा उठा कि काश कार से उतरकर वह उससे कह पाती कि वह जाना नहीं चाहती, पर पापा की मौजूदगी ने उसके कदमों और ज़ुबान दोनों को बांध रखा था। जब उसकी आँखों का बाँध टूटा और आँसू छलके, तो उसमें बिछड़ने का खौफ और अनकही तड़प साफ़ झलक रही थी।

​उधर बस स्टॉप पर खड़े मलय का कलेजा कार के रुकते ही मुँह को आ गया। निहारिका की ढलकती बूँद को देखकर उसकी बेबसी और गहरी हो गई—वह न पुकार सकता था, न ढांढस बंधाने के लिए हाथ बढ़ा सकता था। वह बस अपनी तरसती निगाहों से उसे यह यक़ीन दिलाना चाहता था कि यह जुदाई चाहे जितनी लंबी हो, उसकी भावनाएँ वही रहेंगी।

​तभी सिग्नल हरा हुआ, कार धीरे से आगे बढ़ गई, और पीछे छूट गया एक अनिश्चित इंतज़ार और कार के पिछले शीशे से टकटकी लगाए दो ख़ामोश दिल। वो मिलने से पहले हि बिछड़ गये कब तक पता नहीं। उन्हे ये भी पता नहीं था के आगे कभी मुलाक़ात होगी या नहीं। 

पांचवा भाग समाप्त, कहानी जारी हे.....