अजूबा मिलन - भाग 3 Ratna Pandey द्वारा रोमांचक कहानियाँ में हिंदी पीडीएफ

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अजूबा मिलन - भाग 3

अभी तक आपने पढ़ा कि रात को डॉक्टर कपिल के घर शरण लेने वाली लड़की गरिमा सुबह जब अपना चेहरा धोकर सामने आती है, तो शालिनी उसे देखकर दंग रह जाती है क्योंकि दोनों का चेहरा और रंग-रूप बिल्कुल एक जैसा था। दोनों को हूबहू जुड़वाँ बहनों की तरह सामने देखकर डॉक्टर कपिल और रूपा भी हैरान रह जाते हैं। गरिमा के पिता के साथ न रहने वाली बात याद आते ही, इस अद्भुत हम शक्ल रहस्य का सच जानने के लिए कपिल गरिमा से उसके परिवार की सच्चाई पूछते हैं। अब इसके आगे: -

शालिनी और गरिमा के एक जैसे चेहरे देखकर मानो उनके पैरों के नीचे से ज़मीन ही खिसक गई हो। तब उन्होंने और पास आकर देखा, तो उन्हें एक जैसे दोनों चेहरों पर विश्वास करना ही पड़ा। गरिमा भी यह देखकर हैरान थी। वह भी आश्चर्यचकित थी। ऐसा कैसे हो सकता है? ऐसा तो सिर्फ़ जुड़वां भाई-बहनों का ही हो सकता है। सब एक-दूसरे को हैरान होकर देख रहे थे।

रूपा और कपिल तो मानो होश में ही नहीं थे। रूपा शंका भरी नजरों से कपिल को देख रही थी। उसका गुस्सा सातवें आसमान पर था। उसके ऊपर शक और साथ ही विश्वासघात का पहाड़ टूट पड़ा था। कपिल भी हैरान परेशान था। उसने भी रूपा की तरफ़ देखकर आश्चर्य भरा चेहरा बनाया। वह कुछ कहे, उससे पहले ही रूपा गुस्से में तमतमाता चेहरा लेकर वहाँ से नीचे जाने लगी।

गरिमा और शालिनी दोनों कभी एक-दूसरे को देख रही थीं, तो कभी कपिल और रूपा के चेहरे को। रूपा के जाते ही कपिल भी नीचे जाने लगा। अब कमरे में शालिनी और गरिमा दोनों अकेली थीं।

शालिनी ने पूछा, "कौन हो तुम और यहाँ कैसे आईं?"

गरिमा ने उसे रात की पूरी बात बता दी और कहा, "लेकिन मैं तुम्हारे पापा-मम्मी को नहीं जानती। मैंने तो आज पहली बार उन्हें देखा है। मुझे भी कुछ समझ में नहीं आ रहा है क्योंकि हम दोनों तो बिल्कुल जुड़वां बहनों की तरह लग रहे हैं।"

उधर नीचे पहुँचते ही रूपा और कपिल के बीच युद्ध की शुरुआत हो चुकी थी।

नाराज रूपा ने कहा, "कौन है इस लड़की की माँ? बताओ मुझे। शालिनी को तो मैंने जन्म दिया है, इसलिए वे जुड़वा नहीं हैं मैं जानती हूँ, पर दोनों बिल्कुल एक जैसी हैं। मानो हमारी शालिनी आईने के सामने खड़ी हो ऐसा लगता है और शालिनी तो बिल्कुल तुम्हारी तरह दिखती है। इसका मतलब वह गरिमा भी तुम्हारी ही बेटी है। मैं तुम्हें क्या समझती थी और तुम क्या निकले?"

"रूपा ... रूपा ... रूपा, तुम अकेली ही बोलती जाओगी या मुझे भी मेरी सफ़ाई में कुछ कहने का मौका दोगी? मैं तुमसे सच कह रहा हूँ, यह लड़की कौन है, कहाँ से आई है, वह मेरे जैसी कैसे और क्यों दिखती है? इस बारे में जितनी अनजान तुम हो, उतना ही मैं भी हूँ। मेरा तुम्हारे सिवाय कभी किसी के साथ इस तरह का संपर्क नहीं रहा है। मैं सच कह रहा हूँ।"

"कपिल, झूठ मत बोलो। प्रत्यक्ष को अब किसी भी प्रमाण की ज़रूरत नहीं है। आज बेटी आई है, हो सकता है कल वह भी आ जाए। यह भी तो हो सकता है कि इस लड़की को यहाँ जानबूझकर भेजा गया हो।"

"रूपा, तुम यह कैसी बातें कर रही हो? वह लड़की यहाँ कैसी हालत में आई थी, यह जानते हुए भी तुम कुछ भी सोच रही हो?"

"अच्छा, तो अब उसके आते से आप उसकी तरफदारी भी करने लगे?"

रूपा के पास जाकर कपिल ने उसके सर पर हाथ रखते हुए कहा, "रूपा, मेरा विश्वास करो, वह कौन है, मैं नहीं जानता।"

"कपिल, मैं गाँव की गंवार या अनपढ़ नहीं हूँ। सर पर हाथ रखकर क़सम खाकर मुझे गुमराह करने की कोशिश मत करो, समझे? मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रहूंगी। मैं शालिनी को लेकर यहाँ से चली जाऊंगी। इतना बड़ा धोखा मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी।"

✍️ रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः