अभी तक आपने पढ़ा कि रात के दो बजे डॉक्टर कपिल और उनकी पत्नी रूपा के घर एक डरी-सहमी अनजान लड़की मदद की गुहार लगाते हुए अचानक बेहोश होकर गिर पड़ती है। होश में आने पर वह बताती है कि रात को कुछ अनजान गुंडे उसके घर में घुस कर उसका अपहरण करने की कोशिश कर रहे थे, जिनसे बचकर वह भाग रही है। गुंडों के साये और अचानक आई इस मुसीबत के बीच, डॉक्टर कपिल उस बेबस लड़की को अपने घर में सुरक्षा देने का फैसला करते हैं। अब इसके आगे: -
कपिल ने पूछा, "बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?"
उस लड़की ने कहा, "अंकल मेरा नाम गरिमा है।"
कपिल ने पूछा, "तुम्हारे साथ और कौन रहता है?"
"कोई भी नहीं। यहाँ तो मैं अकेली रहती हूँ। मेरी मम्मी गाँव में रहती हैं।"
"और तुम्हारे पापा?"
पिता के बारे में पूछते ही गरिमा का चेहरा पीला पड़ गया। यह देखते हुए कपिल ने कहा, "आई एम सॉरी गरिमा।"
"नहीं अंकल, वह ज़िंदा हैं लेकिन हमारे साथ नहीं रहते।"
"अच्छा-अच्छा, तुम कुछ देर आराम कर लो। हम सुबह बात करते हैं।"
कपिल ने रूपा की तरफ़ देखते हुए कहा, "अरे रूपा, उसे बाथरूम भी बता दो ताकि वह मुंह धो ले।"
रूपा ने कहा, "ठीक है, मैं लाइट जलाती हूँ।"
घबराई हुई आवाज़ में गरिमा ने कहा, "नहीं आंटी, लाइट मत जलाना। कहीं वे लोग यहाँ न आ जाएँ।"
"अच्छा-अच्छा, नहीं जलाऊंगी। तुम डरो नहीं।"
कपिल ने कहा, "रूपा, इसे ऊपर शालिनी के पास सोने के लिए ले जाओ।"
"ठीक है, चलो गरिमा।"
"थैंक्यू अंकल, आंटी। आप लोग बहुत अच्छे हैं। यदि इस समय आप लोग मेरी मदद नहीं करते, तो मैं बहुत बड़ी मुश्किल में फंस जाती।"
रूपा उसके बाद गरिमा को ऊपर शालिनी का कमरा दिखाने ले गई।
रूपा ने कमरे में जाकर उससे कहा, "गरिमा ये मेरी बेटी है। तुम उसी के बाजू में सो जाना।"
"ठीक है आंटी।"
गरिमा के लिए रूपा ने एक कंबल निकाल कर दे दिया और कहा, "बेटा, डरना मत। पहले बाथरूम में जाकर मुंह साफ़ कर लो। तुम्हारा मुंह बहुत काला हो रहा है।"
"ठीक है आंटी।"
रूपा नीचे चली गई। गरिमा ने बाथरूम में जाकर अपना मुंह धोया। उसने देखा, उसके मुंह पर डामर लगा हुआ है। शायद भागते समय कहीं से हाथ में और फिर चेहरे पर लग गया होगा। बाल भी बिखरे हुए थे। ऐसा लग रहा था मानो दो-तीन दिनों से बाल बनाए ही न गए हों। उसने वहाँ रखे साबुन से मुंह साफ़ किया और अपने हाथों से बाल ठीक करके फिर सोने के लिए आ गई।
उस समय शालिनी, बहुत गहरी नींद में सो रही थी। उसका मुंह दूसरी तरफ़ था। गरिमा भी वहाँ सो गई। काफ़ी देर तक करवट बदलने के बाद आखिरकार उसे नींद ने स्वीकार कर ही लिया।
धीरे-धीरे सुबह की लालिमा ने अपनी सुंदरता बिखेरना शुरू कर दिया। रात के अंधकार को चीरते हुए उसने अपना रास्ता बना लिया और अंधकार उजाले में बदल गया।
सुबह के लगभग सात बजे का समय था जब शालिनी की नींद खुली और उसने करवट बदली। करवट बदलकर जैसे ही उसने आंखें खोली, तो उसे ऐसा लगा मानो उसके सामने आईना रखा हो। अपने सामने आईना रखा देखकर वह ज़ोर से चिल्लाई, "मम्मी, यह क्या? यहाँ आईना क्यों?" कहते-कहते उसे समझ आ गया कि नहीं, यह आईना नहीं, यह उसका स्वयं का प्रतिबिंब ... नहीं, यह तो कोई और है। बिल्कुल वही नाक-नक्श, वही रंग-रूप।
शालिनी चौंक गई। वह ज़ोर से चिल्लाई, "मम्मा, जल्दी आओ!"
रूपा और कपिल घबरा गए, "क्या हुआ होगा? शालिनी क्यों चिल्ला रही है?" ऐसा सोचते हुए दोनों ऊपर आए।
शालिनी के इस तरह से चिल्लाने के कारण गरिमा भी उठकर बैठ गई। तभी कपिल और रूपा ऊपर पहुँचे। शालिनी और गरिमा को एक साथ इस तरह बैठा देखकर उनकी आंखों पर उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था। वे दोनों अपनी आंखें मसल रहे थे।
✍️ रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः