रात के लगभग दो बजे डॉक्टर कपिल के दरवाजे को जोर-जोर से खटखटाने की आवाज़ आई। कपिल और उसकी पत्नी रूपा दोनों ही नींद से जागकर उठ बैठे। रूपा ने कहा, " कपिल, मुझे डर लग रहा है। इतनी रात में इस तरह से कौन दरवाज़ा खटखटा रहा है? जल्दी से पुलिस को फ़ोन करो।"
"नहीं रूपा, ज़रूरी नहीं, जैसा तुम सोच रही हो, वैसा ही हो। हो सकता है कोई बहुत बीमार हो और इलाज़ के लिए मदद चाहता हो।"
रूपा ने कहा, "पर इस तरह कपिल ..."
"देखने दो रूपा," कहते हुए कपिल दरवाज़ा खोलने के लिए उठकर चल दिया।
कपिल ने जैसे ही दरवाज़ा खोला, सामने एक डर से कांपती हुई लड़की, घबराई हुई-सी सीधे अंदर आ गई।
उसके अंदर आते ही कपिल ने पूछा, "क्या हुआ है?"
उस लड़की ने कहा, "दरवाजा बंद कीजिए और लाइट भी जल्दी से बंद कर दीजिए," इतना कहते हुए वह लड़की गिरते-गिरते कपिल के कंधे पर आकर लुढ़क गई।
रूपा ने यह सुनते ही घबरा कर लाइट बंद कर दी।
वह लड़की अब तक बेहोश हो चुकी थी। कपिल और रूपा ने मिलकर उसे वहीं सोफे पर लेटा दिया। वे दोनों कुछ भी समझ नहीं पा रहे थे कि आख़िर बात क्या है। वह कुछ भी बताए बिना ही तो बेहोश हो गई थी। पर हाँ, इतना तो उन्हें समझ में आ ही गया था कि बात बीमारी की नहीं, डर की है। क्योंकि उसने आते ही दरवाजे के साथ ही साथ लाइट भी बंद कर देने के लिए कहा था।
कपिल ने कहा, "लगता है शायद कोई इसका पीछा कर रहा है। लाइट मत जलाना रूपा।"
रूपा ने कहा, "अरे कपिल, कहीं हम किसी मुसीबत में न फंस जाएँ।"
"कैसी बात कर रही हो रूपा? यह समय ये सोचने का नहीं है। एक जवान बच्ची हमसे मदद मांग रही है। क्या हम उसे अभी घर से बाहर यह कहकर निकाल सकते हैं कि 'चली जाओ यहाँ से, अपने साथ हमें भी मुसीबत में मत डालो’? रूपा, हमारे घर भी जवान बेटी है। तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो? मुझे पहले इसे होश में लाने दो।"
रूपा ने कहा, "लाइट बंद है, कैसे करोगे?"
कपिल ने कहा, "रूपा, जीरो का बल्ब जला दो ताकि कुछ दिखाई दे सके।"
रूपा ने बल्ब जलाया। कपिल ने बोतल हाथ में उठाते हुए लड़की को देखा तो अनायास ही उनके मुंह से निकला, "अरे, इसका मुंह तो पूरा काला हो रहा है," कहते हुए डॉ. कपिल ने लड़की के मुंह पर थोड़ा-सा पानी का छींटा डाला।
पानी चेहरे पर गिरते ही उसने आंखें खोली। वह रोते हुए कहने लगी, "अंकल, मुझे बचा लीजिए।"
"क्या हुआ है बेटा? तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो?"
"अंकल, कुछ गुंडे मेरा पीछा कर रहे थे। मैं एक-दो गली में छिपकर बचते-बचाते यहाँ तक पहुँची हूँ।"
"पर तुम इतनी रात को क्यों ...?"
"नहीं अंकल, मैं तो मेरे घर पर ही थी। लगभग एक बजे के आसपास उन लोगों ने मेरा दरवाज़ा खटखटाया तो मैंने बिना कुछ सोचे-समझे दरवाज़ा खोल दिया। वे मुझे पकड़ने लगे, लेकिन मैं किसी तरह से वहाँ से भाग निकली। पिछले एक घंटे से मैं छिपते-छुपाते घूम रही हूँ।"
"पर क्या तुम्हारे साथ उनकी कोई दुश्मनी है या फिर ऐसे ही गुंडागर्दी कर रहे हैं?"
"अंकल, दुश्मनी कैसी? मैं तो उन्हें पहचानती तक नहीं हूँ।"
रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः