अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 55: तीन रास्ते
जमीन अचानक दो हिस्सों में फट गई।
अनन्या ने चीखते हुए आरव का हाथ पकड़ने की कोशिश की।
लेकिन...
उनकी उँगलियाँ एक-दूसरे से छूट गईं।
"आरव!"
"अनन्या!"
कबीर भी दूसरी दिशा में गिर रहा था।
कुछ ही सेकंड में तीनों अलग-अलग अंधकार में समा गए।
फिर...
सब शांत हो गया।
अनन्या
अनन्या की आँखें खुलीं।
वह एक लंबे गलियारे में खड़ी थी।
गलियारा इतना लंबा था कि उसका दूसरा सिरा दिखाई नहीं दे रहा था।
दोनों तरफ़ दरवाज़े थे।
हर दरवाज़े पर एक नाम लिखा था।
"अधूरी दोस्ती"
"खोया हुआ प्रेम"
"माँ की आखिरी चिट्ठी"
"वह लड़का जो लौटकर नहीं आया"
"अधूरा वादा"
अनन्या धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
हर दरवाज़े के पीछे से किसी की आवाज़ आ रही थी।
कहीं कोई रो रहा था।
कहीं कोई हँस रहा था।
कहीं किसी की आखिरी साँस सुनाई दे रही थी।
अनन्या ने एक दरवाज़े पर हाथ रखा।
अंदर से आवाज़ आई—
"मुझे पूरा कर दो..."
अनन्या ने हाथ तुरंत पीछे खींच लिया।
तभी उसके पीछे किसी ने कहा—
"हर अधूरी कहानी तुम्हें बुलाएगी।"
अनन्या पलटी।
वहाँ...
एक बूढ़ी महिला खड़ी थी।
उसके हाथ में बहुत सारी चाबियाँ थीं।
"आप कौन हैं?"
बूढ़ी महिला ने कहा—
"मैं अधूरी कहानियों की रखवाली करती हूँ।"
"यह जगह क्या है?"
"यह..."
उसने चारों तरफ़ देखा।
"उन कहानियों का घर है जिन्हें उनके लेखक पूरा किए बिना चले गए।"
अनन्या का दिल भारी हो गया।
"तो भक्षक यहाँ भी आ सकता है?"
बूढ़ी महिला ने गंभीर होकर कहा—
"वह यहीं से सबसे ताकतवर होता है।"
"क्यों?"
"क्योंकि उसे अधूरी कहानियाँ सबसे स्वादिष्ट लगती हैं।"
अनन्या चौंकी।
बूढ़ी महिला ने एक काली चाबी उठाई।
"हर अधूरी कहानी में..."
"पछतावा होता है।"
"और पछतावा..."
"भक्षक का भोजन है।"
अनन्या ने तुरंत पूछा—
"कबीर कहाँ है?"
बूढ़ी महिला ने उसकी ओर देखा।
"तुम्हें अपना रास्ता चुनना होगा।"
"एक रास्ता कबीर तक जाता है।"
"एक आरव तक।"
"और तीसरा..."
वह रुक गई।
"तीसरा रास्ता भक्षक तक जाता है।"
अनन्या ने बिना सोचे कहा—
"मुझे तीसरा रास्ता चाहिए।"
बूढ़ी महिला मुस्कुराई।
"मुझे पता था..."
"तुम यही चुनोगी।"
आरव
दूसरी तरफ...
आरव एक बिल्कुल अलग जगह गिरा था।
वह एक पुराने थिएटर में खड़ा था।
सैकड़ों खाली कुर्सियाँ।
मंच पर एक अकेली रोशनी।
और मंच के बीच...
अधूरी किताब।
आरव धीरे-धीरे मंच की ओर बढ़ा।
तभी पीछे से तालियों की आवाज़ आई।
ताली... ताली... ताली...
आरव पलटा।
सारी कुर्सियाँ भर चुकी थीं।
लेकिन उन पर बैठे लोगों के चेहरे नहीं थे।
सिर्फ सफेद खाली पन्ने।
एक आवाज़ आई—
"पहला पाठक..."
"क्या तुम सच में कहानी को समझते हो?"
आरव ने कहा—
"मैंने उसे पढ़ा है।"
आवाज़ हँसी।
"पढ़ना..."
"समझना नहीं होता।"
मंच पर अचानक एक दृश्य दिखाई दिया।
अनन्या अकेली थी।
वह रो रही थी।
उसके हाथ में कलम थी।
सामने अधूरी किताब।
वह आरव को पुकार रही थी।
"आरव..."
"मुझे तुम्हारी जरूरत है।"
आरव मंच पर उसकी ओर दौड़ना चाहता था।
लेकिन उसके पैर वहीं जमे रहे।
आवाज़ आई—
"अगर तुम मंच पर चले गए..."
"तो तुम कहानी के पात्र बन जाओगे।"
"और अगर यहीं रहे..."
"तो तुम हमेशा उसके पाठक रहोगे।"
आरव ने दाँत भींच लिए।
"मैं न पात्र बनना चाहता हूँ..."
"न सिर्फ पाठक।"
"तो क्या बनना चाहते हो?"
आरव ने मंच पर खड़ी अनन्या की ओर देखा।
फिर कहा—
"मैं उसका साथी बनना चाहता हूँ।"
अचानक पूरा थिएटर काँप उठा।
सभी खाली चेहरों पर एक साथ शब्द उभर आए—
"स्वीकार।"
मंच की किताब चमक उठी।
और उसके अंदर से एक सुनहरी चाबी बाहर आई।
आरव ने उसे उठा लिया।
चाबी पर लिखा था—
"विश्वास"
कबीर
उधर...
कबीर एक छोटे कमरे में बैठा था।
उसके हाथ का काला निशान अब उसकी कलाई तक पहुँच चुका था।
वह दर्द सहते हुए भी शांत था।
सामने भक्षक खड़ा था।
काली परछाईं ने पूछा—
"तुमने मुझे इतने वर्षों तक क्यों छिपाया?"
कबीर ने कोई जवाब नहीं दिया।
भक्षक उसके पास झुका।
"तुम्हें पता है..."
"मैं तुम्हें क्यों नहीं खा सका?"
कबीर ने उसकी ओर देखा।
"क्योंकि मैं कहानी का हिस्सा नहीं हूँ।"
भक्षक हँसा।
"गलत।"
"तुम कहानी से बाहर पैदा हुए..."
"लेकिन तुम्हारा जन्म एक कहानी से ही हुआ था।"
कबीर चुप हो गया।
भक्षक ने उसके सामने एक पुराना पन्ना रखा।
उस पन्ने पर लिखा था—
"कबीर — पहला ऐसा पात्र जिसे लेखक ने जानबूझकर अधूरा छोड़ा।"
कबीर की आँखें फैल गईं।
"नहीं..."
भक्षक बोला—
"तुम कहानी से बाहर नहीं हो।"
"तुम..."
"सबसे पुरानी अधूरी कहानी हो।"
कबीर पीछे हट गया।
"झूठ!"
भक्षक की काली आकृति उसके चारों ओर घूमने लगी।
"तुम्हें सच जानना है?"
"तो अपनी आँखें बंद करो।"
कबीर ने आँखें बंद कर लीं।
अचानक उसके दिमाग में एक दृश्य उभरा।
एक छोटी बच्ची...
एक पुरानी किताब...
और उसके सामने बैठी एक लेखिका।
वह लेखिका...
अनन्या थी।
लेकिन इस बार...
वह कबीर को देखकर रो रही थी।
वह कह रही थी—
"मैं तुम्हें लिखना चाहती हूँ..."
"लेकिन अगर तुम्हें पूरा लिखा..."
"तो तुम हमेशा के लिए मेरे साथ बंध जाओगे।"
कबीर की आँखें खुल गईं।
"तो..."
"तुमने मुझे अधूरा छोड़ा..."
भक्षक ने कहा—
"क्योंकि वह तुमसे प्यार करती थी।"
कबीर की आँखों में आँसू आ गए।
"और फिर..."
"उसने मुझे भूलने के लिए अपनी यादें मिटा दीं।"
भक्षक मुस्कुराया।
"अब तुम समझे?"
"तुम्हारा सबसे बड़ा दर्द..."
"यही है।"
कबीर ने धीरे-धीरे सिर उठाया।
उसकी आँखों में आँसू थे।
लेकिन अब डर नहीं था।
"हाँ..."
"अब समझ गया।"
भक्षक चौंका।
कबीर के शरीर से सुनहरी रोशनी निकलने लगी।
काला निशान उसकी कलाई से पीछे हटने लगा।
भक्षक पीछे हट गया।
"यह कैसे..."
कबीर ने कहा—
"तुम मेरे पछतावे से ताकत लेते हो।"
"लेकिन अब मुझे कोई पछतावा नहीं है।"
"क्योंकि..."
"मैं अधूरा हूँ..."
"और मुझे अपने अधूरे होने पर गर्व है।"
उसकी सुनहरी रोशनी और तेज़ हो गई।
भक्षक पहली बार पीछे हटने लगा।
तीनों रास्ते
उधर अनन्या तीसरे रास्ते पर पहुँच चुकी थी।
सामने एक विशाल काला दरवाज़ा था।
उस पर कोई नाम नहीं था।
सिर्फ एक वाक्य लिखा था—
"जो अपने सबसे बड़े डर से मिलना चाहता है, वही भीतर आए।"
अनन्या ने दरवाज़ा खोला।
अंदर...
एक कमरा था।
कमरे के बीच एक मेज़।
मेज़ पर वही सुनहरी कलम।
और उसके सामने...
अनन्या का पुराना रूप।
पहली लेखिका।
वह धीरे-धीरे उठी।
"तुम वापस आ गई।"
अनन्या की आँखें भर आईं।
"मैं तुम्हें ढूँढने आई हूँ।"
पुरानी अनन्या मुस्कुराई।
"नहीं।"
"तुम मुझे ढूँढने नहीं..."
"अपने उस हिस्से को स्वीकार करने आई हो..."
"जिसे तुमने सदियों पहले छोड़ दिया था।"
अनन्या उसके सामने बैठ गई।
"क्या तुमने कबीर को जानबूझकर अधूरा छोड़ा था?"
पुरानी अनन्या की आँखों में आँसू आ गए।
"हाँ।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे डर था..."
"कि अगर मैंने उसकी कहानी पूरी कर दी..."
"तो वह मेरी कहानी का पात्र बन जाएगा।"
"मैं चाहती थी..."
"कि वह अपनी कहानी खुद लिखे।"
अनन्या ने पूछा—
"तो भक्षक?"
पुरानी अनन्या ने कहा—
"वह मेरे डर से पैदा हुआ।"
"कबीर..."
"मेरी उम्मीद से।"
अनन्या चुप रह गई।
अब सब स्पष्ट होने लगा था।
एक ओर...
भक्षक — डर से जन्मा।
दूसरी ओर...
कबीर — उम्मीद से जन्मा।
और उनके बीच...
अधूरी किताब।
तभी कमरे की दीवार पर एक आखिरी वाक्य उभरा—
"जब डर और उम्मीद आमने-सामने होंगे..."
"तभी कहानी अपना असली लेखक चुनेगी।"
अनन्या ने कलम उठा ली।
उसी क्षण...
दूर कहीं आरव की सुनहरी चाबी चमकी।
कबीर की शक्ति जाग उठी।
और भक्षक ने पहली बार अपना असली रूप धारण करना शुरू किया।
पूरा कथा-संसार काँप उठा।
क्योंकि अब...
तीनों रास्ते एक ही जगह जाकर मिलने वाले थे।
और उन तीनों के बीच...
एक फैसला होना था—
कहानी को कौन बचाएगा?
लेखक?
पाठक?
या वह बच्चा जिसे किसी कहानी ने कभी पूरा लिखा ही नहीं?
क्रमशः...