अधूरी किताब – सीजन 2
एपिसोड 53 : वह बच्चा जिसे किसी कहानी ने नहीं लिखा
कमरे में अंधेरा था।
इतना गहरा अंधेरा कि अनन्या को अपने सामने खड़े आरव का चेहरा भी दिखाई नहीं दे रहा था।
सिर्फ एक चीज़ दिखाई दे रही थी—
अधूरी किताब।
उसके पन्नों से हल्की सुनहरी रोशनी निकल रही थी।
और उस रोशनी में खड़ा था वह बच्चा...
कबीर।
कुछ क्षण पहले तक वह एक साधारण दस साल का बच्चा लग रहा था।
लेकिन अब उसकी आँखों में सुनहरी चमक थी।
अनन्या ने धीमे स्वर में पूछा—
"तुमने कहा..."
"तुम्हें किसी कहानी ने लिखा ही नहीं?"
कबीर ने सिर हिलाया।
"हाँ।"
आरव ने सावधानी से पूछा—
"तो फिर तुम कौन हो?"
कबीर कुछ देर चुप रहा।
फिर वह कमरे के बीच रखी पुरानी कुर्सी पर बैठ गया।
उसने अपनी छोटी-सी हथेली मेज़ पर रखी।
अचानक...
कमरे की दीवारों पर लगे सारे पुराने चित्र चमकने लगे।
1897...
1924...
1958...
1986...
2012...
हर तस्वीर में वही बच्चा।
हर युग में...
वही चेहरा।
वही आँखें।
वही उम्र।
अनन्या तस्वीरों को देखते हुए धीरे से बोली—
"तुम कभी बड़े नहीं हुए।"
कबीर मुस्कुराया।
"क्योंकि मेरा समय बाकी लोगों जैसा नहीं है।"
"मेरे लिए एक साल..."
"कभी एक दिन होता है।"
"कभी सौ साल।"
आरव ने पूछा—
"तुम्हारा समय किसके हाथ में है?"
कबीर ने सीधा उत्तर दिया—
"किसी के हाथ में नहीं।"
फिर उसने अधूरी किताब की ओर देखा।
"मैं समय के बाहर पैदा हुआ हूँ।"
अनन्या धीरे-धीरे उसके पास गई।
"तुम्हें मेरे बारे में कैसे पता?"
कबीर ने कहा—
"क्योंकि मैंने तुम्हें बहुत पहले देखा था।"
"कहाँ?"
"उस जगह..."
"जहाँ पहली कहानी लिखी गई थी।"
अनन्या की धड़कन तेज़ हो गई।
"लेकिन उस समय तो मैं..."
कबीर ने बात पूरी की—
"तुम पहली लेखिका थीं।"
"और मैं..."
वह कुछ पल रुका।
"मैं उस कहानी का वह हिस्सा था जिसे तुमने लिखने से मना कर दिया था।"
अनन्या स्तब्ध रह गई।
"क्या मतलब?"
कबीर ने किताब खोली।
उसने एक बहुत पुराना पन्ना निकाला।
पन्ने का किनारा जला हुआ था।
उस पर सिर्फ कुछ शब्द बचे थे—
"एक ऐसा बच्चा..."
बाकी हिस्सा पूरी तरह मिट चुका था।
अनन्या ने काँपते हाथों से पन्ना लिया।
"मैंने यह लिखा था?"
कबीर ने कहा—
"हाँ।"
"लेकिन फिर तुमने इसे काट दिया।"
अनन्या ने आँखें बंद कर लीं।
अचानक उसके सिर में तेज़ दर्द उठा।
उसके सामने पुराने दृश्य चमकने लगे।
एक प्राचीन कमरा...
वही लकड़ी की मेज़...
वही सुनहरी कलम...
और उसके सामने अधूरी किताब।
उस समय की अनन्या कुछ लिख रही थी।
वह लिख रही थी—
"एक ऐसा बच्चा जन्म लेगा..."
"...जो किसी लेखक की कल्पना नहीं होगा।"
"...जो किसी कहानी का पात्र नहीं होगा।"
"...वह कहानी के बाहर खड़ा होकर कहानियों को देख सकेगा।"
"...और जिस दिन अधूरी किताब अपना अंतिम पन्ना खोलेगी..."
"...वह वापस आएगा।"
पुरानी अनन्या अचानक रुक गई।
उसके चेहरे पर डर आ गया।
उसने वह पूरा पन्ना फाड़ दिया।
फिर खुद से कहा—
"नहीं..."
"यह शक्ति किसी बच्चे के हाथ में नहीं हो सकती।"
दृश्य टूट गया।
अनन्या वर्तमान में लौट आई।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
कबीर उसे देख रहा था।
"तुम्हें याद आ गया?"
अनन्या ने सिर हिलाया।
"थोड़ा..."
"मैंने तुम्हें लिखा था।"
"लेकिन फिर..."
"मैंने तुम्हें मिटा दिया।"
कबीर ने शांत स्वर में कहा—
"तुमने कोशिश की थी।"
"लेकिन..."
"जिसे कहानी से बाहर जन्म दिया जाए..."
"उसे कहानी से मिटाया नहीं जा सकता।"
आरव ने कबीर की ओर देखा।
"अगर तुम इतनी शक्ति रखते हो..."
"तो इतने सालों तक छिपे क्यों रहे?"
कबीर ने हल्की मुस्कान दी।
"क्योंकि मुझे इंतज़ार करना था।"
"किसका?"
"तुम दोनों का।"
आरव चौंक गया।
"हमारा?"
कबीर ने सिर हिलाया।
"प्रथम संपादक ने कहा था..."
"जब तक अनन्या अपनी अधूरी कहानी को स्वीकार नहीं करती..."
"मैं सामने नहीं आ सकता।"
"और जब तक पहला पाठक अपनी सबसे बड़ी सच्चाई नहीं समझता..."
"तब तक नई किताब खुल नहीं सकती।"
आरव ने पूछा—
"मेरी सबसे बड़ी सच्चाई?"
कबीर ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
"तुमने हमेशा सोचा..."
"तुम अनन्या की कहानी पढ़ने के लिए पैदा हुए हो।"
"लेकिन सच यह है..."
"तुम उसकी कहानी के पहले पाठक नहीं..."
"पहले गवाह हो।"
आरव के चेहरे पर गंभीरता आ गई।
"गवाह?"
"हाँ।"
कबीर बोला—
"तुम्हारा काम उसकी कहानी को पूरा करना नहीं था।"
"तुम्हारा काम यह देखना था कि वह अपनी कहानी खुद लिखे।"
अनन्या ने आरव की ओर देखा।
उन दोनों के बीच कुछ पल के लिए मौन छा गया।
अचानक...
अधूरी किताब जोर से काँपी।
धड़ाम!
कबीर तुरंत खड़ा हो गया।
उसकी आँखों की सुनहरी चमक तेज़ हो गई।
"वह आ गया।"
आरव ने पूछा—
"कौन?"
कबीर ने दरवाज़े की ओर देखा।
"जिससे मैं इतने वर्षों से छिपता रहा हूँ।"
कमरे के बाहर गलियारे में कदमों की आवाज़ सुनाई देने लगी।
धीरे...
बहुत धीरे...
ठक...
ठक...
ठक...
हर कदम के साथ कमरे की दीवारों पर लिखे शब्द मिटने लगे।
अनन्या ने किताब अपने हाथ में कसकर पकड़ ली।
"क्या यह अनलिखा अस्तित्व है?"
कबीर ने सिर हिलाया।
"नहीं।"
"वह इससे भी पुराना है।"
आरव ने पूछा—
"तो फिर कौन?"
कबीर ने बहुत धीमे स्वर में कहा—
"कहानी का पहला पाठक भी पैदा होने से पहले..."
"एक और अस्तित्व था।"
दरवाज़े का हैंडल अपने-आप घूमने लगा।
कबीर पीछे हट गया।
"वह..."
"कहानियों को पढ़ता नहीं।"
"वह उन्हें..."
"खाता है।"
दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।
बाहर कोई नहीं था।
सिर्फ एक लंबी काली परछाईं।
वह परछाईं धीरे-धीरे कमरे में दाखिल हुई।
दीवार पर लगी सभी तस्वीरें एक-एक करके काली पड़ने लगीं।
कबीर ने अनन्या से कहा—
"किताब बंद मत करना।"
"क्यों?"
"क्योंकि जैसे ही किताब बंद होगी..."
"वह हमें देख पाएगा।"
अनन्या ने घबराकर पूछा—
"और अगर किताब खुली रही?"
कबीर ने कहा—
"तब..."
"हम उसके लिए अभी भी कहानी हैं।"
अचानक परछाईं के भीतर से एक आवाज़ आई—
"कबीर..."
कबीर का चेहरा सफेद पड़ गया।
आवाज़ फिर आई—
"तुम्हारी कहानी बहुत लंबी हो गई है।"
कबीर ने अनन्या का हाथ पकड़ लिया।
"भागो!"
तीनों कमरे से बाहर भागे।
लेकिन जैसे ही वे गलियारे में पहुँचे...
अधूरी किताब के नए पन्ने पर अपने-आप एक वाक्य लिख गया—
"नई कहानी का पहला अध्याय शुरू हो चुका है।"
और उसके ठीक नीचे...
एक नाम उभरा—
"भक्षक"
अनन्या ने वह नाम पढ़ा।
उसकी रीढ़ में ठंडक दौड़ गई।
कबीर ने पीछे मुड़कर देखा।
काली परछाईं अब गलियारे के अंत में खड़ी थी।
उसकी आँखें नहीं थीं...
चेहरा नहीं था...
फिर भी...
वह उन्हें देख रही थी।
कबीर ने काँपती आवाज़ में कहा—
"अब अधूरी किताब को सिर्फ अपनी कहानी नहीं बचानी है..."
"उसे खुद को भी बचाना होगा।"
और तभी...
अधूरी किताब का एक पन्ना अपने-आप फटकर हवा में उड़ गया।
उस पन्ने पर सिर्फ एक शब्द लिखा था—
"भागो..."
क्रमशः...