राहें - 17 shiromani mathur द्वारा मानवीय विज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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राहें - 17

मेरा-गाँव 

वर्षो बाद बुआ घर आई तो घर का सारा वातावरण ही बदल
गया है। बुआ बड़े हसॅमुख स्वभाव की मिलनसार महिला है, बुआ घर
के हर सदस्य के प्रति अपनापन रखती हैं और परिवार के सभी
सदस्य भी बुआ का बहुत ही सम्मान करते हैं। जबसे बुआ घर में आई
है तब से पुरानी बातें व किस्से सुना रहीं हैं।
बुआ के भतीजे अमर व विजय भी अब गॉव छोड़कर शहर में
रहने लगें हैं। बुआ को अपना गॉव, गॉँव की गलियाँ, जहाँ वे बचपन
में खेली थी, पढ़ी थी, याद आते रहते। बुआ की बड़ी इच्छा थी कि
वे अपने बचपन के गाँव को देखकर आये । वह बाग, वह बगीचा जहाँ
वे बचपन में फूल तोड़ने व आम बीनने जाती थी, उन्हें बहुत याद आने
लगे। वो लोग भी याद आने लगे जिनके साथ वे बचपन में खेली थी, और
स्कूल में पढ़ने जाती थी। बुआ ने भर्तीजे अमर से कहा कि एक दिन
गाँव घूमकर आयेंगे, अपना घर, स्कूल, मंदिर, नदी सब घूमना है।
एक दिन सबेरे से ही गाड़ी लेकर गॉव घूमने का प्रोग्राम बना ।
गॉव का दृश्य अब पहले से काफी बदल गया है, गाँव जाने वाली
कच्ची सड़क की जगह अब पक्की सड़क बन गई है, गलियाँ भी अब
पक्की हो गई है। बुआ सोच रही थीं पहले बैलगाड़ी से गाँव जाना
होता था, 4 घंटे लग जाते थे। सामान लाने व यात्रियों को गाँव लाने
ले जाने का साधन बैलगाड़ी ही होती थी। अपने घर के बैल भी
सड़क व घर को पूरी तरह जान गये थे। जैसे कभी - कभी गाड़ीवान
गाड़ी में सो जाता था तो भी बैलगाड़ी सीधे घर पर ही आकर रूकती
थी। बैलो के गले में बंधी घंटियों के बजने से पता पड़ जाता था, कि


गाड़ी आ गई है। माल गुजारी का जमाना था ,जब बुआ इस गाँव में
रहती थी, पढ़ने स्कूल जाती या कहीं और भी जाती तो गाँव की
बुजुर्ग महिलायें भी उनका सम्मान करतीं। बहुत बार पॉव भी पड़ती।
तब बुआ कहतीं "चाची आप बड़ी हो हमारे पॉव मत पड़ा करों" तो
चाची कहतीं- "बेटियां सदैव बड़ी रहती है उनका पॉव पड़ने से
भगवान खुश होतें है"। उस समय गॉँव की हर महिला या पुरूष से
पारिवारिक रिश्ता होता था, कोई चाची है ,तो कोई भाभी, कोई दीदी
है, तो कोई बुआ, इसी तरह कोई चाचा है या भैया सबसे पारिवारिक
रिश्ते होते थे ,सब एक दूसरे के सुख दुख में सम्मिलित होते थे ,बुआ
को यह पारस्परिक सम्बन्ध की मिठास बहुत ही भाती थी ।
गाँव आते ही बुआ सबसे पहले अपने स्कूल गई । यद्यपि वहॉँ
कोई भी बुआ की जान पहचान का नहीं था, ना छात्राएं, ना शिक्षक,
फिर भी बड़ी आत्मिक शान्ति बुआ को स्कूल में बैठने से मिली। बहुत
देर वे स्कूल में बैठी रही, वर्तमान शिक्षकों से पुरानी बातें करती रहीं ।
वह बगीचें जहाँ से बुआ आम बीनती थी या फुल तोड़कर लाती थी।
अब खत्म हो गये थे। अब वहाँ कोई बगीचा नहीं था। एक दो पेड़
को छोड़कर बाकी पेड़ लोंगों ने काट डाले थे। बगीचों की जगह पर
खेत या मैदान हो गये थे। बुआ को अपने पिताजी का 100 एकड़ का
बगीचा बार-बार याद आ रहा था ,जहाँ उनकी मालगुजारी थी। बुआ
को अपना बाड़ा याद आया, जहाँ उनके बड़े पिताजी - अपना अनाज
रखते थे। तब अनाज रखने के लिये बड़े बड़े कमरे बने हुये थे| एक
एक कमरे में एक एक तरह का अनाज रखा जाता था, जैसे गेहूँ के
लिये अलग कमरा ,चना, मक्का, बाजरा रखने के लिये अलग-अलग
कमरे थे। धीरे-धीरे मालगुजारी जाने के बाद से वह सब अनाज
आना बंद हो गया और समय के साथ-साथ वे कमरे भी धारासायी
हो गये। उन्हीं कमरों के बीच एक कमरे में बड़ी शानदार मखमल
लगी पालकी रखी रहती थी, जो शादी-विवाह, धार्मिक आयोजन या
अन्य किसी विशेष अवसर पर काम आती थी। बुआ अपनी बहनों व


सहेलियों के साथ उस पालकी में बैठकर खेला करती थी। बुआ को
वह दिन याद हो आये और बुआ ना जाने किस लोक के बारे में
सोचने लगी।
बुआ भतीजे अमर को बोली "अपना घर देख लें" - दो मंजिल
घर आसपास में चाचा व बड़े पिताजी व अन्य लोगों के घर थे। अब
गॉव में उनमे से कोई नही रहता। 
डाकुओं की लूटपाट व आंतक के
कारण तथा गाँव में आवागमन के साधन नही होने व व्यापारिक कार्यो
के लिये पर्याप्त स्त्रोतों के अभाव के कारण अधिकतर लोगों ने गॉव
छोड़ दिया है। खाली घरों पर गाव के दबंग लोंगों ने कब्जा कर
लिया है।
अमर ने दूर से ही घर दिखाया। वही पुराना घर बहुत बड़ा है।
घर के दो भाग है ,एक भाग में 5 दुकाने है। उसके पीछे घर, दूसरे
भाग में व्यापारिक कार्यों हेतु कमरे बने है।
अमर ने कहा- घर का आधा भाग किराये पर दिया था, परन्तु 
धीरे से किरायेदार ने पूरा घर व दुकानें ताला तोड़कर अपने कब्जे
में कर ली हैं। अब कौन उनसे झगड़ा करें और घर व दुकानें खाली
करवायें ? वे लोग लड़ाई झगड़ा करने लगते हैं। घर व दुकान खाली
नही करते यदि खाली करवा ले, तो दूसरा इनके विरोध में दुकान व
घर किराये पर नही लेगा क्योंकि यह लोग सही लोग नही है। गॉव
में अपना आंतक मचाये रखते हैं, इसलिये हम लोग इनसे दुश्मनी
नहीं साधते है, इनसे दुश्मनी ठीक नही हैं। कहकर अमर चुप हो गये
परन्तु उनके चेहरे पर अपना सब कुछ इस तरह दूसरे के कब्जे में
देखकर असंतोष तो था ही।
बुआ ने पूछा- "अपने खेतों का क्या हाल है?"
अमर ने कहा "पापा वटाई (अधिया) पर खेत देते थे। धीरे
धीरे दबंगों ने उन पर भी अपना कब्जा कर लिया है। "पापा के देहान्त
के बाद से दबंगो का आतंक गॉँव में व्याप्त है।"


बुआ ने पूछा- "घर पर कब्जा करने वाले और खेत पर कब्जा
करने वाले अलग -अलग लोग हैं या एक ही आदमी ने दोनो जगह
कब्जा किया है।"
अमर ने कहा-"अलग-अलग लोग है पर दोनों में घनिष्टता
है।"
अमर को उदास देखकर बुआ को वे दिन याद आगये जब गाँव में पिताजी का दबदबा रहता था । भैया का रहन सहन भी बड़ा राॅयल था,वे
लखनऊ पढ़ने गये थे, छुट्रटयों में गाँव आते तो गॉव वालों जैसे बन
जाते और शहर में उनके ठाट-बाट का अलग ढंग था। गॉँव वाले
शहर जाते तो भैया उनके खाने ठहरने व घुमने की व्यवस्था करते थे
और गाँव के लोग ही आकर बताते थे कि शहर में भैया कोट व टाई
लगाकर छात्र होते हुये भी किसी बड़े अधिकारी के समान लगते थे।
भैया का अलग हैी स्तर व रूतबा था।
बुआ गाँव के मंदिर में भी गई यह उनका पुश्तैनी मंदिर है। गाँव
वालों के कहने पर मंदिर अभी भी वहीं है, मंदिर के बाह्य रूप में
काफी परिवर्तन आ गया है- मूर्तिया वही पुरानी हैं। काफी बड़ा
मंदिर है, मंदिर में जाने के बाद बुआ को बड़ी शान्ति की अनुभूति हु्यी
एक आत्मिक शान्ति व पवित्रता वहां पसरी थी। बुआ को उस समय
के पूजारी बाबा याद आ गये, उनकी ज्योतिष गणना के सब कायल
थे। बुआ ने हायर सेकेन्डरी की परीक्षा के बाद बाबा से अपने परीक्षा
परिणाम के विषय में पूछा था तो बाबा ने कहा था कि "बिटिया इस
वर्ष तुम पास हो जाओगी परन्तु परिणाम आने पर पेपर में बुआ का
रॉल नम्बर नही था।
बुआ ने बाबा से कहा कि- "बाबा मैं तो फेल हो गई आप तो
पास होने की बात कह रहे थे।"
बाबा ने कहा- "बिटिया तुम पास जरूर होगी फेल नही हो
सकती।"
बुआ को बाबा की बात पर विश्वास नहीं आ रहा था। बुआ बाबा
को गलत सोच रही थी परन्तु तीन-चार दिन बाद स्कूल आयी

परिणाम सूची में बुआ परीक्षा में पास थीं, तब से बुआ बाबा पर बहुत
विश्वास करने लगी थीं। आज भी बुआ को बाबा बहुत याद आये,
उन्होने वहाँ बैठे सभी लोगों को यह घटना सुनायी।
पक्की सड़के बन जाने पर भी गाँव का विकास नहीं हो रहा था
पर्याप्त शिक्षा के साधन वहाँ नहीं थे। बुआ ने गाँव में कम्पयूटर
क्लासेस चलाने की बात रखी तो गॉव वाले सहमत हो गये। बुआ
बोली -कम्पयूटर क्लास चलाने के लिये स्थान चाहिये - गाँव के
सयाने व्यक्ति रामनाथ ने जिनकी देखरेख में मंदिर चल रहा था,
कहा - अभी कुछ दिनों तक कम्पयूटर क्लासेस मंदिर में प्रारम्भ कर
देते हैं, बाद में बच्चों की संख्या बढ़ने पर अलग व्यवस्था बना लेंगें।
बुआ ने अगले महीने की पहली तारीख से कम्पयूटर क्लास प्रारम्भ
करने का आश्वासन दे दिया।
इसी तरह गॉव में कोई अच्छी स्वास्थ्य सुविधा भी नहीं थी।
छोटी-छोटी बीमारियों के इलाज के लिये ग्रामीणों को शहर जाना
पड़ता था। बुआ के परिचित और बुआ के सहयोग से मेडिकल की
शिक्षा लेकर आयें डाक्टर राकेश गुप्ता को गॉव में अपनी सेवायें देने
के लिये बुआ कई बार पहले भी कह चुकीं थी। गाँव के प्रति बुआ का
लगाव अभी भी बना हुआ था, इसीलिये उनकी इच्छा थी कि वहाँ
स्वास्थ्य सुविधायें पहुँचायी जाये, जिससे गॉव वालों के हित के
साथ-साथ राकेश भी अपनी सेवायें यहाँ देकर अनुभव ले सकेगा।
इसीलिये गॉँव में बुआ ने राकेश की डिस्पेंसरी खोलने की बात
रामनाथ के सामने रखी। बुआ के इस प्रस्ताव पर रामनाथ व अन्य
ग्रामीण बहुत खुश हुये, अब हमारे गाँव में डाक्टर साहब अपनी
डिस्पेंसरी खोलेंगें। बुआ ने रामनाथ व अन्य जनों से डिस्पेंसरी के
लिये उचित दुकान देखने की बात रखी तो रामनाथ के मुँह से निकल
गया- दीदी तुम्हारी ही कई दुकानें यहॉ है, तुम क्यों दुकान खोज
रही हो?
बुआ ने कहा - भैया फिर भी आप कोई और दुकान नजर में
रखो ,यदि वहाँ नहीं जमा तो विकल्प खुला रहे।


कुछ अति उत्साही लोगों ने कह दिया बुआ और अमर गाँव में
फिर से बसना चाहतें है , जिन लोगों ने उनके घर व दुकानों पर कब्जा
किया है, अब उनकी खैर नही। परन्तु यह बात गाँव में हवा की तरह
फैल गई।
गॉव की सीमा से लगी नदी दो जिलों की विभाजन रेखा है।
बचपन में बुआ गर्मियों में जब नदी में पानी कम होता था-- तो बच्चों
के साथ नदी पार करके उस पार पहुँच जाती थी। तब बुआ और सभी बच्चे 
बहुत खुश होते थे कि हम दूसरे जिले में घूमने आ गये है। अब
बुआ नदी किनारे खड़ी होकर चारों और देख रही थी, नदी पर दो
किलोमीटर लम्बा पुल बन गया है ,बुआ गाड़ी से पुल पर चलकर
सीमावर्ती जिले में पहुँचकर गदगद हो रही थी। दूसरे जिले में घूमने
आने की खुशी बुआ के चेहरे पर अभी भी छायी हुयी थी।
बुआ को बचपन के वो दिन याद आ गये ,जब गर्मियों की छुट्टियों 
में अन्य रिश्तेदार व उनके बच्चे गॉव आते थे और सभी शाम को नदी
नहाने जाते और तैरते- तैरते नदी के उस पार पहुँच कर खेला करते
थे और असीम आन्नद का अनुभव करते थे। ऊपर नीला आकाश, नीचे
चारों ओर फैली हरियाली, नदी और नदी की बालू के कणों में चमकते
शुभ्र आभा बिखेरती अभ्रक और चांदी के कण, सीपी व शंखो का अपार
खजाना नदी के दोनो किनारों पर बिखरा पड़ा था, बुआ की ऑँखे उस
खजाने को बटोरती रही, बहुत देर तक. अपलक बुआ निहारती रही
उस प्राकृतिक सौंदर्य को ....
बुआ के चेहरे पर बचपन वाली खुशी व भोलापन 
झलक रहा था। सूरज डूब चला था। सूरज की लाली आकाश और
पृथ्वी दोनों को अपनी लालिमा से सजा रही थी। इसी असीम आन्नद
को मन में समेटे वापस आने के लिये बुआ और अमर गाड़ी में बैठ गये।
अंधेरा घिर आया था, थोड़ी दूर पर ही सूनसान स्थान पर बुआ की
गाड़ी को कुछ नकाबपोशों ने घेर लिया उनके हाथों में बंदूके थी
उन्होनें बुआ और अमर पर गोलियां चला दी, दोनों वही ढेर हो गये।

छतीसगढ़ रत्न 
डॉ.शिरोमणि माथुर 
दल्ली राजहरा
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