आलसी रामू
एक छोटे-से गाँव में रामू नाम का एक आदमी रहता था। शरीर से वह हट्टा-कट्टा और मजबूत था, मगर आलस्य ने उसकी सारी शक्ति पर जैसे ताला लगा दिया था।
काम से उसे ऐसी चिढ़ थी मानो मेहनत करने से कोई बड़ा अपराध हो जाएगा। वह काम कम करता और बातें अधिक। उसकी बातों में भी दूसरों की प्रशंसा कम, निंदा अधिक होती थी।
सुबह सूरज गाँव के ऊपर चढ़ आता। खेतों में हल चलने लगते, मजदूर अपने औजार लेकर निकल जाते, पशु चरने चले जाते; मगर रामू की चारपाई तब भी नहीं छूटती।
उसकी माँ सागरी देवी रोज आवाज लगाती—
“रामू! उठ बेटा, दिन चढ़ आया।”
रामू करवट बदलते हुए कहता—
“उठ रहा हूँ माँ... तुम जाओ।”
लेकिन वह उठता नहीं था।
सागरी देवी विधवा थी। पति को खोए हुए वर्षों बीत चुके थे। उसका संसार अब उसके इकलौते बेटे रामू के इर्द-गिर्द ही सिमट गया था। उसने बेटे को इतना प्यार दिया था कि धीरे-धीरे प्यार और लाड़ के बीच की सीमा ही मिट गई।
रामू बचपन में गाँव के स्कूल में पढ़ता था। एक दिन शरारत के कारण मास्टर ने उसके माथे पर छड़ी दे मारी। चोट गहरी थी और खून निकल आया।
रामू रोता हुआ घर पहुँचा।
माँ ने बेटे के माथे से बहता खून देखा तो उसका कलेजा काँप उठा। वह उसी समय स्कूल जा पहुँची।
“मेरे बच्चे को किसने मारा?”
मास्टर ने समझाने की कोशिश की—
“बहन, गलती इसकी थी...”
लेकिन सागरी देवी ने एक न सुनी।
“पढ़ाना आता नहीं और बच्चे का सिर फोड़ते हो! किसने दिया तुम्हें उसे मारने का अधिकार?”
उस दिन के बाद रामू ने स्कूल जाना छोड़ दिया।
गाँव के प्रदीप महतो ने एक दिन सागरी देवी को समझाया—
“भाभी, आजकल पढ़े-लिखे लोगों का जमाना है। रामू को पढ़ने दो।”
सागरी देवी हँस पड़ी।
“तुमने पढ़-लिखकर कौन-सा पहाड़ तोड़ दिया, प्रदीप? खेती ही तो करते हो। मेरा रामू एक फसल बोएगा और तीन साल बैठकर खाएगा।”
प्रदीप ने गंभीर होकर कहा—
“खेती भी मेहनत माँगती है, भाभी। खेत को भी आदमी की तरह समय और देखभाल चाहिए।”
लेकिन बेटे के मोह में डूबी सागरी देवी को उसकी बात समझ में नहीं आई।
रामू कोई गलती करता तो वह उसे बचा लेती।
काम नहीं करता तो कहती—
“अभी बच्चा है।”
किसी से झगड़कर आता तो कहती—
“दूसरे ने ही कुछ कहा होगा।”
खेत में नहीं जाता तो कहती—
“आज थका होगा।”
माँ का यही अंधा स्नेह धीरे-धीरे रामू के लिए ऐसी छाया बन गया, जिसके नीचे मेहनत का सूरज कभी पहुँच ही नहीं पाया।
समय बीता और रामू की शादी चमेली से हो गई।
चमेली सीधी-सादी, समझदार और मेहनती लड़की थी। उसने सोचा था कि पति-पत्नी मिलकर घर सँवारेंगे। तीन बच्चे हुए, मगर रामू की आदतें नहीं बदलीं।
चमेली बार-बार समझाती—
“घर में बच्चे हैं। खेती की जमीन है। थोड़ा मन लगाकर काम करोगे तो घर अच्छी तरह चल सकता है।”
रामू हर बार वही उत्तर देता—
“कल से करूँगा।”
लेकिन वह कल कभी नहीं आया।
आखिर एक दिन चमेली का धैर्य टूट गया। वह अपने तीनों बच्चों को लेकर मायके सुदामडीह चली गई।
मायके में भी उसका जीवन आसान नहीं था। उसके पिता को पाउच वाली शराब की बुरी लत थी। सस्ती शराब ने धीरे-धीरे उनका शरीर खोखला कर दिया। एक दिन बीमारी इतनी बढ़ गई कि खाना निगलना भी मुश्किल हो गया।
इलाज कराया गया, मगर उन्हें बचाया नहीं जा सका।
पिता की मृत्यु ने चमेली को भीतर तक तोड़ दिया।
उसे याद आया कि उसके पिता ने कितने विश्वास से उसकी शादी की थी। उन्होंने सोचा था कि बेटी खेती-किसानी वाले घर में सुखी रहेगी। उन्हें क्या पता था कि उसका पति मेहनत से इतना दूर भागता है कि एक दिन बेटी को तीन बच्चों के साथ मायके लौटना पड़ेगा।
लेकिन चमेली ने हार नहीं मानी।
उसने निश्चय किया कि वह किसी पर बोझ बनकर नहीं रहेगी।
वह हाई स्कूल तक पढ़ी थी और शिक्षा का महत्व समझती थी। वह चाहती थी कि उसके बच्चे उससे बेहतर जीवन पाएँ।
सुबह वह बच्चों को सरकारी स्कूल भेजती। वहाँ शिक्षक कम थे और काम बहुत। कभी अंडा-खिचड़ी मिलती, कभी दाल-सब्जी। बच्चों की पढ़ाई जैसी होनी चाहिए थी, वैसी नहीं हो पा रही थी।
चमेली अक्सर निजी स्कूल की गाड़ी से जाते बच्चों को देखती। साफ-सुथरी पोशाक, जूते-मोजे और कंधे पर बैग देखकर उसका मन कसक उठता।
वह मन-ही-मन कहती—
“काश! मेरे बच्चे भी ऐसे स्कूल में पढ़ पाते।”
फिर उसे रामू याद आता और उसका मन भारी हो जाता।
लेकिन केवल चिंता करने से जीवन नहीं बदलता।
चमेली ने मेहनत शुरू कर दी।
वह खदान क्षेत्र के आसपास से बिखरा हुआ कोयला चुनती और उसे बेचकर बच्चों का पेट पालती। सुबह से शाम तक मेहनत करने के बाद भी घर का खर्च और बच्चों की पढ़ाई पूरी करना कठिन था।
कई बार वह दामोदर नदी के उस पार कोयला बेचने चली जाती, जहाँ कुछ अधिक दाम मिल जाते थे। रास्ता कठिन था, जोखिम भी था, लेकिन बच्चों के भविष्य की चिंता उसके कदमों को रोक नहीं पाती थी।
लोग उसे तरह-तरह की निगाहों से देखते। कुछ पुरुष उसकी मजबूरी का गलत अर्थ निकालते। मगर चमेली की आँखों के सामने केवल उसके तीन बच्चे थे।
उसकी दुनिया उन्हीं से शुरू होती और उन्हीं पर समाप्त हो जाती।
इधर गाँव में सड़क चौड़ीकरण का काम चल रहा था।
गाँव के आखिरी छोर पर फूलचंद महतो की छोटी-सी चाय की दुकान थी। शनिवार का दिन था। मजदूरों को सप्ताह भर की मजदूरी मिली थी, इसलिए दुकान पर अच्छी-खासी भीड़ थी।
कोई चाय पी रहा था, कोई पकौड़े खा रहा था और कोई घर के लिए सामान खरीदने की चर्चा कर रहा था।
रामू भी वहाँ पहुँच गया।
पकौड़ों की खुशबू उसके नथुनों में पहुँची तो उसका मन ललचा उठा।
“फूलचंद! गरम पकौड़े देना और एक चाय भी।”
फूलचंद ने उसकी ओर देखा।
“पहले पुराना पैसा दे रामू। तेरी उधारी पहले से बहुत है।”
रामू चुप हो गया।
बगल में बैठे हरिया चाचा ने चाय खत्म की और बीड़ी सुलगाते हुए बोले—
“अरे रामू! मुझे देख। अड़सठ साल की उम्र में भी इस हफ्ते पाँच हजार रुपये कमाए हैं।”
रामू ने आश्चर्य से पूछा—
“इतना कैसे, चाचा?”
हरिया चाचा हँसे।
“मेहनत करके।”
फिर उन्होंने रामू की ओर देखते हुए कहा—
“तू जवान है। तू भी कर सकता है। मेहनत करने के लिए उम्र नहीं, मन चाहिए।”
रामू ने सिर हिलाया।
“ठीक है चाचा, मैं भी करूँगा।”
कुछ क्षण बाद उसकी नजर फिर पकौड़ों पर चली गई।
“चाचा... दस रुपये के पकौड़े और चाय मिल जाती तो मजा आ जाता।”
दुर्जन कुम्हार से रहा नहीं गया।
“वाह रे रामू! तेरी बूढ़ी माँ दिनभर गोबर बीनती है, उपले बनाकर बेचती है और तू यहाँ बैठकर पकौड़े खाने के सपने देखता है!”
दुकान पर अचानक सन्नाटा छा गया।
किसी ने हँसते हुए कहा—
“अरे रामू, घर चल। यहाँ कोई सरकारी दुकान नहीं है जो जिंदगी भर तुझे खिलाती रहे।”
कुछ लोग हँस पड़े।
रामू का चेहरा उतर गया।
तभी फणीभूषण कोइरी ने ताना मारा—
“रामू, बुरा मत मानना... मुझे तो लगता है तूने अपनी जिंदगी ही छोड़ दी है।”
रामू चुप रहा।
फणीभूषण ने बात आगे बढ़ाई—
“तू खुद तो निकम्मा है ही, अब अपनी पत्नी और बच्चों की जिम्मेदारी भी दूसरों पर छोड़ दी है।”
रामू ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा।
फणीभूषण बोला—
“तेरी पत्नी सुबह से शाम तक मेहनत करती है और तू यहाँ पकौड़े के लिए उधार माँग रहा है। कभी सोचा है, वह किन परिस्थितियों में बच्चों को पाल रही होगी?”
कल्याणी मोदी ने तुरंत टोका—
“फणी, बस करो। किसी की पत्नी के बारे में गलत बात कहना ठीक नहीं।”
लेकिन रामू के भीतर जैसे किसी ने वर्षों से बंद पड़ा दरवाजा खोल दिया था।
उसे पहली बार अपने जीवन की सच्चाई दिखाई दी।
वह बिना कुछ कहे उठ गया।
फूलचंद ने पीछे से कहा—
“रामू, रहने दे। आज पकौड़े खा ले। पैसे बाद में देना।”
लेकिन रामू ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
रास्ते भर उसके कानों में दुकान की बातें गूँजती रहीं।
“तेरी पत्नी मेहनत करती है...”
“तू खुद निकम्मा है...”
“तू अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर छोड़ रहा है...”
एक क्षण के लिए उसके मन में पत्नी के प्रति संदेह भी उठा।
लेकिन अगले ही क्षण उसने खुद को रोक लिया।
“नहीं! चमेली ऐसी नहीं है।”
वह कुछ दूर चला, फिर रुक गया।
उसके भीतर से आवाज आई—
“जिस औरत ने मेरे कारण तीन बच्चों को लेकर घर छोड़ा, जो बच्चों के लिए दिन-रात मेहनत करती है, उसी पर मैं शक कर रहा हूँ?”
उसका सिर झुक गया।
फिर उसे अपनी माँ याद आई।
सागरी देवी बूढ़ी हो चुकी थी। फिर भी वह गोबर बीनती, उपले बनाती और उन्हें बेचकर घर चलाती थी।
और वह?
जवान होकर भी माँ की कमाई पर जी रहा था।
उसने पहली बार अपने बच्चों के बारे में सोचा।
“क्या उन्हें अपने पिता पर गर्व होगा?”
उस रात रामू देर तक खपरैल की छत को देखता रहा।
नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी।
आखिर उसने धीरे से कहा—
“कल से काम करूँगा।”
अगली सुबह सूरज निकलने से पहले ही रामू की आँख खुल गई।
कुछ देर वह चुपचाप चारपाई पर पड़ा रहा।
फिर उसकी नजर कमरे के कोने में रखे पुराने फावड़े पर पड़ी।
उसने फावड़ा उठाया।
सागरी देवी की आँख खुल गई।
“कहाँ जा रहा है बेटा?”
रामू ने केवल इतना कहा—
“काम करने, माँ।”
सागरी देवी उसे देखती रह गई।
जिस बेटे को उठाने के लिए वह वर्षों से पुकारती रही थी, आज वही बिना जगाए काम के लिए निकल पड़ा था।
उस दिन रामू खेत में पहुँचा।
कुछ ही घंटों में उसके हाथों में छाले पड़ गए। कमर दर्द करने लगी। पसीने से कपड़े भीग गए।
लेकिन उस दिन उसे एक ऐसी खुशी मिली, जिसे उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था।
उसने सोचा—
“मेहनत से शरीर थकता है, लेकिन मन हल्का हो जाता है।”
अगले दिन वह फिर खेत गया।
फिर उसके अगले दिन।
जहाँ मजदूरी मिली, वहाँ काम किया। सड़क निर्माण में भी मजदूरी करने लगा।
गाँव वाले हँसते—
“देखना, दो दिन बाद फिर चारपाई पर पड़ा मिलेगा।”
रामू ने किसी को उत्तर नहीं दिया।
वह बस काम करता रहा।
दिन बीतते गए।
धीरे-धीरे खेत सँवरने लगा। घर में अनाज आने लगा।
लेकिन अब रामू की आँखों में केवल आज की रोटी नहीं थी। उसे अपने बच्चों का भविष्य भी दिखाई देने लगा था।
एक दिन प्रदीप महतो खेत पर पहुँचे।
उन्होंने रामू को काम करते देखा और कहा—
“रामू, केवल मेहनत करना ही काफी नहीं है। खेती में ज्ञान भी चाहिए।”
रामू ने पहली बार उनकी बात को गंभीरता से सुना।
“कैसे, चाचा?”
प्रदीप बोले—
“नई खेती के तरीके सीख। अच्छे बीज का चुनाव कर। मिट्टी, पानी और खाद की जरूरत समझ। मेहनत तभी ज्यादा फल देगी, जब सही दिशा में की जाए।”
रामू ने उनकी बात गाँठ बाँध ली।
उसने कृषि विभाग के लोगों से जानकारी ली, अनुभवी किसानों से मिला और खेती की नई तकनीकों को समझने लगा।
उसे अच्छे धान के बीज के बारे में जानकारी मिली। उसने बासमती की खेती करने का निर्णय लिया।
उसने खेत तैयार किया।
समय पर बीज डाला।
खाद और पानी का ध्यान रखा।
फसल को कीटों और रोगों से बचाने के उपाय सीखे।
जिस आदमी को कभी खेत बोझ लगता था, वही अब सुबह खेत पहुँचने वाला पहला आदमी और शाम को लौटने वाला आखिरी आदमी बन गया।
कुछ महीनों बाद खेत में धान की बालियाँ लहलहा उठीं।
हवा चलती तो पूरा खेत एक साथ झूम उठता।
रामू खेत के किनारे खड़ा देर तक उस दृश्य को देखता रहा।
उसकी आँखों में चमक थी।
“इतनी अच्छी फसल...!”
फसल बिकी तो उसे पहले से कहीं अधिक आमदनी हुई।
रामू ने सारी रकम खर्च नहीं की।
कुछ घर में रखा, कुछ अगली खेती के लिए लगाया और कुछ बचा लिया।
समय के साथ उसकी खेती बढ़ती गई।
और एक दिन वह ट्रैक्टर लेकर गाँव में लौटा।
बच्चे उसके पीछे दौड़ने लगे—
“रामू चाचा ट्रैक्टर लाए हैं!”
गाँव के वही लोग, जो कभी उसे निकम्मा कहते थे, अब उसे सम्मान की नजर से देखने लगे।
लेकिन रामू के भीतर घमंड नहीं आया।
उसे मालूम था कि यह सब अचानक नहीं हुआ।
यह उस सुबह शुरू हुआ था, जब उसने पहली बार चारपाई छोड़कर फावड़ा उठाया था।
एक दिन रामू ने सुदामडीह जाने का निश्चय किया।
चमेली घर के बाहर बच्चों के कपड़े धो रही थी।
रामू को सामने देखकर वह कुछ क्षण चुप रही।
रामू ने सिर झुका लिया।
“चमेली... मुझे माफ कर दो।”
चमेली ने शांत स्वर में पूछा—
“माफी मुझसे क्यों माँग रहे हो?”
रामू के पास कोई उत्तर नहीं था।
चमेली ने कहा—
“अपने बच्चों से माँगो। उनके पिता होकर तुमने उनके लिए क्या किया?”
रामू की आँखें भर आईं।
वह बच्चों के पास गया।
तीनों उसे चुपचाप देख रहे थे।
रामू ने धीमे स्वर में कहा—
“बच्चों... तुम्हारा बाप अब आलसी नहीं रहा।”
बड़ा बेटा कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर धीरे-धीरे आगे आया और उसका हाथ पकड़ लिया।
रामू की आँखों से आँसू बह निकले।
उसने बेटे को सीने से लगा लिया।
उस क्षण उसे समझ में आया—
पिता होना केवल बच्चों को जन्म देना नहीं है; उनके भविष्य की जिम्मेदारी उठाना भी है।
चमेली ने रामू में आया परिवर्तन अपनी आँखों से देखा था।
उसका मन धीरे-धीरे पिघलने लगा।
उसने रामू को एक और अवसर देने का निर्णय लिया।
रामू के लिए इससे बड़ा पुरस्कार कोई नहीं था।
समय के साथ रामू का शरीर भी बदल गया।
पहले वह बिना काम किए चारपाई पर पड़ा-पड़ा भारी हो गया था। अब दिनभर खेत में काम करने से उसका शरीर मजबूत हो गया था।
लेकिन शरीर से बड़ा परिवर्तन उसके मन में आया था।
पहले सुबह उसकी चिंता होती थी—
“आज काम से कैसे बचूँ?”
अब सुबह आँख खुलते ही सोचता—
“आज क्या काम करना है?”
एक दिन प्रदीप महतो उसके खेत पर पहुँचे।
रामू ट्रैक्टर से खेत तैयार कर रहा था।
प्रदीप हँसकर बोले—
“क्यों रे रामू! याद है, तेरी माँ कहा करती थी—एक फसल बोएगा और तीन साल बैठकर खाएगा?”
रामू हँस पड़ा।
“चाचा, अब समझ में आया है कि फसल केवल खेत में नहीं बोई जाती।”
प्रदीप ने पूछा—
“फिर कहाँ बोई जाती है?”
रामू ने ट्रैक्टर बंद किया और कुछ क्षण खेत की ओर देखते हुए कहा—
“आदमी अपने जीवन में भी फसल बोता है। मेहनत बोएगा तो सम्मान काटेगा और आलस्य बोएगा तो पछतावा।”
प्रदीप ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया।
“अब तू सच में बड़ा हो गया, रामू।”
रामू कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला—
“चाचा, मेरी सबसे बड़ी गलती यही थी कि मैं अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी दूसरों पर डालता रहा। कभी माँ पर, कभी किस्मत पर और कभी हालात पर। जिस दिन जिम्मेदारी अपने हाथ में ली, उसी दिन जिंदगी बदलनी शुरू हो गई।”
पास ही खड़ी सागरी देवी यह सब सुन रही थी।
उसकी आँखों में आँसू थे।
उसे बेटे पर गर्व भी था और अपने पुराने अंधे लाड़-प्यार पर पछतावा भी।
अंतिम दृश्य
शाम हो चुकी थी।
सूरज पश्चिम के आकाश में धीरे-धीरे उतर रहा था। खेतों पर सुनहरी रोशनी बिखर रही थी।
रामू खेत के बीच खड़ा था और चमेली कुछ दूरी पर उसके पास खड़ी थी।
चमेली को उस समय अपने पिता की एक बात याद आ गई—
“देखना बेटी, एक दिन तू राज करेगी। रामू के पास जो संपत्ति है, उसे सँभालकर रखना।”
उसने कभी नहीं सोचा था कि यह बात इस तरह सच होगी।
आज उसके सामने वही खेत थे, जिन्हें उसने कभी चिंता और अभाव की नजर से देखा था। आज उन्हीं खेतों में समृद्धि की हरियाली लहरा रही थी।
रामू ने झुककर मिट्टी उठाई।
उसने मिट्टी को अपनी हथेली पर रखा और कुछ क्षण उसे देखता रहा।
यही मिट्टी कभी उसे बोझ लगती थी।
आज यही मिट्टी उसके जीवन का सहारा थी।
उसे लगा जैसे मिट्टी के प्रत्येक कण से एक ही आवाज उठ रही हो—
“मेहनत करने वाले के लिए देर हो सकती है, अँधेरा हो सकता है, लेकिन रास्ता कभी बंद नहीं होता।”
रामू ने मिट्टी को फिर खेत में छोड़ दिया।
चमेली उसके पास आकर खड़ी हो गई।
दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
फिर घर की ओर चल पड़े।
अब रामू को चारपाई नहीं बुलाती थी।
उसे खेत बुलाते थे।
उसे काम बुलाता था।
उसे उसके बच्चे बुलाते थे।
और सबसे बढ़कर—
उसे उसका नया जीवन बुलाता था।
उस दिन से रामू ने दूसरों की कमियाँ गिनना छोड़ दिया।
उसने अपने हाथों की ताकत पहचान ली थी।
और शायद यही उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी फसल थी।
सीख
बच्चों से प्रेम करना माता-पिता का स्वाभाविक धर्म है, लेकिन अंधा लाड़-प्यार उनके भविष्य को कमजोर कर सकता है। बच्चों को केवल सुख देना पर्याप्त नहीं; उन्हें मेहनत, अनुशासन, जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता का मूल्य सिखाना भी जरूरी है।
मनुष्य चाहे कितनी ही देर से क्यों न जागे, यदि वह सच्चे मन से अपनी दिशा बदल ले तो सुधार का रास्ता कभी बंद नहीं होता।
कभी-कभी जिंदगी बदलने के लिए किसी चमत्कार की आवश्यकता नहीं होती।
एक सच्ची बात, एक गहरा आत्मबोध और उठाया हुआ पहला कदम—इतना ही काफी होता है। 🌾🙏🏻
जयगुरु 🙏🏻 🙏🏻
वंदे पुरुषोत्तमम
चंद्रा सत्संग केंद्र
बोकारो (झारखंड)