चांदनी - 1 Vandna Sharma द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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चांदनी - 1



चांदनी  
लेखिका: वंदना शर्मा

यह कहानी एक ऐसी लड़की की है जो बचपन से ही जिद्दी और बड़बोला थी। चार भाई-बहनों में सबसे छोटी होने के कारण उसे अत्यधिक लाड-प्यार मिला था। इसी लाड में वह थोड़ी बिगड़ भी गई थी। उसके पापा भी बात को बहुत सफाई से घुमाकर बोलते थे। शायद इसी कारण चांदनी भी बचपन से ही झूठ बोलने में माहिर हो गई थी। वह इतनी सफाई से झूठ बोलती कि पकड़ना मुश्किल हो जाता, पर ज्यादा बोलने वाले अक्सर खुद ही अपनी पोल खोल देते हैं और उसका भी यही होता।

चांदनी का व्यक्तित्व आकर्षक था। पतली-दुबली, लंबी, हिरनी जैसी आंखें और सबसे खास उसकी मधुर आवाज। पर इस मधुरता के साथ उसमें हर बात पर बहस करने की आदत भी थी। एक बार अगर उसका रेडियो बज जाए तो 8 घंटे तक बंद होने का नाम न ले। दरअसल गलती उसकी परवरिश में थी। उसे "ना" सुनने की आदत ही नहीं थी। कोई उसकी बात बीच में काट दे या उसे गलत कह दे तो उसका पारा सातवें आसमान पर पहुंच जाता।

समय बीता और चांदनी की शादी एक पारंपरिक, धार्मिक घर में हो गई। जहां रीति-रिवाजों को सबसे ऊपर रखा जाता था। घर के छोटे बेटे सोहन से उसकी शादी हुई थी। स्वाभाविक है कि बड़ी बहू से उसकी तुलना बनती ही थी। पर बहू बनने के बाद भी चांदनी ने अपना बचपना नहीं छोड़ा। जोर-जोर से हंसना, छोटी-छोटी बात पर झगड़ा करना और घर के काम से बचने के बहाने बनाना उसकी दिनचर्या बन गई।

सोहन स्वभाव से संस्कारी और कम बोलने वाला लड़का था। वह उदारवादी और सुलझा हुआ था। उसने सोचा कि पत्नी को उसकी मर्जी से जीने की आजादी देनी चाहिए। इसलिए उसने चांदनी को कभी ऊंची आवाज में नहीं डांटा। न कभी टोका। बस हर बात में "हां" में हां मिलाता रहा। सोहन आदर्श पति बनने की होड़ में ये भूल गया कि वह इस घर का बेटा भी है और उसे बड़ों का मान-सम्मान सिखाना भी है।

पति की इस आजादी का फायदा उठाकर चांदनी ने घर में सबका अपमान करना शुरू कर दिया। वह साफ कहती - "जब मेरे पति को कोई दिक्कत नहीं है, तो तुम लोग कौन होते हो मुझे कुछ कहने वाले।" धीरे-धीरे घर के सभी सदस्य उसके इस व्यवहार से दुखी हो गए।

इसी बीच सोहन की नौकरी दूसरे शहर में लग गई। शुरू में उसने फैसला किया कि पहले वह अकेले जाकर वहां सब सेट कर लेगा, फिर चांदनी को बुला लेगा। पर चांदनी का शातिर दिमाग खाली नहीं बैठ सकता था। उसने सास-ससुर से झूठ बोला कि सोहन ने उसका टिकट बुक करवा दिया है और उसे तुरंत बुलाया है। ससुर से झूठ बोलकर उसने अपना बैग पैक किया और अकेले ही सोहन के पास दूसरे शहर पहुंच गई।

सोहन उसे अचानक देखकर खुश तो हुआ, पर उसने एक बार भी ये नहीं पूछा कि बिना बताए और झूठ बोलकर आने की क्या जरूरत थी। दो-चार दिन में तो उसे वैसे भी बुलाना ही था। सोहन की इस चुप्पी ने चांदनी को और हवा दे दी।

अब चांदनी के पर निकल आए थे। छोटे शहर की लड़की अब बड़े शहर की चमक-दमक में खो गई। सोहन की लापरवाही और चुप्पी ने उसे बेशर्म और ढीठ बना दिया था। उसने घर में काम के लिए कामवाली रख ली और खुद सारा दिन मोबाइल में लगी रहने लगी। 

उसने छोटे-छोटे कपड़े पहनकर वीडियो बनाना शुरू कर दिया। अब वह बाजार में, सड़क पर, पार्क में, जहां मौका मिलता वीडियो बना लेती। उसे इस बात से फर्क नहीं पड़ता था कि लोग क्या सोचेंगे। झूठ बोलने और अभिनय करने में तो वह बचपन से ही पारंगत थी।

सोहन चुपचाप सब देखता। कभी कुछ कहता भी तो चांदनी एक ही जवाब देती - "मेरी लाइफ है, मैं जैसे जीना चाहूं जीऊंगी।" 

क्या एक पति की चुप्पी और एक पत्नी की आजादी रिश्ते को बचा पाएगी? या चमक-दमक की इस दौड़ में चांदनी अपना घर, अपना सम्मान सब गंवा देगी?

इसका जवाब शायद समय के पास है। आगे क्या हुआ जानने के लिए पढ़े अगला भाग चांदनी 2

समाप्त (क्रमशः)
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली