यह बात वर्ष 2021 की है। उन दिनों मैं बिहार में थी और सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही थी। पढ़ाई के बीच जीवन बहुत साधारण ढंग से चल रहा था। तभी हमारे एक रिश्तेदार के यहाँ शादी का निमंत्रण आया। शादी छपरा में थी, जो हमारे घर से कुछ दूर पड़ता था। रिश्तेदारों ने मुझे भी साथ चलने के लिए कहा और मैं खुशी-खुशी उनके साथ चली गई।
शादी का माहौल बहुत ही खुशियों भरा था। घर मेहमानों से भरा हुआ था। कोई गाने गा रहा था, कोई नाच रहा था, तो कोई शादी की तैयारियों में व्यस्त था। दिन कब बीत जाते थे, पता ही नहीं चलता था। हम सभी खूब हँसते, बातें करते और हर पल का आनंद लेते थे।
इतने बड़े परिवार और मेहमानों की भीड़ में काम भी बहुत था। इसलिए घरवालों ने एक काम करने वाली आंटी को मदद के लिए रखा था। वे पूरे दिन रसोई और घर के दूसरे कामों में लगी रहती थीं। उनके साथ उनका लगभग पाँच साल का छोटा बेटा भी आया था। वह नन्हा बच्चा पूरे दिन इधर-उधर खेलता रहता था। कभी आँगन में दौड़ता, कभी बच्चों के साथ खेलता और कभी किसी कोने में जाकर बैठ जाता।
शादी के कारण घर में जगह कम पड़ गई थी। इसलिए नीचे पुआल बिछाकर उसके ऊपर बड़े-बड़े बिस्तर लगाए गए थे, जहाँ रात को सब लोग साथ सोते थे।
एक शाम हम सब लड़कियाँ एक कमरे में बैठकर एक-दूसरे को मेहंदी लगा रही थीं। हँसी-मज़ाक का माहौल था। तभी मैंने देखा कि वे आंटी अपने बेटे को ढूँढ़ रही थीं। उनकी आवाज़ बार-बार सुनाई दे रही थी—
“बबुआ कहाँ बा? बबुआ केहूँ देखलस का?”
उनकी आवाज़ में चिंता साफ झलक रही थी।
थोड़ी देर बाद पता चला कि उनका बेटा खेलते-खेलते हमारे ही आसपास कहीं सो गया था। आंटी ने उसे ढूँढ़ लिया, प्यार से अपनी गोद में उठाया और वहाँ से चली गईं। हम फिर अपनी बातों और मेहंदी में व्यस्त हो गए।
कुछ देर बाद मुझे बाहर वॉशरूम जाना था। जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला और आँगन की ओर देखा, मेरी नज़र एक ऐसे दृश्य पर पड़ी जिसे मैं आज तक नहीं भूल पाई हूँ।
आँगन के एक कोने में वही आंटी ज़मीन पर बैठी थीं। उनकी गोद में उनका बेटा था, जिसकी आँखें अभी-अभी नींद से खुली थीं। शायद अचानक उन्हें याद आया था कि उनका बच्चा बिना खाना खाए ही सो गया है। इसलिए वे उसे उठाकर खाना खिला रही थीं।
दिन भर दूसरों के लिए काम करने वाली वह माँ उस समय केवल एक माँ थी।
वह अपने बेटे को प्यार से कौर तोड़-तोड़कर खिला रही थीं। बच्चा उनींदी आँखों से खाना खा रहा था और माँ उसके सिर पर हाथ फेर रही थी। उस पल उनके चेहरे पर जो ममता थी, उसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।
मैं कुछ क्षण वहीं खड़ी रह गई।
न जाने क्यों, मेरी आँखें भर आईं। उस दृश्य ने मुझे अपनी माँ की याद दिला दी। मुझे लगा कि चाहे कोई कितना भी गरीब हो, कितना भी थका हुआ हो, माँ का प्यार कभी कम नहीं होता। दिन भर की मेहनत, थकान और जिम्मेदारियों के बाद भी एक माँ को सबसे पहले अपने बच्चे की चिंता होती है।
उस रात मैंने माँ के प्यार को किसी किताब में नहीं, बल्कि अपनी आँखों के सामने देखा था।
आज भी जब उस शादी की याद आती है, तो न गाने याद आते हैं, न नाच और न ही शादी की चहल-पहल। सबसे पहले जो दृश्य मेरी आँखों के सामने उभरता है, वह एक माँ का अपने सोए हुए बच्चे को उठाकर उसे खाना खिलाना है।
शायद इसी का नाम माँ का प्यार है।