वो आखिरी मुलाकात
ट्रेन को प्लेटफॉर्म पर आने में अभी थोड़ा समय था। हम दोनों साथ बैठे थे, लेकिन उस खामोशी में भी बहुत कुछ कहा जा रहा था। मैं सामने खड़े लोगों को, आती-जाती ट्रेनों को और प्लेटफॉर्म की भीड़ को देखने की कोशिश कर रही थी, लेकिन बार-बार मेरी आँखें आँसुओं से भर जातीं। सब कुछ धुंधला दिखाई देने लगता था।
ऐसा लग रहा था जैसे मेरी आँखों के सामने पूरी दुनिया थी, लेकिन मैं सिर्फ उसे देख पा रही थी। हम दोनों के आँसू एक-दूसरे से बातें कर रहे थे। जुबान खामोश थी, लेकिन दिल सब कुछ कह रहे थे।
वह बीच-बीच में मुझे अपने सीने से लगा लेता और मैं किसी छोटे बच्चे की तरह उससे लिपट जाती। उस पल मुझे ऐसा लग रहा था जैसे अगर मैंने उसे छोड़ दिया, तो शायद मेरे अंदर का कुछ हिस्सा भी मुझसे दूर चला जाएगा।
कुछ देर बाद प्लेटफॉर्म पर ट्रेन के आने की आवाज सुनाई दी। ट्रेन धीरे-धीरे हमारे सामने आकर रुक गई। मेरा दिल जैसे एक पल के लिए रुक गया था। मैं चाहती थी कि समय वहीं ठहर जाए। काश उस पल को अपनी मुट्ठी में बंद कर पाती और कभी खत्म न होने देती।
सर्दियों का मौसम था। वैसे भी सर्दियों में दिन छोटे होते हैं, और फरवरी... फरवरी ने तो हमेशा मेरी जिंदगी से कुछ न कुछ छीना ही था।
मेरे पास बहुत सारा सामान था। मैं हमेशा के लिए दिल्ली छोड़कर मुंबई जा रही थी। एक नई शुरुआत के लिए, एक नई जिंदगी के लिए। लेकिन मेरा दिल वहीं पीछे छूट रहा था, उसके पास।
उसने मेरा सारा सामान ट्रेन में रखा। फिर बहुत ध्यान से मुझे बताया कि कौन-सा सामान कहाँ रखा है। छोटी-छोटी बातों का भी ख्याल रख रहा था, जैसे हमेशा रखता आया था।
सारा सामान रखने के बाद वह मेरे पास आकर बैठ गया। कुछ देर तक बस मुझे देखता रहा। उसकी आँखों में दर्द था और मेरी आँखों में भी। वह मुझे देखता और रोता रहा, और मैं भी अपने आँसू रोक नहीं पा रही थी।
फिर उसने धीरे से कहा,
"तू हमेशा खुश रहना। मैं बस तेरी खुशी चाहता हूँ।"
उसकी ये बात सुनकर मेरा दिल टूट गया। मैं रोते हुए बोली,
"तू है तो मैं खुश हूँ... वरना नहीं।"
वह मेरी तरफ देखकर बोला,
"नहीं, तुझे हमेशा खुश रहना है।"
शायद वह जानता था कि हमारी राहें अलग हो रही हैं, लेकिन फिर भी वह मेरी खुशी की दुआ कर रहा था।
वक्त सच में रेत की तरह होता है। जितना उसे रोकने की कोशिश करो, उतनी ही तेजी से हाथों से फिसल जाता है।
ट्रेन चलने का समय हो गया। वह धीरे से नीचे उतर गया और मैं दरवाजे पर खड़ी हो गई। वह बार-बार यही कह रहा था,
"ठीक से रहना... ठीक से जाना..."
वह अपने आँसू बार-बार पोंछ रहा था, लेकिन दर्द उसकी आँखों से साफ दिखाई दे रहा था।
मैं फूट-फूटकर रो रही थी। उस पल मैं खुद को संभाल नहीं पा रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपना बहुत दूर जा रहा हो।
उसने जाते-जाते मेरी एक तस्वीर भी ली थी। शायद उस तस्वीर में वह आखिरी पल कैद करना चाहता था।
अचानक ट्रेन की सीटी बजी और ट्रेन धीरे-धीरे चलने लगी। मैं दरवाजे पर खड़ी उसे देखती रही। कुछ ही पलों में वह मेरी आँखों से ओझल हो गया।
मैं अंदर से पूरी तरह टूट गई थी। शायद वह भी उतना ही टूटा होगा। लेकिन वक्त ने कभी किसी के दर्द के लिए अपना रास्ता नहीं बदला।
मैंने उसे आखिरी बार उसी दिन देखा था।
हमारा प्यार भी सच्चा था और हमारा दर्द भी, लेकिन दोनों वक्त के सामने हार गए।
अगले दिन मैं मुंबई पहुँच गई। पापा स्टेशन पर लेने आए थे। कुछ दिनों बाद जिंदगी फिर अपनी रफ्तार पकड़ने लगी। मैंने नई नौकरी शुरू कर दी, नए लोगों से मिली, नई जगह को अपना बनाने की कोशिश की।
लेकिन मेरी जिंदगी में एक चीज कभी नहीं बदली...
वह था मेरा प्यार उसके लिए।
कुछ लोग जिंदगी से दूर चले जाते हैं, लेकिन दिल से कभी दूर नहीं होते।