भीड़ में अकेली - 4 Alok Mishra द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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भीड़ में अकेली - 4

अध्याय–4 : अधूरी इच्छाएँ

     रविवार की सुबह थी। आज महेश घर पर था। उमा ने सोचा, शायद आज कुछ अलग होगा। उसने नाश्ते में महेश की पसंद के आलू के पराठे बनाए, दही रखा, अचार निकाला और चाय की केतली मेज़ पर रख दी। महेश अख़बार के साथ बैठा था । एक हाथ में चाय का कप था, दूसरे हाथ में मोबाइल।

"पराठे कैसे बने हैं?" उमा ने उत्सुकता से पूछा।

महेश ने बिना ऊपर देखे कहा, "अच्छे हैं।"

बस इतना ही। कभी-कभी एक शब्द भी पर्याप्त होता है, यदि उसमें अपनापन हो लेकिन केवल औपचारिकता से निकला हुआ शब्द पेट तो भर सकता है, मन नहीं। नाश्ते के बाद महेश फिर अपने कमरे में चला गया।

"ऑफिस का थोड़ा काम है," उसने जाते-जाते कहा।

उमा बालकनी में आकर बैठ गई। नीचे पार्क में बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे। एक छोटी-सी बच्ची साइकिल चलाना सीख रही थी। हर बार गिरती, फिर उठ जाती। उसके पिता मुस्कुराकर उसका हाथ पकड़ लेते। उमा की आँखें उसी दृश्य पर टिक गईं। उसे याद आया—कभी उसके भी ऐसे ही सपने थे।

मोबाइल पर संदेश आया।

शोभित: "आज रविवार है। क्या योजना है?"

उमा ने लिखा—"योजना? मेरी ज़िंदगी में अब योजनाएँ नहीं होतीं, केवल दिन होते हैं।"

कुछ क्षण बाद शोभित ने पूछा—"क्या मैं आज तुम्हारे अतीत के बारे में जान सकता हूँ?"

उमा ने पहली बार बिना झिझक लिखना शुरू किया।"मैं बचपन से पढ़ने में अच्छी थी। गणित मुझे कविता की तरह लगता था। लोग कहते थे कि लड़कियाँ गणित से डरती हैं, लेकिन मुझे संख्याएँ दोस्त लगती थीं। कॉलेज में कई बार भाषण प्रतियोगिताएँ जीतीं। मैं पढ़ाना चाहती थी। मेरे प्रोफ़ेसर कहते थे कि मुझे विश्वविद्यालय में ही रहना चाहिए। तब मुझे लगता था कि मेरी अपनी पहचान होगी फिर शादी हो गई। मैंने सोचा था कि दो लोग मिलकर एक-दूसरे के सपनों को पूरा करेंगे लेकिन धीरे-धीरे मेरे सपने 'हम' के भीतर कहीं खो गए।"

शोभित ने पूछा—"महेश ने कभी रोका?"

उमा ने उत्तर दिया—"नहीं। उन्होंने कभी ज़बरदस्ती नहीं की। शायद यही सबसे बड़ी उलझन है। उन्होंने केवल इतना कहा कि नौकरी की ज़रूरत नहीं। बाकी निर्णय मैंने स्वयं लिया। आज सोचती हूँ कि कई बार प्रेम में लिया गया निर्णय भी अपने विरुद्ध हो जाता है।"

शोभित कुछ देर तक मौन रहा।   फिर उसने लिखा—"तुम्हें सबसे अधिक किस बात का दुख है?"

उमा ने लंबा उत्तर नहीं दिया। उसने केवल लिखा—"मैं धीरे-धीरे अपने ही जीवन की दर्शक बन गई।"

  उस दिन शाम तक दोनों की बातचीत चलती रही। उमा ने अपने कॉलेज के दिनों की बातें बताईं।

कैसे वह मित्रों के साथ घंटों पुस्तकालय में बैठती थी।

कैसे वह वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में भाग लेती थी।

 कैसे उसे पहली बार किसी छात्र ने गुलाब दिया था और उसने हँसते हुए लौटा दिया था।

"क्यों?" शोभित ने पूछा।

"क्योंकि मुझे प्रेम से ज़्यादा अपने सपनों पर भरोसा था।"

"और अब?"

"अब कभी-कभी लगता है, सपने भी इंसानों की तरह छूट जाते हैं।"

कुछ देर बाद शोभित ने लिखा—"अब मेरी बारी।"

उमा ने मुस्कराते हुए लिखा—"हाँ, अब तुम भी कुछ बताओ। हमेशा प्रश्न पूछते रहते हो।"

कुछ मिनट तक कोई संदेश नहीं आया। फिर धीरे-धीरे शब्द उभरने लगे।

"मैं एक छोटे शहर में पला-बढ़ा। पिताजी बैंक में थे। माँ अध्यापिका।

घर में किताबें थीं, संगीत था और बहुत अनुशासन। कॉलेज में मुझे एक लड़की से प्रेम हुआ। हम दोनों ने साथ जीवन बिताने के सपने देखे थे।

लेकिन उसके परिवार ने उसकी शादी कहीं और कर दी।उस दिन पहली बार समझ आया कि हर प्रेम विवाह तक नहीं पहुँचता।

मैं टूट गया था। बहुत दिनों तक किसी से बात नहीं की।फिर एक दिन एक बुज़ुर्ग प्रोफ़ेसर ने मुझसे कहा—"दर्द दो तरह के होते हैं। एक तुम्हें कठोर बना देता है, दूसरा तुम्हें दूसरों का दर्द समझना सिखा देता है।

"'शायद उसी दिन मैंने तय किया कि मैं लोगों को सुनूँगा।सलाह बाद में दूँगा।" उमा ने संदेश पढ़कर मोबाइल सीने से लगा लिया। अब वह समझ गई थी कि शोभित केवल बोलता नहीं, उसने जीवन से सीखा भी है। 

उसने लिखा—"शायद इसी कारण तुम मुझे बीच में नहीं टोकते।"

"शायद। क्योंकि मुझे पता है कि जब मन भरा हो, तब सलाह नहीं, जगह चाहिए होती है।"

रात के नौ बजे महेश कमरे से बाहर आया।"कॉफी मिलेगी?" उसने पूछा।

"अभी बनाती हूँ।" कॉफी बनाते समय उमा ने अचानक कहा—"महेश, क्या तुम्हें याद है कि मैं कॉलेज में पढ़ाती थी?"

महेश ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा।"हाँ... क्यों?"

"बस ऐसे ही पूछ रही थी।"

"अगर तुम्हारा मन हो तो फिर से कोशिश कर सकती हो।"उमा ठिठक गई।

"सच?"

"हाँ... मैंने कभी मना तो नहीं किया।"

उमा कुछ क्षण चुप रही। वह समझ गई कि समस्या केवल महेश नहीं था। समस्या संवाद की कमी भी थी। दोनों ने वर्षों तक एक-दूसरे के मन की बात पूछी ही नहीं। कॉफी का कप महेश ने हाथ में लिया और सहज भाव से कहा—"वैसे... तुम्हें पढ़ाते हुए देखना अच्छा लगेगा।" यह वाक्य छोटा था, लेकिन उमा के भीतर जैसे किसी बंद खिड़की का कुंडा खुल गया। उस रात उसने शोभित को सब बताया।

शोभित ने उत्तर दिया—"देखा... कई बार हम अपने मन में जो कहानी लिख लेते हैं, सामने वाला उससे अनजान होता है। इसलिए संवाद ज़रूरी है।"

उमा ने लिखा—"लेकिन जो साल बीत गए?"

"समय लौटकर नहीं आता, लेकिन आने वाला समय अभी भी तुम्हारे पास है। प्रश्न यह है कि तुम उसे कैसे जीना चाहती हो।"

उमा ने पहली बार बिना किसी उदासी के लिखा—"मैं फिर से पढ़ाना चाहती हूँ।"

शोभित ने तुरंत उत्तर दिया—"और लिखना भी।"

उमा मुस्कराई। उसने अपनी पुरानी डायरी निकाली।पहले पन्ने पर लिखा—"मैं केवल किसी की पत्नी नहीं हूँ। मैं उमा हूँ। और शायद आज वर्षों बाद मैं अपने नाम से फिर मिल रही हूँ।"

  खिड़की के बाहर रात गहरी थी लेकिन भीतर, बहुत धीरे-धीरे, एक नया सवेरा आकार लेने लगा था।

शेष अगले भाग में........      

आलोक मिश्रा " मनमौजी "