अध्याय–3 : चैट की आदत
कहते हैं कि मनुष्य किसी भी आदत का बंदी बन सकता है। किसी को चाय की आदत होती है, किसी को किताबों की, किसी को सन्नाटे की और किसी को किसी एक आवाज़ की। उमा को अब हर सुबह मोबाइल की स्क्रीन देखने की आदत होने लगी थी। महेश रोज़ की तरह सात बजे घर से निकल जाता। उसके जाने के कुछ मिनट बाद मोबाइल की स्क्रीन जगमगा उठती—
"सुप्रभात, उमा! आज सूरज देखा?"
पहले-पहल उमा केवल दो-तीन शब्दों में उत्तर देती थी।
"हाँ।"
"जी।"
"ठीक हूँ।"
लेकिन धीरे-धीरे उन छोटे उत्तरों ने वाक्यों का रूप ले लिया। अब वह लिखने लगी थी—
"आज बालकनी में एक नई चिड़िया आई थी।"
"आज बारिश हुई, मिट्टी की खुशबू बहुत अच्छी लगी।"
"आज मन बिना कारण उदास है।"
शोभित हर बात का उत्तर देता, लेकिन कभी अनावश्यक उत्सुकता नहीं दिखाता। उसने न उमा की तस्वीर माँगी, न पता, न पति का नाम।
उमा ने एक दिन पूछा—
"तुम कुछ पूछते क्यों नहीं?"
शोभित ने लिखा—"जो व्यक्ति बताना चाहेगा, वह बिना पूछे भी बता देगा। और जो नहीं बताना चाहता, उससे पूछना उसके विश्वास पर बोझ डालना है।"
उमा बहुत देर तक उस संदेश को पढ़ती रही। वह पहली बार किसी ऐसे व्यक्ति से मिली थी, जो जानने से अधिक समझने की कोशिश करता था।उस दिन बारिश हो रही थी। खिड़की के शीशों पर पानी की बूँदें मोतियों की तरह चिपकी थीं। उमा ने चाय बनाई और कप लेकर बालकनी में बैठ गई।मोबाइल पर संदेश आया—
"बारिश पसंद है?"
उमा मुस्कराई।
"बहुत।"
"भीगती हो?"
"शादी से पहले भीगती थी। अब नहीं।"
"क्यों?"
"अब कौन डाँटेगा, कौन हँसेगा, कौन साथ भीगेगा?"
शोभित कुछ देर तक मौन रहा। फिर उसने लिखा—
"कई बार बारिश बाहर नहीं, भीतर रुक जाती है।"
उमा ने पहली बार स्वीकार किया—
"तुम्हारी बातें किताब जैसी लगती हैं।"
"और तुम्हारी बातें अधूरी कहानी जैसी।"
उस दिन पहली बार उमा खुलकर हँसी। रात को महेश सामान्य से थोड़ा जल्दी घर लौट आया। उमा ने सोचा, आज शायद साथ बैठकर चाय पी जाएगी।
"चाय बनाऊँ?" उसने उत्साह से पूछा।
"नहीं, बहुत थक गया हूँ।"
महेश सीधे अपने कमरे में चला गया।कुछ देर बाद उसके लैपटॉप की स्क्रीन चमक उठी। उमा दरवाज़े पर खड़ी रही।
"कुछ बात करनी थी..." उसने धीमे स्वर में कहा।
महेश ने बिना नज़र उठाए उत्तर दिया—"कल कर लेंगे न, आज सचमुच बहुत काम है।
"उमा ने धीरे से दरवाज़ा बंद कर दिया।वह जानती थी—'कल' अक्सर कभी नहीं आता। रात ग्यारह बजे शोभित का संदेश आया।
"आज उदास लग रही हो।"
उमा चौंक गई।
"तुम्हें कैसे पता?"
"आज तुम्हारे उत्तर छोटे हैं। जब तुम दुखी होती हो, शब्द कम हो जाते हैं।"
उमा के भीतर कुछ पिघल गया। जिस व्यक्ति ने उसे कभी देखा नहीं, वह उसके शब्दों का वजन पहचानने लगा था।उसने लिखा—
"क्या तुम सचमुच इतने अच्छे हो या केवल लिखना जानते हो?"
शोभित हँसा।
"शायद दोनों में से कोई भी नहीं। मैं बस कोशिश करता हूँ कि सामने वाले को बीच में टोकूँ नहीं।"
कुछ दिनों बाद बातचीत अतीत तक पहुँच गई।शोभित ने पूछा—
"बचपन कैसा था?"
उमा जैसे वर्षों पीछे लौट गई।
"बहुत सुंदर। हम छोटे शहर में रहते थे। पिताजी स्कूल में शिक्षक थे। माँ हर रविवार मेरे लिए खीर बनाती थीं। घर बड़ा नहीं था, लेकिन उसमें आवाज़ें बहुत थीं। शाम को सब साथ बैठते थे। कोई किताब पढ़ता, कोई रेडियो सुनता, कोई हँसता..."
फिर अचानक उसने लिखना रोक दिया। कुछ मिनट बाद दूसरा संदेश आया—
"शायद मैं उसी घर को आज भी खोजती हूँ।"
शोभित ने पूछा—"और मिला?"
"घर मिल गया, लेकिन अपनापन नहीं।"
अगले दिन शोभित ने कोई संदेश नहीं भेजा। सुबह नौ बजे तक स्क्रीन शांत रही।दस बजे तक भी कोई संदेश नहीं आया। उमा बार-बार मोबाइल उठाती और रख देती।उसने स्वयं को समझाया—"क्या हो गया है मुझे? वह कोई अपना तो नहीं।"लेकिन मन तर्क कहाँ मानता है?ग्यारह बजे उसने स्वयं संदेश भेज दिया—
"सब ठीक है?"
करीब आधे घंटे बाद उत्तर आया—
"माफ़ करना। अस्पताल में था।"
उमा घबरा गई।
"क्या हुआ?"
"पिताजी की तबीयत अचानक बिगड़ गई थी। अब ठीक हैं।"
उमा ने पहली बार बिना सोचे लिखा—
"अपना ध्यान रखना और अंकल का भी।"
शोभित ने उत्तर दिया—"धन्यवाद। अच्छा लगा कि किसी ने पूछा।"
उमा ने मोबाइल बंद कर दिया। उसके चेहरे पर एक अनजानी शांति थी। उसे महसूस हुआ कि यह रिश्ता केवल उसके अकेलेपन का सहारा नहीं रहा; अब उसमें दूसरे की चिंता भी शामिल हो चुकी थी।यही वह क्षण था जहाँ दोस्ती जन्म लेती है। रात को महेश ने अचानक पूछा—"आजकल तुम मोबाइल थोड़ा ज़्यादा देखने लगी हो?"
उमा एक पल के लिए चौंक गई।"ऐसे ही... समय कट जाता है।"
महेश ने सहज भाव से कहा—"ध्यान रखा करो। आजकल ऑनलाइन बहुत धोखाधड़ी होती है।"
उमा ने उसकी ओर देखा। वह चाहता तो था कि उमा सुरक्षित रहे, पर उसने कभी यह नहीं पूछा कि वह मोबाइल में खोज क्या रही है। सुरक्षा और संवेदना—दोनों अलग बातें हैं। महेश यह अंतर अब तक समझ नहीं पाया था। रात गहरी हो चुकी थी। शोभित ने दिन का अंतिम संदेश भेजा—
"उमा, एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"तुम आख़िरी बार अपने लिए कब जी थीं?"
उमा ने उत्तर लिखने की कोशिश की।उँगलियाँ कई बार चलीं, फिर रुक गईं।आख़िर उसने केवल दो शब्द लिखे—
"याद नहीं।"
शोभित ने कोई सलाह नहीं दी। उसने केवल लिखा—"तो फिर हमारी अगली बातचीत का विषय यही होगा—'उमा कौन है?पत्नी होने से पहले, किसी की बेटी होने से पहले, किसी की बहू होने से पहले... सिर्फ़ उमा।"
उमा देर तक स्क्रीन को देखती रही। उसे पहली बार लगा कि शायद उसने स्वयं को भी वर्षों से नहीं जाना था और शायद जीवन की सबसे कठिन यात्रा किसी दूसरे तक पहुँचने की नहीं, स्वयं तक लौटने की होती है।
शेष अगले भाग में..........
आलोक मिश्रा " मनमौजी "