85 साल के बुजुर्ग बाबा पिछले तीन महीनों से अस्पताल के कमरे में ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे। उम्र ने तो उन्हें झुका ही दिया था, लेकिन असली जंग उनके शरीर के अंग लड़ रहे थे। किडनी पूरी तरह से जवाब दे चुकी थी, लिवर भी लगभग काम करना बंद कर चुका था और दिल किसी भी क्षण धड़कना छोड़ सकता था। लेकिन उनके चेहरे पर हमेशा एक हल्की सी मुस्कान रहती थी। हर नर्स, हर अटेंडेंट उन्हें देख कर हैरान रह जाता था कि इतनी बीमारी और दर्द के बावजूद ये इंसान इतना जिंदादिल कैसे रह सकता है।
डॉक्टर प्रकाश ने जब हॉस्पिटल जॉइन किया था, तभी से उनका इलाज उन्हीं के जिम्मे था। धीरे-धीरे प्रकाश और उस बुजुर्ग के बीच एक रिश्ता बन गया—मरीज और डॉक्टर से कहीं गहरा। प्रकाश उन्हें सिर्फ "पेशेंट" नहीं, बल्कि अपने 'दादा' जैसा मानने लगे थे। शायद इसलिए भी क्योंकि वो बुजुर्ग हमेशा मज़ाक, किस्से-कहानियों और पुरानी यादों से माहौल हल्का कर देते थे।
लेकिन पिछले तीन महीनों में हालत इतनी बिगड़ी कि उन्हें लगातार एडमिट रखना पड़ा। डायलिसिस, इंजेक्शन, दवाइयों और मशीनों के बीच उनकी जिंदगी धीरे-धीरे बंधी हुई थी।
इसी बीच प्रकाश को दो दिन के लिए देहरादून में जाना पड़ा। उनकी गैरमौजूदगी में केस सीनियर डॉक्टर रुद्र देख रहे थे। रुद्र का अंदाज़ सख्त था—सीधे-सपाट, बिना भावनाओं के। पर लाइफ लाइन हॉस्पिटल के जूनियर डॉक्टरों को बहुत सहयोग देते हैं ।
प्रकाश का बचपन का दोस्त है रुद्र ,इसलिए प्रकाश को रुद्र पर बहुत भरोसा है ।
बाबा की मेडिकल रिपोर्ट अब साफ कह रही थी कि अब उनके बचने की कोई उम्मीद नहीं थी।
रुद्र ने डॉक्टर अनन्या को बुलाया और बाबा की ड्यूटी अनन्या को इस विशवास के साथ दी जिससे अनन्या अच्छे से उनकी देखभाल करके डॉक्टर प्रकाश का विश्वास जीत लेगी।
"डॉक्टर रुद्र, उनकी हालात बहुत खराब है किसी भी वक़्त उन्हे कुछ भी हो सकता है ...मै उनकी जिम्मेदारी नही लूंगी" डॉक्टर अनन्या ने साफ मना कर दिया रुद्र को
"अनन्या ..किसी भी डॉक्टर की ड्यूटी आखरी समय तक पैशेंट को ज़िंदगी देना है । तुम्हे भी यही करना है." रुद्र ने कहा
"आपको पता है डॉक्टर प्रकाश गुस्से मे रहते है और मुझे लगता है मेरे पीछे कुछ ज्यादा ही पड़े रहते है" अनन्या ने कहा
"नही ऐसा नही है...तुम इस बार कोई गड़बड़ ना करना.….अच्छे से उनको मॉनिटर करना " रुद्र ने विश्वास के साथ कहा
"श्री , बेस्ट डॉक्टर है, एक बार उसका विश्वास जीत लो, तो तुम दोनो एक बेहतर टीम बना सकते हो...." रूद्र ने समझाया
" जी सर...जैसे आप कहे" अनन्या रूद्र को कह कर बाबा से मिलने चली गयी।
"राम राम बाबा...मै डॉक्टर अनन्या...डॉक्टर प्रकाश के बदले आयी हूं. ..वो बाहर गये है" अनन्या ने ICU मे लेटे हुए बाबा से कहा
बाबा ने हलकी मुस्कान रखी चेहरे पर और कहा " बिटिया , अच्छा है वो यहां नही है...तू मुझे कलू हलवाई की जलेबी खिला दे"
"जलेबी...बाबा आपको पता है की आपको मना है मीठा" अनन्या ने कहा
" बेटा पता नही मै कब सांसे लेनी छोड़ दू पर मेरी आखरी सांसे वही अटकी है " ऑंखे बंद करते करते बाबा बोले
बाबा की तबीयत बहुत ज्यादा खराब हो चुकी थी बचने की कोई उम्मीद ही नही थी पर
उनका मन अभी भी ज़िंदा था...जलेबी खाने के लिए
कल से वो एक ही बात बार-बार दोहरा रहे थे—
“काश… कलू हलवाई की जलेबी मिल जाती… गरमागरम, रस टपकती जलेबी।”
नर्सें हंसकर टाल देतीं, कोई कह देता—“बाबा जी, अब ये सब मुमकिन नहीं है, आपकी सेहत इजाज़त नहीं देती।”
लेकिन उनकी आँखों में वही तड़प बनी रहती।
कितनी अजीब बात थी—मौत दरवाजे पर खड़ी थी, फिर भी दिल बस एक छोटे से मीठे स्वाद के लिए धड़क रहा था।,
लेकिन उनकी तड़पती नज़रों को देखकर अनन्या का दिल पिघल गया।
उस रात, जब वार्ड शांत था और सब अपने कामों में व्यस्त थे, अनन्या चुपचाप कलू हलवाइ से थोड़ी सी जलेबी ले आई। उसने कांपते हाथों से बुजुर्ग के सामने रखी और धीमे से कहा—
“बस एक टुकड़ा बाबा जी… किसी को पता भी नहीं चलेगा।”
बुजुर्ग की आँखों में चमक आ गई। आँखों से अश्रुओ की धारा बह निकली। उन्होंने जैसे किसी बच्चे की तरह खुशी से जलेबी उठाई।उसे जी भर कर देखने लगे जैसे कितनी यादे जुड़ी हो उसके साथ .. पहला टुकड़ा जैसे ही होंठों से छुआ, उनके चेहरे पर संतोष की मुस्कान फैल गई। रस भरी मिठास ने सिर्फ उनके मन को नहीं, बल्कि जैसे शरीर को भी तृप्त कर दिया।
उस क्षण वो इतने शांत हो गए जैसे सदियों की प्यास बुझ गई हो। उन्होंने अनन्या का हाथ थामा, आशीर्वाद से भरी नज़रें उठाईं और धीमे से कहा—
“बिटिया… तूने मुझे भगवान का प्रसाद खिला दिया। अब मेरा मन भर गया।”
कुछ देर बाद उन्होंने आँखें मूँद लीं। चेहरे पर वही संतोष, वही मुस्कान स्थिर हो गई।
धीरे धीरे मशीनों ने भी शोर करना बंद कर दिया की बाबाजी सो जाए सुकून से मौत की गोद मे ।
देर रात तक बाबा जी संसार से अलविदा कह गये।
अनन्या की आँखों से आँसू बह निकले, पर दिल को सुकून था। ऐसा लगा जैसे बाबा जी भगवान के घर भी पूरी तृप्ति के साथ, मिठास से भरे हुए चले गए हों… और जाते-जाते अनगिनत आशीर्वाद उनके आँचल में डाल गए हों।
अनन्या ने बुझी बुझी आवाज से रुद्र को फोन कर के बताया।
डॉक्टर रुद्र , बाबा नही रहे"
ओह गॉड. ..आज की रात और काट लेटे.. प्रकाश आने ही वाला है कल।" रुद्र ने उदास मन से कहा
" जी..पर अब उनके आर्गेनस ऑलमोस्ट फेल हो चुके थे...वो दिखा नही रहे थे पर अंदर ही अंदर तड़प रहे थे।" अनन्या ने आँसुओ को रोकते हुए कहा
" डॉक्टर अनन्या ...तुम श्री को फोन नही करना , मै खुद कर देता हूँ " रुद्र ने कहा
रुद्र ने अनन्या को कह तो दिया की श्री को वो खुद फोन कर देगा पर उसकी भी हिम्मत नही हुई बताने की।
उसे लगा की अगर अभी बता देगा बाबा के बारे मे तो उसे पता चल जयेगा की अनन्या ड्यूटी पर थी और वो नही चाहता था की कोई बात का बतंगड़ बने।
कल श्री को समझा देगा।
सुबह-सुबह जब डॉक्टर प्रकाश हॉस्पिटल पहुँचे तो उनका पहला कदम सीधे उसी वार्ड की ओर गया। दो दिन से उनका मन वहीं अटका हुआ था। दरवाज़े पर पहुँचते ही जैसे किसी ने उनके सीने पर बोझ रख दिया—बाबा जी का बेड खाली था, उस पर सफेद चादर फैली हुई थी।
प्रकाश के कदम लड़खड़ा गए, आँखें भीग गईं।
“नहीं… बाबा जी…” उनके होंठों से टूटा-सा स्वर निकला।
तभी सिस्टर पास आई और धीमे स्वर में बोली—
“सर… कल रात बाबा जी हमें छोड़कर चले गए।”
" मुझे किसी ने बताया क्यो नही..." सिस्टर पर चिल्ला कर बोले डॉक्टर प्रकाश
"उस वक़्त ड्यूटी डॉक्टर रुद्र ने भी मुझे नही बताया"
" सर...उस समय ड्यूटी डॉक्टर रुद्र नही डॉक्टर अनन्या थी"
" डॉक्टर अनन्या....." गुस्से मे डॉक्टर प्रकाश चिल्लाये।
डॉक्टर प्रकाश अब क्या कदम उठाएंगे ?
क्या उन्हे पता चलेगा की बाबा को अनन्या ने जलेबी खिलाई थी ,उनकी सख्त मनाई के बाद भी?
MTNL की घंटी
season. .3
..........to be continued