अनामिका
विजयनगर के एक छोटे से गाँव से एक लड़की महाविद्यालय में प्रवेश लेने आई। नाम था उसका अनामिका। पतली लंबी, घुंघराले बाल, साधारण सा व्यक्तित्व। हिंदी विभाग में गई और सुरभि प्राध्यापिका को अपना फॉर्म देते हुए बोली - "मैम मुझे एम.ए करना है।"
सुरभि प्राध्यापिका ने पूछा - "गाँव से इतनी दूर रोज क्लास लेने आ पाओगी?"
अनामिका ने दृढ़ संकल्प के साथ कहा - "जी मैम जरूर आऊँगी। मुझे अपनी पहचान बनानी है।"
सुरभि प्राध्यापिका ने उसे शाबाशी दी और साहित्य की कुछ किताबें पढ़ने के लिए दीं। "कल सुबह 9 बजे आना है।"
अनामिका बहुत खुश थी। जैसे उसके सपनों को नई उड़ान मिल गई हो। अगले दिन वो ठीक 9 बजे क्लास में उपस्थित थी। क्लास में दस-बारह लड़कियां थीं। एम.ए हिंदी में उस समय कम लड़कियां ही पढ़ने आती थीं।
अनामिका एक रिया नामक लड़की के पास जाकर बैठ गई। रिया आधुनिक विचारों वाली बिंदास लड़की थी। थोड़ी बातूनी भी। जल्द ही रिया और अनामिका की दोस्ती हो गई। अब दोनों हमेशा साथ दिखाई देतीं। चाहे कॉलेज कैंटीन हो, लाइब्रेरी हो या क्लास।
उनकी ही क्लास में एक सीधी, शांत रहने वाली पढ़ाकू लड़की थी विनीता। बहुत कम बोलती। किताबों में ही खोई रहती। उसे ढूंढना आसान था - या तो क्लास में मिलेगी या लाइब्रेरी में।
लाइब्रेरी की अधिकतम किताबें अनामिका के नाम ही बुक थीं। उसकी स्मृति बहुत तेज थी। एक बार पढ़ी हुई किताब उसे याद हो जाती। कहीं से भी पूछ लो कौन से पृष्ठ पर क्या लिखा है। उसकी हिंदी इतनी अच्छी थी कि सभी छात्राएं उसी से प्रार्थना-पत्र लिखवातीं। वो किसी को मना नहीं करती थी। सबकी सहायता करती, लेकिन सबसे अलग भी रहती। फालतू की बातों में उसकी कोई रुचि नहीं थी।
शिक्षक दिवस पर कार्यक्रम का संचालन उसने ही किया। एक अभिनय नाटिका में अनामिका और विनीता साथ आए। अनामिका को विनीता का व्यवहार बहुत अच्छा लगा। धीरे-धीरे वो विनीता को भी अपनी मित्र मानने लगी।
हिंदी दिवस पर हिंदी पखवाड़े में विभिन्न प्रतियोगिताएं हुईं - कहानी लेखन, कविता लेखन, संस्मरण लेखन। सभी में अनामिका और विनीता छाई रहीं।
विनीता के बड़े भाई की शादी तय हुई। उसने क्लास की सभी लड़कियों को बुलाया। अनामिका, रिया और किरण एक दिन पहले ही पहुंच गईं। तीन दिन तक खूब मस्ती हुई। गाने, नाच, बातें। अब उनकी दोस्ती और गहरी हो गई।
समय बीतता गया। रिया की जल्दी शादी हो गई। अब अनामिका अपनी हर चीज के लिए विनीता पर निर्भर हो गई। बी.एड की तैयारी के लिए अनामिका अक्सर विनीता के घर जाने लगी। विनीता जो समझाती, अनामिका को तुरंत याद हो जाता।
दोनों ने बी.एड में अच्छे अंक प्राप्त किए। विनीता ने एम.ए में पूरे विश्वविद्यालय में टॉप किया, तो उसकी एक महाविद्यालय में नियुक्ति हो गई। अनामिका अध्यापिका नहीं बनना चाहती थी। उसे ग्लैमर वाली जॉब पसंद थी। कुछ नया करना चाहती थी।
अंत में अनामिका ने एक हॉस्पिटल में रिसेपनिस्ट की जॉब चुनी। उसे कम्प्यूटर पर काम करना बहुत अच्छा लगता था। धीरे-धीरे उसने डॉक्टरों की सहायता करनी शुरू की। नर्स वाले काम भी सीख लिए - पट्टी करना, दवाई बताना, इंजेक्शन लगाना। मरीजों की सेवा करके उसे संतुष्टि मिलती।
समय तेजी से गुजरता है। एक दिन विनीता का फोन आया - "अनु, मेरी शादी तय हो गई।"
अगले ही दिन अनामिका विनीता को बाजार ले गई। घंटों शॉपिंग की। चूड़ियां, साड़ी, जूते। हर चीज में अपनी पसंद से विनीता के लिए चुना।
शॉपिंग करते समय विनीता ने कहा, "तू कितनी बदल गई है अनु। पहले की अनामिका और आज की अनामिका में जमीन आसमान का फर्क है।"
अनामिका मुस्कुराई और बोली, "बदलना पड़ा विनीता ।मुझे अपनी पहचान बनानी थी ना। गाँव की वो डरी हुई लड़की अब अपने पैरों पर खड़ी है।"
विनीता ने उसका हाथ थाम लिया। "मुझे गर्व है तुझ पर। तूने साबित कर दिया कि नाम से नहीं, काम से पहचान बनती है।"
उस दिन अनामिका ने आसमान की तरफ देखा। उसे लगा जैसे सुरभि मैम की वो बात सच हो गई - "अपने सपनों को उड़ान दो।"
गाँव से आई एक अनामिका आज अपने नाम की पहचान बना चुकी थी। ना प्रोफेसर, ना टीचर... पर एक आत्मनिर्भर, कामयाब लड़की।
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