अगले दिन सुबह राउंड पर डॉक्टर प्रकाश और डॉक्टर अनन्या साथ-साथ मरीजों को देख रहे थे। अनन्या अब थोड़ी आत्मविश्वास से भरी हुई लग रही थी।
एक मरीज के चार्ट को देखते हुए प्रकाश बोले—
“देखिए डॉक्टर अनन्या, ये पेशेंट डायबिटिक है। मीठा बिल्कुल बंद।”
अनन्या ने तुरंत कहा—
“लेकिन सर, उसकी शुगर आज नॉर्मल है। थोड़ा फ्रूट जूस तो दिया जा सकता है।”
प्रकाश ने भौंहें उठाईं—
“आपको लगता है आप मुझसे ज़्यादा जानती हैं?”
अनन्या ने धीरे से कहा—
“सर, आपसे ज़्यादा नहीं… लेकिन मरीज की मुस्कान बनाए रखना भी डॉक्टर का काम है।”
प्रकाश ने गहरी साँस ली और ऊँचे स्वर में कहा—
“डॉक्टरी इमोशन से नहीं, लॉजिक से चलती है। अगर हर मरीज को जूस पिलाएँगी तो कल ICU खाली नहीं होगा, बल्कि और भर जाएगा।”
“और अगर हर वक्त डाँटते रहेंगे तो डॉक्टरों का हौसला खाली हो जाएगा....'श्री जी' पीछे से आवाज आई
"तुम कब आई ईशा ?. ...कितनी बार कहा है की हॉस्पिटल मे मुझे डॉक्टर प्रकाश कहा करो श्री नहीं" डॉक्टर प्रकाश ने कहा।
" श्री, नाम बहुत प्यारा है डॉक्टर प्रकाश " अनायास ही अनन्या बोल पड़ी
प्रकाश एक पल उसे घूरते रहे,
“आप बहुत बोलती हैं।”
“और आप बहुत डाँटते हैं।” अनन्या ने बिना झिझके जवाब दिया।
पास खड़ी ईशा हँसी रोक न सकी।
"अनन्या तुम सबकी रिपोर्ट्स तैयार कर दो , टेब पर मेडिसिन प्रेसक्राइब कर के मुझे कैफ़ेटेरिया मे दिखा देना। मै ईशा कर साथ वही जा रहा हूँ "
प्रकाश ने सिर हिलाया और बुदबुदाए—
“लगता है ईशा, यह लड़की मुझे चैन से काम करने नहीं देगी।”
डॉक्टर ईशा और प्रकाश वहां से चले गये।
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डॉक्टर प्रकाश लंदन से एम.डी. और स्पेशलाइजेशन पूरा करके भारत लौटा था। उसकी माँ का सपना था कि बेटा देश मे रहे, इसलिए उसने लंदन में अच्छे ऑफर होने के बावजूद वहीं रुकने की बजाय दिल्ली का रुख किया।
दिल्ली के मशहूर लाइफ लाइन हॉस्पिटल में उसने अपनी प्रैक्टिस शुरू की। यह हॉस्पिटल उसके पापा के पुराने दोस्त रजत सिंघानिया का था, इसलिए जॉइन करना आसान रहा, लेकिन काम आसान बिल्कुल नहीं। प्रकाश को अपने हुनर और ईमानदारी से खुद को साबित करना था।
वो बेहद मेहनती, समझदार और उसूलों पर चलने वाला डॉक्टर है। स्वभाव से मिजाज थोड़ा गर्म हैं, मरीजों को केवल इलाज नहीं, बल्कि इंसानियत और उम्मीद देना उसकी आदत है । हॉस्पिटल के जूनियर डॉक्टर उसके साथ काम करना अपनी खुसनसीबी मानते है ।
फिर भी प्रकाश का सपना केवल बड़े हॉस्पिटल में नौकरी करना नहीं था—उसका सपना अपना मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल खोलने का था। एक ऐसा हॉस्पिटल जहाँ पैसों से ज़्यादा इंसानियत का इलाज हो, जहाँ ग़रीब से ग़रीब इंसान भी बिना चिंता के आ सके।
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रात का वक्त था। आईसीयू में अचानक एक नया पेशेंट लाया गया—
युवा लड़का, लगभग 22 साल का। सड़क दुर्घटना में बुरी तरह घायल, खून बहुत बह चुका था।
नर्स घबराकर बोली—
“सर, ब्लड प्रेशर लगातार गिर रहा है…!”
डॉ. प्रकाश तुरंत कमांड देने लगे—
“O-नेगेटिव ब्लड मंगवाओ। इमरजेंसी ट्रांसफ्यूज़न तैयार करो।”
तभी डॉक्टर अनन्या ने फाइल चेक की और बीच में बोल पड़ी—
“सर, ये पेशेंट हीमोफीलिया का केस है। सीधा ब्लड चढ़ाना रिस्की होगा। हमें पहले फैक्टर VIII देना चाहिए।”
प्रकाश भड़क उठे—
“ये एक्सीडेंट केस है डॉक्टर! अभी वक्त लेक्चर देने का नहीं है। अगर अभी ब्लड नहीं चढ़ाया तो पेशेंट मिनटों में चला जाएगा।”
अनन्या ने ठंडे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा—
“और अगर बिना सोच-समझे ब्लड दे दिया, तो पेशेंट का शरीर उसे रीजेक्ट कर सकता है। वो तुरंत शॉक में जा सकता है!”
दोनों आमने-सामने खड़े थे। नर्सें समझ नहीं पा रही थीं किसकी बात मानें।
“आप नई हैं, अभी अनुभव नहीं है। जो कह रहा हूँ वही कीजिए!” प्रकाश ने सख़्त लहजे में कहा।
अनन्या ने भी आँखों में आँसू रोकते हुए दृढ़ता से कहा—
“अनुभव बाद में आता है सर, लेकिन सही इलाज अभी करना ज़रूरी है। मैंने केस हिस्ट्री पढ़ी है। मैं गलत नहीं हूँ।”
"श्री , अनन्या ठीक कह रही है अभी उसकी बात सुन ले " डॉक्टर रुद्र ने कहा जो तेजी से अमरजेंसी वार्ड मे आ गया।
कमरे में तनाव का माहौल था। आखिरकार प्रकाश कुछ पल चुप रहे, फिर उन्होंने गुस्से से कहा—
“ठीक है। आपकी जिद मान लेते हैं। अगर कुछ हुआ तो जिम्मेदारी आपकी होगी।”
अनन्या ने गहरी साँस ली और फैक्टर VIII का इंजेक्शन तैयार करवाया। कुछ ही मिनटों बाद मॉनिटर पर पेशेंट की धड़कन स्थिर होने लगी।
नर्स चिल्लाई—
“सर, पेशेंट रिस्पॉन्ड कर रहा है!”
कमरे में राहत की लहर दौड़ गई।
प्रकाश ने चुपचाप पेशेंट को देखा, फिर अनन्या की तरफ मुड़े।
उनकी आँखों में अब गुस्से की जगह हैरानी थी।
“आपने सही कहा था…” प्रकाश ने धीरे से स्वीकार किया।
अनन्या की आँखों में हल्की चमक थी। मुस्कुराते हुए उसने कहा—
“थैंक्यू सर… लेकिन अगली बार मेरी बात पूरी सुन लीजिएगा। हर बार बहस में वक़्त निकलना रिस्की है।”
डॉक्टर प्रकाश ने चिढ़ते हुए जवाब दिया—
“ज़रूरी नहीं कि तुम हर बार सही ही हो। अभी जूनियर हो और जूनियर बनकर ही रहो।”
कहते ही वो नाराज़ होकर चले गए।
अनन्या की आँखें भर आईं। उसे उम्मीद थी कि आज प्रकाश उसकी तारीफ़ करेंगे, लेकिन उल्टा डांट पड़ गई।
तभी पीछे से आवाज़ आई—
“वेल डन, डॉक्टर अनन्या! तुम्हारा कॉन्फिडेंस क़ाबिल-ए-तारीफ़ है।”
ये रुद्र था।
“थैंक्स डॉक्टर रुद्र… पर प्रकाश सर…” अनन्या की आवाज़ धीमी हो गई।
रुद्र हँसकर बोला—
“उसे छोड़ो, वो थोड़ा सड़ा-सा इंसान है। लंदन रिटर्न है न।”
“पता नहीं वापिस क्यों आ गए… वही रहते। मुझे डांटने ही तो आए हैं,” अनन्या झुंझलाकर बोली।
“मुझे भी ऐसा ही लगता है। जब वो छुट्टी पर था तो हर जगह सिर्फ़ डॉक्टर अनन्या ही थी। लेकिन अब वो आ गया है—हॉस्पिटल का दिल, डीन डॉक्टर रजत सिंघानिया का फ़ेवरेट, और पेशेंट्स का भगवान।
पर तुम्हारे सितारे उससे टकरा रहे हैं… ज़रा बचकर रहना उससे।”
रुद्र ने आँख दबाते हुए कहा और ज़ोर से हँस पड़ा।😉
अनन्या भी मुस्कुरा दी।
तभी कॉरिडोर से आते हुए प्रकाश ने दोनों को हँसते देख लिया।
“कोई काम नहीं है तुम दोनों को? बहुत हँसी आ रही है न, डॉक्टर अनन्या?”
“सॉरी श्री… मेरा मतलब डॉक्टर प्रकाश,” अनन्या ने हल्की शरारत के साथ जवाब दिया और रुद्र की तरफ़ टेढ़ी नज़र डाली।
प्रकाश ने बुरा-सा मुँह बनाकर कहा—
“इस पेशेंट की सारी डिटेल्स समझ लो। ये मेरा और तुम्हारा केस है। कोई गड़बड़ नहीं होनी चाहिए। मुझे अभी जाना है, सुबह आ जाऊँगा।”
“जी सर, मिलती हूँ आपको,” अनन्या ने सिर झुका लिया।
प्रकाश के जाते ही अनन्या और रुद्र ने एक-दूसरे के हाथ पर ज़ोर से ताली मारी और हँस पड़े।
“इतना भी क्या इम्पोर्टेन्ट है कि इमरजेंसी पेशेंट को छोड़कर जा रहे हैं?” अनन्या ने हैरानी से पूछा।
रुद्र ने गंभीर होते हुए कहा—
“हाँ अनन्या, इम्पोर्टेन्ट है। उनकी मम्मी का पब्लिकेशन हाउस है। आज कोई बड़ा प्रोग्राम है। वैसे भी, उनके मम्मी-पापा साल में बस इसी प्रोग्राम में एक साथ दिखाई देते हैं… दुनिया को दिखाने के लिए ही सही।”
“पब्लिकेशन?”
ये शब्द सुनते ही अनन्या चौंक गई। उसकी आँखें कहीं खो गईं। यादों की गलियों में कुछ तलाशने लगी, मगर धूल इतनी जम चुकी थी कि साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था…
अनन्या को क्या धुंधला सा याद आने लगा?
एक ही हॉस्पिटल मे काम करते हुए अनन्या प्रकाश की नजरों मे अपनी अहमियत बना पायेगी?
खुद को काबिल डॉक्टर साबित कर पायेगी?
..........to be continued