बीते न रैना भाग - 10 Neeraj Sharma द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

बीते न रैना भाग - 10

इसका कारण ये है, कि कभी जो हम सोचते नहीं वो हो जाता है। एक चोरी पैसो कि हो जाने से लेखक पत्थलेखक टूट गए... जो स्टेज पर काम करते थे उनको मेहनत कहा से दे। ये नाटक यही पे खत्म हो गया।
------------------------------समाप्ति 👍
आगे हम कुछ लिखेंगे कुछ ऐसी हकीकत जो सब को पता तो चले.... ईमानदार कहना कठिन कयो होता है?
                        ( ईमानदारी )
                 बात सच्ची है, मेरे दोस्त पर ही होई बीती कथा है। पंजाब के  भिखी पिड की कहानी सतनाम सिंह खालसा जो गुरद्वारे मे ग्रंथी था... कयो था लिखा इसका कारण आगे स्पष्ट होगा। वो अमृतसर का जम्पल था। मरके छे जमाते  की, और रहन सहन घर का खुला था। सब भाईचारा मिल कर रहता वो तीसरे नंबर का छोटा भाई,सब उसको खूब प्यार करते। वाहेगुरु के चरणी लगा हुआ सतनाम सिंह खान पान मे बेलेहाजी था। कहना पड़े गा। उसका शरीर की बंतर साल 1970 मे अच्छी खासी थी। बाप का प्यार भाईओ का प्यार खूब मिला.... बहने थी कोई दो। जान पे खेल जाने वाला सब से उच्चा लम्बा दोनों से निकला था। काम कया करता कोई नहीं..... पूछो कयो, घर मे कभी कभी खेती खुद ही बल्द बन कर सारे खेत को सुहा गा फेर देता... पांच किले जमीन थी... कब्जा करने को जागीर ने बहुत उकसाया था पर उसने ऐसा नहीं किया। " उसने पूछा जागीर साथ कुछ नहीं जायेगा फिर कयो ?.... "जैसे कोई ब्रह्मगयानी हो।
चलो कुछ भी हो... समय गुज़र रहा था।
जो कब्जा मारते है... उनकी आँखे देखे, वो हजारों मे हो गए.. और ईमानदार रूपये मे हो गए। ऐसा जीवन उसने खुद आँखो से देखा। बानी को मुँह जुबानी रट मार ली थी। कुछ हालत ऐसे हो गए आगे जा कर..... पूछो मत। सरदार साहब और सरदारनी को बसों की टकर ने उठा लिया.... रो रो कर बुरा हाल उस वक़्त। दो लड़कियां बड़ी थी, उसकी शादी हो चुकी थी। उसमे एक भाई अरब देश निकल गया, दूसरे ने शादी कर ली।
 उसके 1985 मे दो जुड़वा लडके हुए। वो शर्त पे घर जवाई बन गया था..... अब बात आ गयी थी सतनाम सिंह पर जो अकेला रह गया था।
                            गोली बारी अधिक थी। मिलिटेंट श्री गुरदवारे साहब मे जमकर बैठे थे। फुट डाल रहे थे पता कौन मजूदा सरकार हिंदू सिख की... फुट.. फाड़ो राज करो.... सोच थी घटिया सतनाम जानता था इतनी तो। ऐसे कुछ नहीं होता। सरकार का जोर... पहले रखने को फिर निकालने को.... वाह राजनीती... कितनी गंदल भरी है।
                                 दरवाज़े लग जाते थे। ग्रंथी खुद चल के सतनाम सिंह पास आया था... वो भीखपिंडी  का रहेशी था।
                               " सतनाम सिंह जी आपकी जमीन आप वेच दे तो आपका आधा भार होला हो जायेगा। " एक दम सतनाम ने नेहारा... " कयो सरदार जी " ग्रंथी ने कहा " हलात ठीक नहीं है, आपने इस उम्र मे शादी करली तो ठीक फिर कठिन हो जायेगा। " ग्रंथी ने साफ समझाते हुए कहा।" बाजी आपकी बात ठीक है... अज वी पेट निकल आया बाहर को, तो पेनती का लगता हुगा, पर सरदार जी हुँ मे तीस का.... " ग्रंथी खुश हुआ... सपना था उसका ऐसा जवाई.... घर पर ही... कोई और नहीं था उसका.. वाहेगुरु के छूट... " कोई मकसद बताये तो कर देंगे। " फिर ग्रंथी चुप हो गया... फिर वही आपना सतनाम बोला---- " भिखी विडी से कोई वैसे तो आ नहीं जाता... " ग्रंथी ने वाहेगुरु का नाम लेकर कह दिया... " काका जी तुसी मेनू पसंद हो, मै आपनी कुड़ी दा वैयाह तुहाडे नाल कर देना चाहदा हाँ " सतनाम सुन कर दंग रह गया... " रिश्ते ऐसे आते और होते है। " 
                               " मै कैसे कह दू.... मकान तीनो का, सच पचो का.. दो बहने भी है। जमीन पांच किले की... आप ही सोचो... कुड़ी कौन देगा मुझे। " ग्रंथी फट से बोला ----" मै दुगा तुझे लड़की और घर भी मेरा कौन है पुत्र तेरे सिवा... वाहेगुरु तो है ही.. " बात सीधी अंदर जा लगी सतनाम सिंह के.... "ठीक है आपनी पुत्री को पूछ ले। "  ग्रंथी गद गद हो उठा। "तेरे बाप से बहुत लगाव था, हमसे बड़ा था कभी कभी थपकी मार कर कहते उल्लू के पठे ये कुड़ी मेरे सतनाम को जाएगी। " दोनों की आँखे भर आयी।
                                " पर जी एक वार कुड़ी से पूछ लेना... " 
30-11-1990 को शादी हो गयी। चुनी चढ़ा कर। छोटी भरजायी की आँख जमीन और मकान पर थी। पर ग्रंथी तो फिर खिलाडी था।
बड़ा लड़का अरब था पर उसका अता पता पक्का नहीं था.... जो ये मलोट मे बरजाई थी तेज थी चुस्त थी। माल हड़प लेना चाहती थी। ये पता चलता था..." कौन कितने पानी मे थे।"
                             ग्रंथी सोचने लगा मिलिटेंट से भरजायी उठा दू, तो..... " नहीं नहीं... ऐसा नहीं... " सतनाम को पता चला तो बे अंत नफ़रत करेगा। छोड़ो सब जीने दो सब को आराम से... उम्र कितनी है.... "जमीर मार देना है अब कया... "          ( चलदा )
समापित कहानी मंजिले की सब से प्यारी कहानी।
नीरज शर्मा पिन कोड :- 144702