वक़्त कभी किसी का नहीं... मत सोचो, इस मीठी बातो से इसे भरमा लोगे... नहीं कड़वा बोल कर देख लो... थोड़ा सा, हक़ीक़त यूँ बाहर आ जाये गी।
ये नाटक रुपात्रिक" समय "के मुताबिक जो ढल गया, बन गया... कुछ न कुछ जो समय को नहीं समझा... वो तो बारूद की तरा फट जायेगा। चलना सिखो.... बैठे गे फिर कभी। ये नाटक समय के आधरत है। किर्पा ये किसी के लिए चीटिंग के लिए नहीं है, हकीकत है ये नाटक की कहानी।
------- (समय )--------
कलाकार :- जिसमे जाने माने बलजीत सिंह (40)
बलजीत कौर (36) ग्रेवाल (30 ) रजिदर सिंह (43) और इसके इलावा भी।
---------------------------------@----------------------------
स्टेज का पर्दा हटता है। अंधेरा जयादा रौशनी कम, दो कमरों का जिक्र.... बरसात के बाद की बाते, रजिदर सिंह ग्रेवाल से " जयादा बरसात मे बिजनेस की धुलाई हो जाती है। " ग्रेवाल " हूँ " मे सिर मारते हुए बोला " सेलाबा इतना होता है और छते गुमशुम सी चोने लगती है... अब भी देख लो यही हाल हुआ होगा। "
तभी बलजीत कौर का आना होता है " इतनी शाम को आप जी " ग्रेवाल ने कहा।" चाची जी आप " रजिदर सिंह ने हैरानी से कहा।
" हाँ बलजीत जी बताये कैसे आना हुआ... " ग्रेवाल ने चेयर की और इशारा किया..... रजिदर सिंह भी पास आ गया। " परेशान हूँ सच मे बहुत " सबको जैसे आगे शुभ हो मुँह ऐसे कर लिए। " वो बोली कल से पपू के डैडी घर नहीं आये... " रजिदर सिंह को जैसे अच्छा सास आया। ग्रेवाल भी चुप का चुप ही था। " कहा गए, स्कूल ही जाते है, फिर घर, पीते वो नहीं, फिर कहा जाना, जयादा से जयादा आपने संग रहना... " रजिदर सिँह ने कहा, " सोच कर बता तेरे को तो कुछ नहीं कहा। " रजिदर ने ग्रेवाल को सम्भोदन किया। " नहीं यार, कुछ कह रहा था... याद करने दे... " रजिदर फिर हस पड़ा..." ओह कल और परसो अजायब घर जाना था, राइट बोला... ग्रेवाल को कहा।" बिलकुल सही , रजिदर की बात पर फूल चढ़ाये। " बलजीत कौर जी आज आपके हाथ का खाना तो खिला दीजियेगा। " रजिद्रसिंह ने भी ग्रेवाल की और मुस्कराते हुए चुटकी ली। " हमारी भी कोई होती हम आपको न कहते। " ग्रेवाल ने जैसे नशे मे कहा हो... पता नहीं कया याद आ गया उसे। "भाई साहब ऐसा आगे से कुछ उलझलुल बोला तो देखना ----" रजिदर सिंह ने थोड़ा हसते हुए कहा। जो उसको कहना चाहिए था, वो रजिदर कह गया। फिर चुप।
"कोई बात नहीं.. आ जाओ घर। "बलजीत कौर ने कहा। उनका घर पास ही था, कोई चार घर छोड़ कर...
उसके जाने के बाद ---" ग्रेवाल पर मरती थी, तेरी तो चाची है। " फिर दोनों हसने लगे।
"लगता है तेरा पहला प्यार ही बलजीत है, मुझे जो लगा ---" रजिदर ने गंभीर होते कहा। ग्रेवाल मुस्करा पड़ा। "सच मे पहला प्यार यही था... इसको देखी जाऊ यही मन कहता है।" रजिदर हस पड़ा।" पपू, कवेरी, परेश इसकी तीन औलाद है "----! ग्रेवाल फिर हस पड़ा। ये प्यार टेलीफोन वाला नहीं, रूह का है। साल 1980 है।
गए दोनों, बलजीत ने आवाज लगायी कवेरी को... वो हूँ -वा - हूँ बलजीत पर ही थी।" मम्मी ---पापा आएंगे नहीं कया " चुप एक खमोशी। दोनों ने समझाया कि अजायब घर की बात कल करते थे, हैरानी है चाची जी उन्हों ने आपको नहीं बताया..... " बलजीत ने 🙂 चावल साथ राजमाह बनाये थे और पकोड़ियों का रेता मिला था वही आदर्श नारी के गुण थे... एक भारतीये रीती रिवाज़... दोनों खुश थे।
रजिदर सिंह ने कुछ कह दिया, वो तो नहीं, गंभीर बलजीत हो गयी थी। ग्रेवाल को पहली वार आपने आप पे गुस्सा आया था, क्यों छोड़ कर गया दोनों को।
" ग्रेवाल के जाने के बाद सब गंभीर कैसे हो गए। " उसने मुस्कराते हुए कहा। रजिदर बोला ---" चाची जी आपका भोजन बहुत टेस्टी था!"अगर भोली आपकी सहेली होती तो आपको अवजारी नहीं देते, वो पैके गयी है, आयी नहीं, यहां जाती है, बैठ जाती है... " रजिदर की बातो मे हसना हसाना जरूर होता। " आप टेलीफोन करो, तो मेरा जिक्र करना, घर तो बता कर जाते। " ग्रेवाल हैरान था," बस यही जिम्मेदारी उसकी, जो विचारे इंतज़ार मे है, उसको पता ही नहीं.... " मन की जंग थी। एक सबब था, उसको देखने का ---- चोरी सी निगाह मे। चलो बच्चों मामो से ये तो लो, उस वक़्त का पांच सौ का नोट 100 के पांच नोट। ग्रेवाल ने कहा, " बच्चों मामा दे रहा है तो ले लो। " वो बीच मे शामिल नहीं था, बता देना चाहता था उसको आज भी। तभी "क्वेरी बोली अक्ल आप को हम क्या कहे।"
"अक्ल जी " बलजीत कौर ने बेहद कठोरता से कहा। "ये मामा जी नहीं है --- क्यों "🙂
"क्वेरी का ये सवाल सुन कर दंग रहे गए सभी " बलजीत कौर ने पड़दा डालते कहा "बहुत सवाल करने लगी हो क्वेरी ----" रजिदर सिंह ने कहा " हमारी रिश्तेदारी है, इनकी नहीं ----" क्वेरी ने बड़ी उलझन भरी आँखो से देखा।
------------------------------🙏चलदा -------------------