बरसों पहले अरावली की पहाड़ियों के बीच बसे एक छोटे से गांव के किनारे एक पुरानी हवेली खड़ी थी। गांव के लोग कहते थे कि वहां से जो भी रात के समय गुजरता है, वह या तो हमेशा के लिए गायब हो जाता है या फिर लौटकर कभी पहले जैसा नहीं रहता। उस हवेली का नाम सुनते ही लोगों के चेहरे का रंग उड़ जाता था। कोई उसके बारे में खुलकर बात नहीं करता था क्योंकि उनका मानना था कि उसका नाम लेने भर से वह जाग जाती है।
उसी गांव में रहने वाला राघव बचपन से इन कहानियों को अंधविश्वास मानता था। वह पढ़ा लिखा और निडर युवक था। एक दिन गांव के सबसे बूढ़े आदमी ने कांपती आवाज में उससे कहा, "अगर सच जानना चाहता है तो अमावस्या की रात हवेली में जाकर उस पुराने आईने के सामने खड़ा हो जाना। मगर याद रखना, पीछे से चाहे कोई कितना भी पुकारे, मुड़कर मत देखना।"
अमावस्या की रात पूरे गांव में अजीब सा सन्नाटा था। हवा चल रही थी लेकिन पेड़ों की पत्तियां तक नहीं हिल रही थीं। राघव हाथ में लालटेन लेकर हवेली पहुंचा। हवेली का टूटा हुआ दरवाजा अपने आप चरमराते हुए खुल गया। अंदर घना अंधेरा था। दीवारों पर जाले लटके थे और हर कदम पर ऐसा लगता था जैसे कोई उसके पीछे धीरे धीरे चल रहा हो।
हवेली के बीचोंबीच एक विशाल कमरा था जिसमें धूल से ढका हुआ एक पुराना आईना रखा था। जैसे ही राघव उसके सामने पहुंचा, लालटेन की लौ अपने आप छोटी होने लगी। अचानक उसे अपने पीछे से अपनी मां की आवाज सुनाई दी।
"राघव... बेटा... मेरी तरफ देख।"
राघव का दिल जोर से धड़कने लगा। उसे बूढ़े आदमी की चेतावनी याद थी। उसने आंखें बंद कर लीं और पीछे नहीं देखा।
कुछ पल बाद उसके पिता की आवाज आई।
"बेटा... हम मुसीबत में हैं। बस एक बार पीछे देख ले।"
उसके शरीर में सिहरन दौड़ गई। आवाजें इतनी असली थीं कि उसका मन टूटने लगा। तभी आईने में उसे अपना चेहरा दिखाई दिया, लेकिन कुछ अजीब था। आईने वाला राघव मुस्कुरा रहा था जबकि असली राघव के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।
धीरे धीरे आईने वाला राघव अपना हाथ उठाने लगा जबकि असली राघव बिल्कुल स्थिर खड़ा था।
राघव की सांसें तेज हो गईं।
फिर आईने वाला राघव बोला।
"तू आखिर आ ही गया। मैं दो सौ साल से तेरी जगह बाहर निकलने का इंतजार कर रहा था।"
कमरे का तापमान अचानक इतना ठंडा हो गया कि उसकी सांसों से धुआं निकलने लगा। आईने की सतह पानी की तरह लहराने लगी और उसमें से एक हाथ बाहर आने लगा। वह हाथ बिल्कुल राघव के हाथ जैसा था।
राघव पीछे हटना चाहता था लेकिन उसके पैर जमीन से चिपक चुके थे। आईने वाला उसका हमशक्ल धीरे धीरे बाहर निकल आया। उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी लेकिन आंखें पूरी तरह काली थीं।
अगले ही पल हवेली के बाहर जोरदार चीख गूंजी।
सुबह गांव वालों ने देखा कि राघव हवेली से बाहर निकल रहा है। उसके कपड़े वही थे, चेहरा वही था, आवाज भी वही थी। उसने सबको बताया कि हवेली में कुछ नहीं था और लोग बेवजह डरते हैं।
गांव वालों ने राहत की सांस ली।
लेकिन उसी रात गांव के हर घर में एक ही सपना आया।
सबने देखा कि राघव एक पुराने आईने के भीतर कैद है। वह रोते हुए चीख रहा है।
"मैं बाहर नहीं हूं... जो बाहर घूम रहा है... वह मैं नहीं हूं... उसे किसी और की तलाश है..."
अगली सुबह गांव के बीचोंबीच एक नया पुराना आईना रखा मिला।
उस पर धूल से सिर्फ एक वाक्य लिखा था।
"अगला इंतजार शुरू हो चुका है।"