दोनों बिना एक शब्द बोले इमारत के भीतर प्रवेश कर गए।
अधूरी बिल्डिंग के अंदर चारों तरफ सीमेंट की गंध फैली हुई थी। कहीं लोहे की सरियों के ढेर पड़े थे, तो कहीं ईंटों और मलबे का अंबार लगा हुआ था। टूटी हुई खिड़कियों से आती तेज़ हवा की आवाज़ पूरे माहौल को और भी डरावना बना रही थी।
युग ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी की तरफ देखा।
"हम पाँच मिनट पहले पहुँच गए हैं। अगर सामने वाला वक्त का पाबंद हुआ तो अभी तक आ जाना चाहिए था।"
शिव ने कोई जवाब नहीं दिया। उसकी तेज़ नज़रें पूरे परिसर का निरीक्षण कर रही थीं। वह हर छोटी-सी हरकत पर ध्यान दे रहा था।
"कुछ गड़बड़ लग रही है?" युग ने धीमे स्वर में पूछा।
शिव ने हल्का-सा सिर हिलाया।
"बहुत ज़्यादा सन्नाटा है। इतनी बड़ी डील के लिए सामने वाला पक्ष कभी बिना सुरक्षा के नहीं आता। लेकिन यहाँ तो एक परिंदा भी दिखाई नहीं दे रहा।"
दोनों धीरे-धीरे सीढ़ियाँ चढ़ते हुए ऊपर बढ़ने लगे।
हर मंज़िल पर पहुँचकर शिव कुछ सेकंड रुकता, चारों तरफ नज़र दौड़ाता और फिर आगे बढ़ जाता।
करीब दस मिनट बाद वे चालीसवीं मंज़िल की छत पर पहुँच गए।
ऊपर पहुँचते ही तेज़ हवा का झोंका दोनों से टकराया। वहाँ से पूरा शहर साफ़ दिखाई दे रहा था। शाम ढलने लगी थी और दूर-दूर तक फैली इमारतों की रोशनियाँ एक-एक करके जलने लगी थीं।
शिव छत के किनारे तक गया और नीचे झाँकने लगा।
"यकीन है, जगह यही बताई गई थी?" उसने बिना पीछे देखे पूछा।
युग ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और मैसेज दोबारा पढ़ा।
"लोकेशन यही है। समय भी यही लिखा था।"
दोनों कुछ देर तक खामोश खड़े रहे।
अचानक...
युग का फोन हल्का-सा वाइब्रेट हुआ।
उसने तुरंत स्क्रीन देखी।
एक अनजान नंबर से केवल दो शब्दों का संदेश आया था—
"ऊपर ही रुको।"
युग की भौंहें सिकुड़ गईं।
"मैसेज आया है। लिखा है—'ऊपर ही रुको।'"
शिव की आँखों में शक उतर आया।
"जिसे मिलना है, वह सामने आने के बजाय मैसेज भेज रहा है... मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं आ रहा।"
तभी नीचे कहीं लोहे के गिरने जैसी तेज़ आवाज़ गूँजी।
दोनों एक साथ मुड़े।
कुछ सेकंड बाद सीढ़ियों की दिशा से कई लोगों के तेज़ कदमों की आवाज़ सुनाई देने लगी।
धड़... धड़... धड़...
आवाज़ हर पल और नज़दीक आती जा रही थी।
युग ने तुरंत अपनी जैकेट के अंदर हाथ डालकर हथियार निकाल लिया।
"कम से कम दस-बारह लोग तो होंगे..."
शिव ने भी एक गहरी साँस ली।
"और शायद हमसे मिलने नहीं... हमें घेरने आ रहे हैं।"
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा। बिना कुछ कहे दोनों समझ गए कि अब हर फैसला सोच-समझकर लेना होगा।
हवा और भी तेज़ हो चुकी थी।
सीढ़ियों के पास परछाइयाँ दिखाई देने लगी थीं।
शिव ने धीमी आवाज़ में कहा,
"याद रख... अगर यह जाल है, तो निकलने का रास्ता भी यहीं कहीं होगा। बस हमें बाकी लोगों से पहले उसे ढूँढ़ना है।"
युग ने सिर हिलाया।
अगले ही पल सीढ़ियों का दरवाज़ा ज़ोर से खुला...
और कई हथियारबंद लोगों की परछाइयाँ छत पर फैल गईं।
दोनों मित्र अपनी जगह पर डटे रहे।
अब खेल शुरू हो चुका था।
सीढ़ियों का भारी लोहे का दरवाज़ा ज़ोरदार आवाज़ के साथ खुला।
धड़ाम...!
दरवाज़े के खुलते ही एक-एक करके लगभग पंद्रह हथियारबंद आदमी छत पर फैल गए। सभी के चेहरों पर काले मास्क थे और हाथों में अलग-अलग हथियार। कुछ के हाथों में पिस्तौल थीं, तो कुछ लोहे की रॉड और बेसबॉल बैट लिए हुए थे।
उनके बीच से एक लंबा-सा आदमी आगे बढ़ा। उसकी चाल में अजीब-सा आत्मविश्वास था।
वह हल्का-सा मुस्कुराया।
"काफी इंतज़ार करवाया तुम दोनों ने।"
शिव ने बिना किसी घबराहट के उसकी ओर देखा।
"हम इंतज़ार करने वालों में नहीं... इंतज़ार खत्म करने वालों में से हैं।"
उस आदमी के चेहरे पर व्यंग्यपूर्ण मुस्कान फैल गई।
"बहुत नाम सुना है तुम्हारा... आज देख भी लेंगे कि नाम कितना बड़ा है।"
देव ने धीरे से शिव के कान के पास कहा,
"गिनती की है?"
शिव ने सामने खड़े लोगों पर एक नज़र डाली।
"पंद्रह..."
देव मुस्कुराया।
"मतलब मेरे हिस्से सात... तेरे हिस्से आठ।"
शिव ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया,
"अगर तू पीछे रह गया तो तेरे हिस्से भी मुझे ही निपटाने पड़ेंगे।"
दोनों दोस्तों की बातचीत सुनकर सामने खड़े गुंडे हँस पड़े।
लेकिन उनकी हँसी अगले ही पल गायब हो गई।
क्योंकि शिव की आँखों में अब वही ठंडापन उतर चुका था, जो किसी तूफ़ान के आने से पहले दिखाई देता है।
"पकड़ लो इन्हें!"
सरदार के आदेश के साथ ही चार आदमी एक साथ शिव की तरफ दौड़े।
पहला आदमी पूरी ताकत से लोहे की रॉड घुमाता हुआ आया।
शिव एक कदम पीछे हटा।
रॉड हवा चीरती हुई निकल गई।
अगले ही पल शिव ने हमलावर की कलाई पकड़कर उसे ज़ोर से मोड़ा।
चक...!
दर्द से उसकी चीख निकल गई और रॉड उसके हाथ से छूट गई।
शिव ने वही रॉड हवा में पकड़ ली और घूमकर दूसरे आदमी के हाथ पर वार किया।
हथियार दूर जा गिरा।
तीसरा आदमी पीछे से झपटा, लेकिन शिव बिना पीछे देखे ही नीचे झुका। वह आदमी आगे निकल गया।
शिव ने उसकी पीठ पर ज़ोरदार धक्का मारा।
वह सीधे सामने खड़े अपने ही साथी से टकरा गया।
उधर देव भी किसी तूफ़ान से कम नहीं था।
उसने सामने पड़े सीमेंट के खाली कट्टे को पैर से उछालकर एक हमलावर की तरफ फेंका।
कट्टा उसके चेहरे से टकराया और वह लड़खड़ाकर गिर पड़ा।
दूसरे आदमी ने मुक्का चलाया।
देव ने उसका हाथ बीच में ही रोक लिया।
एक तेज़ कोहनी उसकी पसलियों पर मारी।
फिर घुटने का वार...
आदमी दर्द से दोहरा होकर ज़मीन पर बैठ गया।
अब पाँच-छह लोग एक साथ दोनों की तरफ बढ़े।
शिव ने देव की तरफ देखा।
"पीठ का ध्यान रखना!"
"हमेशा।"
दोनों पीठ से पीठ मिलाकर खड़े हो गए।
चारों तरफ से हमले शुरू हो गए।
कोई सामने से आ रहा था, कोई पीछे से।
लेकिन दोनों के बीच ऐसा तालमेल था मानो वर्षों से इसी पल की तैयारी कर रहे हों।
देव दाईं तरफ आने वालों को रोकता, तो शिव बाईं तरफ से हमला करने वालों को पीछे धकेल देता।
कुछ ही मिनटों में आधे से ज़्यादा लोग ज़मीन पर कराह रहे थे।
बाकी बचे लोग पहली बार घबराए।
उनका सरदार गुस्से से चिल्लाया,
"खड़े क्या हो? खत्म कर दो इन्हें!"
इतना कहते ही उसने अपनी पिस्तौल निकाल ली।
देव की नज़र सबसे पहले उस पर पड़ी।
"शिव!"
चेतावनी मिलते ही शिव बिजली की गति से एक तरफ लुढ़क गया।
गोली चलने की आवाज़ छत पर गूँज उठी।
गोली पीछे बनी अधूरी दीवार में धँस गई।
शिव ने ज़मीन पर पड़ा लोहे का पाइप उठाया और पूरी ताकत से उसकी ओर फेंक दिया।
पाइप सीधे सरदार के हाथ से टकराया।
पिस्तौल दूर जा गिरी।
देव ने मौका नहीं गंवाया।
वह दौड़कर सरदार तक पहुँचा और उसे ज़मीन पर गिरा दिया।
बाकी बचे गुंडों का हौसला टूट चुका था।
वे धीरे-धीरे पीछे हटने लगे।
शिव ने कठोर आवाज़ में कहा,
"जिसने भी तुम्हें भेजा है... उससे जाकर कहना कि अगली बार लोगों की गिनती ज़्यादा भेजे।"
सरदार ने गुस्से से उनकी तरफ देखा, लेकिन उसके पास जवाब नहीं था।
शिव ने देव की ओर देखा।
"चलें?"
देव ने चारों ओर नज़र दौड़ाई।
"रास्ता साफ़ है।"
दोनों बिना पीछे मुड़े सीढ़ियों की ओर बढ़ गए।
नीचे पहुँचकर उन्होंने इमारत के पिछले हिस्से से बाहर निकलने वाला रास्ता चुना।
कुछ ही मिनटों बाद उनकी एसयूवी तेज़ी से वहाँ से निकल चुकी थी।
गाड़ी में बैठते ही देव ने लंबी साँस छोड़ी।
"आज तो बच गए।"
शिव ने इंजन स्टार्ट करते हुए धीमे स्वर में कहा,
"नहीं... आज बस खेल शुरू हुआ है। जिसने हमें यहाँ बुलाया था, उसका असली मकसद अभी सामने आना बाकी है।"
एसयूवी अँधेरी सड़क पर तेज़ी से आगे बढ़ गई, जबकि अधूरी इमारत पीछे छूटती चली गई।
To be continued......