रिटर्न ऑफ़ द किंग - 1 Aparajita Tripathi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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रिटर्न ऑफ़ द किंग - 1

सुनसान सड़क पर एक काली एसयूवी स्थिर गति से आगे बढ़ रही थी। कार की रफ्तार लगभग चालीस किलोमीटर प्रति घंटा रही होगी। इंजन की धीमी घरघराहट और टायरों की सड़क पर रगड़ खाने की आवाज़ के अलावा चारों ओर ऐसा सन्नाटा पसरा था, मानो पूरी दुनिया ने कुछ देर के लिए सांस रोक रखी हो।शाम ढलने लगी थी।

आसमान पर हल्का नारंगी रंग धीरे-धीरे बैंगनी होने लगा था। दूर क्षितिज के पास सूरज आधा डूब चुका था। सड़क के दोनों ओर फैले खेतों पर शाम की सुनहरी रोशनी पड़ रही थी, जो कुछ ही देर में अंधेरे में बदलने वाली थी।यह शहर का बाहरी इलाका था। यहां ट्रैफिक नाम मात्र का था।

कभी-कभार कोई ट्रक या बाइक गुजर जाती, फिर वही खामोशी लौट आती।कार के अंदर भी कुछ देर तक सन्नाटा ही पसरा रहा।ड्राइविंग सीट पर बैठा लगभग बत्तीस वर्षीय युवक पूरी तन्मयता से सड़क पर नजरें जमाए हुए था।

उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी, जैसे वह किसी खास जगह की ओर जा रहा हो। उसकी आंखों में उत्साह साफ दिखाई दे रहा था।वहीं बगल वाली सीट पर बैठा दूसरा युवक बार-बार कार की खिड़की से बाहर झांक रहा था।

उसके चेहरे पर बेचैनी साफ नजर आ रही थी। वह कई बार कुछ कहने के लिए होंठ खोलता, फिर खुद को रोक लेता।आखिरकार उससे रहा नहीं गया।"युग... यह क्या तरीका है? इस तरह मुझे कहां लेकर जा रहा है?" उसने हल्की नाराजगी से कहा।युग ने बिना उसकी ओर देखे मुस्कुराते हुए स्टीयरिंग घुमाया।

"क्यों? डर लग रहा है?""डर नहीं... लेकिन तुझे पता है ना, बिना सिक्योरिटी के इस तरह कहीं भी निकलना हमारे लिए कितना बड़ा रिस्क है। अगर किसी ने पहचान लिया तो?"युग ने गहरी सांस ली।"तू हर वक्त यही सोचता रहता है।""और तू हर वक्त लापरवाह बना रहता है।

"शिव की आवाज़ में चिंता साफ झलक रही थी।"आज अगर किसी मीडिया वाले ने हमें देख लिया... या किसी पुराने दुश्मन को खबर लग गई... तो?"युग हल्का-सा हंसा।"कुछ नहीं होगा।""युग...""कुछ नहीं होगा, शिव।

"उसने इस बार थोड़ी गंभीरता से कहा।"इतने सालों बाद इस शहर में आए हैं। किसी को कानों-कान खबर तक नहीं है। और जहां हम जा रहे हैं... वहां तो कोई सोच भी नहीं सकता कि हम होंगे।"शिव ने गहरी सांस छोड़ी लेकिन उसके चेहरे की चिंता कम नहीं हुई।

कुछ पल दोनों के बीच फिर खामोशी छा गई।कार लगातार आगे बढ़ती रही।तभी युग ने धीरे से पूछा—"क्या तुझे इस सड़क को देखकर कुछ याद नहीं आ रहा?"शिव ने भौंहें सिकोड़ लीं।उसने सामने फैली सड़क को ध्यान से देखा।

सड़क के किनारे लगे पुराने बरगद...थोड़ी दूरी पर टूटी हुई बस स्टॉप...बाईं ओर पुरानी चाय की दुकान...और फिर...उसकी आंखें अचानक फैल गईं।"ये..."एक हल्की मुस्कान उसके होंठों पर खुद-ब-खुद आ गई।

यादों के बंद दरवाजे जैसे अचानक खुल गए।कॉलेज का पहला दिन...रैगिंग...पहली दोस्ती...पहला झगड़ा...रात-रात भर प्रोजेक्ट बनाना...कैंटीन में घंटों बैठना...बंक मारकर फिल्म देखने जाना...वार्षिक उत्सव...और...अनगिनत यादें।"क्या... हम कॉलेज जा रहे हैं?"उसने अविश्वास से पूछा।युग मुस्कुरा उठा।

"तूने सही पकड़ा, मेरी जान।"उसने आंख मारते हुए कहा—"हम कॉलेज ही जा रहे हैं।"शिव ने तुरंत उसकी ओर देखा।"तू पागल हो गया है क्या?""क्यों?""यह ठीक नहीं है।""फिर वही शुरू हो गया।""युग... हमारी लाइफ पहले जैसी नहीं रही।""मुझे पता है।""लोग हमें पहचानते हैं।

""पता है।""हमारे दुश्मन भी कम नहीं हैं।""वो भी पता है।""फिर भी तू—""बस!"युग ने उसकी बात बीच में ही काट दी।"कितने दिनों बाद अपनी पुरानी जिंदगी की तरफ लौटे हैं... और तू है कि लगातार लेक्चर दिए जा रहा है।

"उसने मुस्कुराते हुए रेडियो ऑन कर दिया।एफएम पर उसी समय एक पुराना रोमांटिक गाना चल रहा था।"खामोश हैं हम दोनों मगर... करने लगी बातें ये नज़र..."युग तुरंत गाने के साथ गुनगुनाने लगा।शिव ने कुछ सेकंड तक उसे देखा।

फिर बिना कुछ बोले रेडियो बंद कर दिया।कार में फिर सन्नाटा छा गया।युग ने हैरानी से उसकी ओर देखा।"ये क्या किया?""क्या बकवास गाना लगा रखा था।""बकवास?"युग ने नाटकीय अंदाज में सीने पर हाथ रख लिया।"तुझे संगीत की बिल्कुल समझ नहीं है।""और तुझे हर फालतू चीज अच्छी लगती है।""शिव..."युग हंस पड़ा।

"तू ना... बिल्कुल बोरिंग इंसान है।"उसने फिर उसी गाने की दो लाइनें खुद ही गुनगुनानी शुरू कर दीं।शिव चाहकर भी मुस्कुरा दिया।शायद यही वजह थी कि इतने साल बाद भी दोनों की दोस्ती वैसी ही थी।कुछ ही मिनट बाद कार की रफ्तार धीमी होने लगी।युग ने सड़क के किनारे कार रोक दी।इंजन बंद होते ही चारों तरफ गहरा सन्नाटा फैल गया।"चल... बाहर निकल।"दोनों कार से उतर गए।

ठंडी हवा का एक झोंका उनके चेहरों से टकराया।सामने सड़क के उस पार वही पुराना कॉलेज खड़ा था।उसी शान से...उसी गरिमा के साथ...मानो समय ने उसे छूने की कोशिश ही न की हो।दोनों कुछ कदम आगे बढ़े।

अपने हाथ सीने के सामने बांधकर चुपचाप कॉलेज को देखने लगे।कई मिनट तक किसी ने कुछ नहीं कहा।आंखें देख रही थीं...लेकिन दिमाग अतीत में भटक चुका था।आखिर शिव ने धीमे से कहा—"ये बिल्कुल वैसा ही है..."उसकी आवाज़ में भावनाएं साफ झलक रही थीं।

"...कुछ भी नहीं बदला।"युग ने भी गौर से इमारत को देखा।"हां..."फिर मुस्कुराया।"बस लगता है हाल ही में पेंट हुआ है।"दोनों हल्का-सा हंस पड़े।शाम का समय होने के कारण कैंपस लगभग खाली था।कुछ छात्र-छात्राएं अपने-अपने बैग टांगे बाहर निकल रहे थे।

कुछ लोग लॉन में बैठे बातें कर रहे थे।हर कोई अपनी दुनिया में व्यस्त था।किसी की नजर इन दोनों पर नहीं गई।और शायद यही बात युग को सबसे ज्यादा पसंद आ रही थी।वह पहली बार खुद को फिर से एक सामान्य इंसान महसूस कर रहा था।

"चल..."उसने शिव के कंधे पर हाथ रखा।"कैंटीन चलते हैं।"शिव ने तुरंत उसकी ओर देखा।"क्या सच में अंदर जाएंगे?""हां।""अगर किसी ने पहचान लिया तो?"युग मुस्कुराया।"पहले पहचानने तो दे।""युग...""चल ना..."उसने हल्का-सा धक्का दिया।"इतना भी मत सोच।

"दोनों सड़क पार करके कॉलेज के मुख्य गेट की ओर बढ़ गए।गेट से अंदर कदम रखते ही दोनों अनायास धीमे हो गए।यह वही रास्ता था...जहां कभी वे दोस्तों के साथ दौड़ते हुए क्लास पहुंचते थे...जहां कभी असाइनमेंट जमा करने की जल्दी होती थी...जहां कभी बेवजह घंटों टहलते रहते थे।

हर पेड़...हर बेंच...हर दीवार...हर कोना...बीते दिनों की कोई न कोई याद अपने अंदर समेटे खड़ा था।शिव ने चलते-चलते अपनी चाल धीमी कर दी।उसने दोनों हाथ अपनी पैंट की जेबों में डाले...आंखें बंद कर लीं...और चेहरा आसमान की ओर उठा लिया।उसने एक लंबी, गहरी सांस ली।मानो इस हवा में आज भी वही पुरानी खुशबू घुली हुई हो।पीछे मुड़कर युग उसे देखने लगा ।

उसके होंठों पर अनायास मुस्कान आ गई।धीरे से बोला—"तू बिल्कुल नहीं बदला..."शिव ने आंखें खोलीं।युग मुस्कुराते हुए उसकी ओर बढ़ा।"आज भी तुझे इस जगह की हवा सबसे ज्यादा सुकून देती है।"शिव ने कोई जवाब नहीं दिया।बस हल्की-सी मुस्कान उसके चेहरे पर फैल गई।युग ने उसकी बांह पकड़ ली।"अगर तुझे ऐसे ही छोड़ दिया ना... तो पूरी रात यहीं खड़ा रहेगा।"दोनों हंसते हुए कैंटीन की ओर बढ़ गए ।


To be continued......✍️✍️✍️✍️✍️