रिटर्न ऑफ़ द किंग - 4 Aparajita Tripathi द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

रिटर्न ऑफ़ द किंग - 4

सुनसान सड़क पर काली एसयूवी तेज़ रफ्तार से दौड़ी चली जा रही थी। रात पूरी तरह उतर चुकी थी। सड़क के दोनों ओर फैले घने पेड़ हेडलाइट की रोशनी में कुछ पल के लिए चमकते और फिर अंधेरे में गुम हो जाते।
गाड़ी के अंदर असामान्य खामोशी पसरी हुई थी।
कुछ देर पहले हुई भिड़ंत के निशान दोनों के शरीर पर साफ दिखाई दे रहे थे।

देव के माथे के पास हल्की-सी खरोंच थी, जिससे सूखता हुआ खून अभी भी दिखाई दे रहा था। उसकी दाईं बाँह पर भी लोहे की रॉड का वार पड़ा था, जिसकी वजह से कपड़ा फट चुका था।
वहीं शिव के बाएँ कंधे से लगातार खून रिस रहा था। गोली उसे आर-पार नहीं लगी थी, बल्कि कंधे को छीलती हुई निकल गई थी। ऊपर से देखने पर घाव छोटा लग रहा था, लेकिन खून लगातार बह रहा था।
शिव दर्द को अनदेखा करने की पूरी कोशिश कर रहा था। उसने अपना एक हाथ घाव पर दबा रखा था और दूसरी तरफ खिड़की से बाहर अंधेरे में गुजरते रास्तों को देख रहा था।

अचानक देव ने गाड़ी की स्पीड धीमी कर दी।
कुछ ही दूरी पर सड़क किनारे एक छोटा-सा निजी अस्पताल दिखाई दिया। अस्पताल के बाहर लगी सफेद ट्यूब लाइट टिमटिमा रही थी। बोर्ड पर बड़े अक्षरों में लिखा था—
"जीवन ज्योति ट्रॉमा एंड जनरल हॉस्पिटल"
रात काफी हो चुकी थी, इसलिए अस्पताल के बाहर ज्यादा चहल-पहल नहीं थी। इक्का-दुक्का बाइक खड़ी थीं और इमरजेंसी के बाहर एक एम्बुलेंस शांत खड़ी दिखाई दे रही थी।
देव ने बिना कुछ कहे गाड़ी अस्पताल के बाहर रोक दी।
टायरों के रुकते ही शिव ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

"क्या हुआ? गाड़ी क्यों रोक दी?"
देव ने इंजन बंद किया और उसकी तरफ मुड़ गया।
उसकी नजर सीधे शिव के कंधे पर गई, जहाँ खून अब भी धीरे-धीरे बह रहा था।
"तुझे भी चोट लगी है... और मुझे भी," उसने शांत लेकिन गंभीर स्वर में कहा। "फर्क सिर्फ इतना है कि मुझे मामूली चोट आई है, लेकिन तेरे कंधे को गोली छूकर गई है। इलाज तो हम दोनों को करवाना ही पड़ेगा।"

शिव ने लापरवाही से अपने कंधे की तरफ देखा और हल्की-सी मुस्कान के साथ बोला,
"इतनी-सी बात के लिए अस्पताल आने की जरूरत नहीं है। घर चलते हैं... बहुत थक गया हूँ।"
उसने सीट पर सिर पीछे टिकाते हुए आँखें कुछ पल के लिए बंद कर लीं।

आज का दिन असाधारण रूप से लंबा रहा था।
पहले रहस्यमयी मुलाकात...
फिर जानलेवा हमला...
और अब यह चोट...
शरीर थक चुका था।
लेकिन देव इतनी आसानी से मानने वालों में से नहीं था।

उसने गहरी साँस लेते हुए कहा,
"तेरी कोई बात मैं मान भी लूँ... लेकिन इस वक्त नहीं।"
शिव ने आँखें खोलीं।
"क्यों?"
देव ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
"क्योंकि फिलहाल सबसे जरूरी तेरे कंधे में लगी गोली का इलाज है। अगर घाव में इन्फेक्शन हो गया तो मुश्किल बढ़ जाएगी। डॉक्टर को दिखा लेते हैं।"
शिव हल्का-सा हँसा।

"अरे... कुछ नहीं होगा। गोली बस छूकर निकली है।"
यह कहते हुए उसने उँगलियों से अपने कंधे के घाव को हल्के से दबाया।
दर्द की तेज़ लहर पूरे शरीर में दौड़ गई, लेकिन उसने चेहरे पर कोई शिकन नहीं आने दी।
देव ने उसकी हरकत देख सिर पकड़ लिया।

"वाह... बड़ा बहादुर बन रहा है!"
फिर मुस्कुराते हुए बोला,
"गोली भी शायद तुझ पर फिदा हो गई थी। देख... कितने प्यार से कंधा छूकर निकली है। अगर थोड़ा और प्यार हो जाता तो सीधे अंदर ही घर बना लेती।"
शिव उसकी बात सुनकर मुस्कुरा दिया।

"तेरे अंदर ना... हर वक्त मजाक करने वाला कीड़ा जिंदा रहता है।"
"और तेरे अंदर जिद करने वाला।"
देव ने तुरंत जवाब दिया।
"चल... नीचे उतर।"
"देव..."
"कोई बहाना नहीं चलेगा।"
इतना कहकर उसने ड्राइविंग सीट का दरवाजा खोला और बाहर निकल गया।

ठंडी हवा का झोंका उसके चेहरे से टकराया।
उसने गाड़ी का दरवाजा बंद किया और दूसरी तरफ आकर शिव का दरवाजा खोल दिया।
शिव कुछ पल तक चुपचाप बैठा रहा।
फिर मजबूरी में बाहर उतर आया।
जैसे ही उसके पैर जमीन पर पड़े, कंधे में हल्का-सा दर्द उठा। उसने अनायास ही अपना हाथ घाव पर रख लिया।

उसकी नजर सामने बने छोटे-से अस्पताल पर गई।
दो मंजिला साधारण-सी इमारत...
दीवारों पर पुराना रंग...
मुख्य गेट के ऊपर टिमटिमाता हुआ बोर्ड...
रिसेप्शन के अंदर जलती सफेद रोशनी...
रात का समय होने की वजह से अस्पताल लगभग शांत था। इक्का-दुक्का मरीज कुर्सियों पर बैठे अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। एक नर्स रिसेप्शन पर रजिस्टर में कुछ लिख रही थी, जबकि गलियारे में फिनाइल और दवाइयों की मिली-जुली गंध फैली हुई थी।

शिव ने अस्पताल को एक नज़र देखा और फिर देव की तरफ मुड़कर बोला,
"उम्मीद है... यहाँ कोई ज्यादा सवाल नहीं पूछेगा।"
देव ने हल्की मुस्कान के साथ कहा,
"अगर पूछे भी... तो जवाब मैं दे दूँगा। तू बस चुपचाप डॉक्टर को अपना काम करने देना।"
शिव ने बेबसी से सिर हिलाया।
"ठीक है... आज तेरी जिद के आगे हार मान लेता हूँ।"
देव मुस्कुराया।

"बस यही समझदारी हमेशा दिखाया कर।"
दोनों धीमे कदमों से अस्पताल के मुख्य दरवाजे की ओर बढ़ गए, बिना इस बात का अंदाज़ा लगाए कि अंदर उनका सामना किसी ऐसे शख्स से होने वाला था, जो उनकी पूरी रात की दिशा बदल देने वाला था।


देव तेज़ कदमों से अस्पताल के कॉरिडोर में आगे बढ़ रहा था, जबकि शिव उसके पीछे-पीछे चल रहा था। दोनों के कपड़ों पर धूल और खून के हल्के निशान साफ़ दिखाई दे रहे थे। शिव ने अपना बायाँ हाथ कंधे पर रखा हुआ था, जहाँ से खून अब भी धीरे-धीरे रिस रहा था।

रात के लगभग साढ़े ग्यारह बज रहे थे। अस्पताल लगभग शांत था। रिसेप्शन पर बैठी नर्स किसी मरीज की फाइल अपडेट करने में व्यस्त थी, जबकि कॉरिडोर में फिनाइल और एंटीसेप्टिक की हल्की गंध फैली हुई थी।

डॉक्टर के केबिन के बाहर बैठा सिक्योरिटी गार्ड दोनों को इस हालत में अपनी ओर आते देख सतर्क हो गया

देव बिना रुके उसके सामने पहुँचा और अपनी जेब से एक पहचान-पत्र निकालकर क्षणभर के लिए उसकी ओर दिखाया।

"इमरजेंसी है। रास्ता दीजिए।"

उसकी आवाज़ में ऐसा आत्मविश्वास था कि गार्ड कुछ पल के लिए असमंजस में पड़ गया। उसने दोनों की घायल अवस्था देखी और एक तरफ हट गया।

देव ने बिना समय गंवाए केबिन का दरवाज़ा खोल दिया।

अंदर लगभग पचास वर्षीय डॉक्टर अपनी मेज़ पर बैठे मरीजों की रिपोर्ट देख रहे थे। अचानक दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनकर उन्होंने चश्मा उतारा और सामने खड़े दोनों युवकों को देखा।

एक की शर्ट पर खून के धब्बे थे, दूसरा दर्द छिपाने की कोशिश कर रहा था।

डॉक्टर तुरंत अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए।

"क्या हुआ? आप लोग ठीक तो हैं?"

देव ने शांत स्वर में कहा,

"डॉक्टर साहब... घबराइए मत। हमें बस तुरंत इलाज चाहिए।"

डॉक्टर की नज़र जैसे ही शिव के कंधे पर गई, उनका चेहरा गंभीर हो गया।

"यह तो गोली का घाव लग रहा है..."

शिव हल्का-सा मुस्कुराया।

"आर-पार नहीं गई... बस छीलती हुई निकल गई है।"

डॉक्टर तुरंत मेडिकल ट्रॉली की तरफ बढ़े।

"पहले घाव देखना पड़ेगा।"

देव और शिव सामने रखी कुर्सियों पर बैठ गए।

डॉक्टर ने दस्ताने पहनते हुए कहा,

"मुझे एक नर्स की ज़रूरत पड़ेगी।"

वह दरवाज़े की तरफ बढ़े ही थे कि देव ने कहा,

"अगर संभव हो तो उन्हें यहीं बुला लीजिए। मेरे दोस्त की हालत ऐसी नहीं कि उसे बार-बार उठाया जाए।"

डॉक्टर ने सिर हिलाया।

"ठीक है।"

उन्होंने मेज़ पर रखा मोबाइल उठाया और नर्स का नंबर मिलाया।

कुछ सेकंड बाद कॉल रिसीव हुई।

"सिस्टर, ज़रा मेरे केबिन में आइए... तुरंत।"

"जी, सर।"

कॉल कट गई।

डॉक्टर ने दोनों की तरफ देखते हुए कहा,

"दो मिनट में आ जाएँगी।"

कमरे में कुछ पल के लिए खामोशी छा गई।

केवल दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी।

देव ने धीरे से शिव की ओर देखा।

"दर्द ज़्यादा हो रहा है?"

"नहीं... जितना दिख रहा है, उससे कम है।"

"झूठ बोल रहा है।"

शिव हल्का-सा मुस्कुराया।

"तुझे कब से मेरी इतनी चिंता होने लगी?"

"जब से तू बेवकूफियाँ करने लगा है।"

दोनों की धीमी बातचीत सुनकर डॉक्टर के चेहरे पर भी हल्की मुस्कान आ गई।

तभी...

टक... टक...

केबिन के दरवाज़े पर दस्तक हुई।

"Come in."

दरवाज़ा धीरे-धीरे खुला।

सफेद यूनिफॉर्म पहने एक युवा नर्स अंदर आई। उसके बाल करीने से बंधे हुए थे और गले में स्टेथोस्कोप लटका था। चेहरे पर थकान के बावजूद एक सादगी और आत्मविश्वास साफ़ झलक रहा था।

उसने कमरे में मौजूद लोगों की ओर देखा।

अगले ही पल उसकी नज़र शिव पर जाकर ठहर गई।

उधर...

शिव जैसे कुछ सेकंड के लिए बिल्कुल स्थिर हो गया।

उसकी आँखों में पहचान की हल्की-सी चमक उभरी।

देव ने पहले शिव को देखा...

फिर नर्स को...

और उसके चेहरे पर धीरे-धीरे मुस्कान फैल गई।

वह मन ही मन बुदबुदाया—

"अरे... ये तो वही लड़की है..."

जिसे कुछ घंटे पहले कैफ़े में किताब पढ़ते हुए देखकर शिव पहली बार किसी अनजान चेहरे में खो गया था।

कमरे का माहौल अचानक बदल चुका था।

एक तरफ डॉक्टर इलाज की तैयारी कर रहे थे...

और दूसरी तरफ, दो अनजान लोगों की दूसरी मुलाक़ात बिना किसी योजना के, बिल्कुल अप्रत्याशित तरीके से होने जा रही थी।





To be continued....