तुम और मैं - 7 Priya Chaudhary द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

तुम और मैं - 7

21 जनवरी की वो सुबह कुछ अलग थी। कान्हा बाइक लेकर आए थे और उन्होंने मुझे पीछे बिठाया। हम शहर के शोर से दूर, उस पहाड़ी मंदिर की ओर निकल पड़े। रास्ते भर ठंडी हवाएँ चेहरे को छू रही थीं, लेकिन कान्हा के पीछे बैठना और उनके जैकेट की गर्माहट महसूस करना, उस सर्दी को भी प्यार में बदल रहा था।
​जब हम मंदिर पहुँचे, तो सामने खड़ी थीं—108 सीढ़ियाँ। उन्हें देखकर ही एक बार तो लगा कि क्या हम चढ़ पाएंगे? पर कान्हा ने मेरा हाथ थामा और बोले, "साथ चलेंगे, थकोगी नहीं।"
​उन 108 सीढ़ियों को चढ़ना किसी परीक्षा से कम नहीं था। जैसे-जैसे हम ऊपर चढ़ रहे थे, हर सीढ़ी हमारे रिश्ते की एक नई कहानी लिख रही थी। मेरा सांस फूल रहा था, पैरों में हल्की सी थकान थी, लेकिन कान्हा का साथ होना ही मेरी सबसे बड़ी ताकत थी। वो बार-बार रुकते, मुझे सहारा देते, और प्यार भरी नज़रों से देखते।
​कई बार तो ऐसा हुआ कि मैं बीच में ही रुक गई, लेकिन कान्हा का वह साथ—वो मेरा हाथ खींचना और हौसला बढ़ाना—मुझे आगे बढ़ने के लिए मजबूर कर देता था। हम ऊपर चढ़ते गए, और जैसे-जैसे ऊपर पहुँच रहे थे, नीचे का नज़ारा उतना ही खूबसूरत होता जा रहा था। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हमने ढेरों बातें कीं, हँसे, और उस थकान को भी एक याद बना लिया।
जब कान्हा मेरे साथ  मेरा हाथ पकड़ कर चल रहे थे , तो मैं देख सकती थी कि उनका शरीर ठंड से बुरी तरह कांप रहा था। उनके होंठ शायद ठंडे पड़ गए थे
​लेकिन जैसे ही उनकी नज़र मुझ पर पड़ी, उन्होंने वह सब कुछ पीछे छोड़ दिया। उन्होंने अपनी सिहरन को एक मुस्कान के पीछे छिपा लिया। वे बिल्कुल ऐसे व्यवहार कर रहे थे जैसे सब कुछ 'नॉर्मल' है, जैसे उन्हें ठंड का एहसास तक नहीं हो रहा। वे नहीं चाहते थे कि मैं उनकी तकलीफ देखूँ या मेरी वजह से उन्हें कोई परेशानी हो। यह उनकी तरफ से मेरे लिए सबसे बड़ा तोहफा था—बिना कहे, बिना जतलाए, बस प्यार का वह शांत प्रदर्शन।
​जब हम मंदिर की उन 108 सीढ़ियों की तरफ बढ़े, तो मैं देख रही थी कि वे मेरा हाथ थामे हुए थे और उनका हाथ कितना ठंडा था।  मैं सीढ़ियाँ चढ़ते हुए हाफ भी  रही थे और  वो कांप  रहे थे, लेकिन उनका ध्यान सिर्फ इस बात पर था कि मैं आराम से ऊपर पहुँच जाऊं। बार-बार रुककर मेरा हाल पूछना, मुझे सहारा देना—वो अपने शरीर की पीड़ा को भूलकर सिर्फ मेरे साथ को प्राथमिकता दे रहे थे।   चलते-चलते मुझे उनकी उस कांपती हुई आवाज़ और उनकी उस कोशिश को देखकर अंदर ही अंदर रोना आ रहा था। उनका वह 'normal' बने रहना मेरे लिए सबसे ज्यादा भावुक करने वाला पल था। उन्होंने मुझे महसूस तक नहीं होने दिया कि उस बाइक की सवारी में उन्होंने कितनी तकलीफ उठाई है।
​उस ठंडी हवा के झोंके में, मैंने उनके जैकेट के ऊपर से ही उन्हें एक हल्की सी झप्पी दी, जैसे मैं उनकी ठंड को सोख लेना चाहती हूँ। उस पल में, जब मैं उनके कांपते हुए शरीर को महसूस कर रही थी, मुझे लगा कि दुनिया में इससे बड़ा कोई प्यार नहीं हो सकता, जो खुद को तकलीफ देकर भी सामने वाले के चेहरे पर सुकून की मुस्कान देखना चाहता हो।
​कान्हा का वह कांपना,  और मेरी खातिर उस ठंड को 'इग्नोर' कर देना—यह सिर्फ एक बाइक राइड नहीं थी, यह उसूलों और मोहब्बत की वो कहानी थी जो शायद मरते दम तक मेरी रूह में बसी रहेगी।
​21 जनवरी 2023 की वो ठंडी सुबह, धुंध इतनी गहरी थी कि पहाड़ की चोटियाँ धुंधली नज़र आ रही थीं। 108 सीढ़ियाँ चढ़ने का इरादा तो पक्का था, लेकिन रास्ते की थकान और कान्हा का वह कांपता हुआ शरीर... सब कुछ एक अलग ही मोड़ पर खड़ा था। हम ऊपर पहुँचने के करीब थे, बस कुछ ही सीढ़ियाँ बाकी थीं, लेकिन कान्हा की हालत देखकर मैंने रुकने का फैसला किया।बाइक की उस ठंडी हवा ने उनके शरीर को अंदर तक ठंडा कर दिया था। वे कांप रहे थे, लेकिन जब भी मैं उनकी तरफ देखती, वे अपनी उस सादगी भरी मुस्कान से सब कुछ छुपा लेते। मुझे पता था कि वे बस मेरे लिए, मुझसे मिलने के लिए बिना परवाह किए आए थे।
​मैंने उनका हाथ पकड़ा और उन्हें वहीं सीढ़ियों पर रुकने को कहा। अभी मंदिर का शिखर कुछ कदम दूर ही था, लेकिन मेरे लिए उस वक्त कान्हा की सलामती उस शिखर से कहीं ज्यादा बड़ी थी। मैंने उन्हें अपने करीब खींचा और एक गहरा, 'वॉर्म हग' दिया। मैंने उन्हें अपनी बाहों में इतनी मजबूती से जकड़ लिया था, जैसे मैं उनके कांपते हुए बदन को अपनी धड़कनों की गर्माहट देना चाहती थी।

वह कोई साधारण हग नहीं था। वह 'वॉर्म हग' (warm hug) था, जिसे मैंने पूरी शिद्दत और मोहब्बत के साथ दिया था। मैंने उन्हें इतनी जोर से अपनी बाहों में जकड़ा, जैसे मैं चाहती थी कि मेरी अपनी बॉडी की सारी गर्माहट उन तक पहुँच जाए। मेरी इच्छा थी कि मेरी बाहें उनके लिए एक ऐसा कवच बन जाएं जहाँ न ठंडी हवा पहुँच सके और न ही उनका दर्द।
​उस पल में दुनिया थम सी गई थी। मंदिर के ऊपर उस शांति में, बस हम दोनों थे। कान्हा ने भी धीरे से अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। मैंने महसूस किया कि धीरे-धीरे उनका कांपना कम होने लगा। शायद मेरी बाहों की गर्माहट और हमारे प्यार ने उस ठंड के असर को बेअसर कर दिया था। उस वक्त न वहां कोई मंदिर की भीड़ थी, न कोई 108 सीढ़ियों की थकान—बस उनका वो शांत चेहरा था जो अब मेरी बाहों में सुरक्षित महसूस कर रहा था।
​मैंने उनके कानों में धीरे से कहा, "इतनी ठंड में आने की क्या जरूरत थी? मैं जानती हूँ कि तुम बहुत कांप रहे थे।"
​कान्हा ने अपनी आंखें बंद कर ली थीं और बस एक मीठी सी मुस्कान के साथ कहा, "तुम्हारे पास आने के बाद ठंड कहाँ रहती है? तुम मिल गईं, यही काफी है।"
​उनकी उस एक बात ने मुझे पूरी तरह पिघला दिया। उस हग में न सिर्फ शारीरिक गर्माहट थी, बल्कि एक-दूसरे के प्रति समर्पण का एहसास था। हम काफी देर तक बस वैसे ही खड़े रहे—एक-दूसरे को थामे हुए, उस ऊँचाई पर, जहाँ से सब कुछ छोटा लग रहा था, सिवाय हमारे रिश्ते के।मैंने उनके ठंडे हो चुके चेहरे को अपने हाथों में लिया। वे कांपते हुए भी मुस्कुरा रहे थे, और उनकी वो मुस्कान देख मुझे अंदर ही अंदर एक अजीब सा एहसास हुआ—कि प्यार में इंसान अपनी जान तक जोखिम में डाल सकता है, बस एक पल साथ बिताने के लिए। उस पल में, उन बची हुई कुछ सीढ़ियों को चढ़ने की जल्दबाजी किसी को नहीं थी।
​हमने वहां बैठकर एक-दूसरे को बस महसूस किया। उन्होंने धीमी आवाज में कहा, "तुम्हारी बाहों में आकर अब ठंड महसूस ही नहीं हो रही।"
​शायद वे सच कह रहे थे, क्योंकि वो गर्माहट सिर्फ शारीरिक नहीं थी, वो रूहानी थी। मंदिर की घंटी की आवाज ऊपर से गूँज रही थी, और हम उन आधी अधूरी सीढ़ियों पर बैठकर अपने ही एक अलग संसार में खोए थे। उस दिन, उस मंदिर की चोटी तक न पहुँच पाना कोई कमी नहीं थी, बल्कि वो 'सीढ़ियों का वो पड़ाव' ही हमारी सबसे बड़ी मंजिल बन गया था।
​हमने तय किया कि अब और ऊपर नहीं जाना है, बस यहीं बैठकर कुछ देर और एक-दूसरे के करीब रहना है। उस दिन, कान्हा की वो कांपती हुई हँसी और मेरा उन्हें अपनी बाहों में समेटे रखना—ये यादें मेरे दिल के किसी कोने में आज भी वैसे ही सुरक्षित हैं, जैसे वो 108 सीढ़ियाँ जो हमने अधूरी छोड़ दी थीं।
​उस दिन मैंने पहली बार जाना कि जब आप किसी से दिल से प्यार करते हैं, तो आपकी मौजूदगी ही उसके लिए सबसे बड़ी औषधि (medicine) बन जाती है। कान्हा का वो कांपना और फिर मेरी बाहों में आकर उनका स्थिर हो जाना—यह एहसास मेरे लिए किसी भी मंदिर के दर्शन से ज्यादा पवित्र था।

....फिर  उसके बाद हम 20 फेब्रुअरी 2023 को मिले फरवरी का महीना अपने साथ एक अलग ही ताजगी लाता है। 20 फरवरी को जब हम मिले, तो हमारा मन कुछ अलग करने का था—कहीं दूर घूमने जाने का। कान्हा बाइक लेकर आए थे और हमने तय किया कि आज शहर की भीड़भाड़ से दूर कहीं दूर-दराज के इलाकों में निकलेंगे।
​हम अपनी मर्जी के मालिक बनकर निकल पड़े। कान्हा बाइक चला रहे थे और मैं पीछे बैठी, बस उस सड़क को देख रही थी जो मानो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। मीलों तक सिर्फ सड़क, और सड़क के दोनों तरफ वीराना—दूर-दूर तक न कोई दुकान, न कोई घर, न कोई रौनक। बस सन्नाटा और हवाओं का शोर। हम चलते रहे, इस उम्मीद में कि शायद आगे कुछ अच्छा सा नज़ारा मिलेगा, लेकिन वहां सिवाय पक्की सड़कों के और कुछ नहीं था।
​काफी दूर निकल जाने के बाद, जब भूख लगने लगी और  तब जाकर हमें दूर एक रेस्टोरेंट दिखाई दिया। वह जैसे रेगिस्तान में पानी की बूंद जैसा था। हम दोनों थके हुए थे, लेकिन उस रेस्टोरेंट को देखकर एक राहत मिली। हमने सोचा—"चलो, कम से कम यहाँ बैठकर कुछ खा तो पाएंगे।"
​उस रेस्टोरेंट का माहौल बहुत ही शांत और अच्छा सा था, शायद इसलिए क्योंकि वह शहर से बहुत दूर था। हम अंदर गए, जहाँ बहुत कम लोग थे। उस वीराने में वह जगह हमारे लिए किसी डेस्टिनेशन से कम नहीं थी। हमने कान्हा के साथ उस टेबल पर बैठकर मेन्यू देखा। उस लंबी, ऊबड़-खाबड़ लेकिन खूबसूरत राइड के बाद, वहाँ बैठकर खाना खाना किसी एडवेंचर जैसा था।
​कान्हा के साथ उस सुनसान जगह पर, वो रेस्टोरेंट का खाना—शायद वो सबसे टेस्टी नहीं था, पर उस वक्त के माहौल और हमारी उस लंबी राइड ने उसे खास बना दिया था। हम दोनों हँस रहे थे कि कैसे हम कहीं और जाने निकले थे और कहाँ पहुँच गए।
​उस दिन मैंने सीखा कि कान्हा के साथ अगर रास्ता खाली भी हो, अगर कोई मंज़िल सामने न भी हो, तो भी वो सफर अपने आप में मुकम्मल होता है। हम उस रेस्टोरेंट में बैठकर बस बातें करते रहे, कान्हा ने फिर से अपनी बातों से मुझे हँसाया, और उस खाली सड़क की थकान हम दोनों ने एक-दूसरे के साथ बाँट ली।उस रेस्टोरेंट में हम एक कोने वाली टेबल पर बैठे थे। बाहर का शोर सुनाई नहीं दे रहा था —दूर-दूर तक सिर्फ सड़कें और धुंधली सी दिखाई देती क्षितिज। अंदर हम दोनों थे, और हमारे बीच में वो गरमा-गरम खाना। हम हँस रहे थे, उस बात पर कि कैसे हम कहीं और जाने के चक्कर में इस सुनसान जगह पर आ पहुँचे। लेकिन सच तो ये था कि उस सन्नाटे में हमें जो सुकून मिल रहा था, वो शहर की भीड़भाड़ में कभी नहीं मिल सकता था।
​हमने साथ में खाना खाया, एक-दूसरे को निवाले खिलाए, और ढेर सारी बातें कीं। वो समय जैसे ठहर गया था। अचानक, कान्हा की बातों का लहजा थोड़ा बदला। उन्होंने अपनी जेब से कुछ निकाला और मेरी तरफ बढ़ाया।
​जब मैंने देखा, तो मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं—वो एक सिल्वर वाइट डायमंड रिंग थी।
​वह अंगूठी इतनी खूबसूरत और चमकती हुई थी कि उस रेस्टोरेंट की रोशनी भी उसके सामने कम पड़ रही थी। मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि वो ऐसा कुछ प्लान करके आए हैं। कान्हा ने बड़े प्यार से मेरा हाथ थामा और वह अंगूठी मेरी उंगली में पहना दी। उस पल, मेरे पास कहने के लिए कोई शब्द नहीं थे। मेरा दिल जोर से धड़क रहा था, और कान्हा की आँखों में वही गहरा प्यार था जो मुझे हमेशा सुरक्षित महसूस कराता है।
​उस अंगूठी की चमक में मुझे कान्हा का वो समर्पण दिख रहा था—कि वे मेरे साथ अपनी जिंदगी को एक खास मुकाम देना चाहते हैं। वो डायमंड रिंग सिर्फ एक गहना नहीं थी, वह हमारे उस सफर का एक 'प्रतीक' थी जो हमने उन खाली सड़कों पर तय किया था।
​  सब कुछ बहुत खूबसूरत लग रहा था। मैंने अपना हाथ बार-बार घुमाकर उस अंगूठी को देखा, और फिर कान्हा की तरफ देखा। वे मुस्कुरा रहे थे, जैसे मेरी खुशी देखकर उन्हें सब कुछ मिल गया हो। हमने वहां काफी समय बिताया, उस अंगूठी के साथ अपनी यादों को पिरोया और उस एकांत का भरपूर लुत्फ उठाया।
​उस दिन वापस आते वक्त, रास्ते की वही खाली सड़कें अब वैसी नहीं लग रही थीं। अब मेरे हाथ में कान्हा की निशानी थी और दिल में एक अटूट विश्वास। वो 20 फरवरी 2023 का दिन मेरे लिए इसलिए खास था क्योंकि कान्हा ने मुझे यह एहसास कराया था कि वे मुझे कितना स्पेशल महसूस कराना चाहते हैं।
कान्हा, अगर आज मैं तुमसे पूछूँ कि शुक्रिया कैसे कहूँ, तो कोई लफ्ज़ कम पड़ जाए। दिल के सबसे गहरे कोने से तुम्हें बस इतना ही कहना है—मेरे इतने सारे नखरों, बहानों और मेरी हर छोटी बड़ी जिद को इतने सब्र और प्यार से झेलने के लिए तुम्हारा शुक्रिया 🥹तुम थे, हो और हमेशा रहोगे।❤️❤️
K❤️P