तुम और मैं - 4 Priya Chaudhary द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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तुम और मैं - 4

2020 से 2022 तक के उन दो सालों के इंतज़ार की घड़ियाँ, जब अंततः 2022 में उस 'हाँ' में बदलीं, तो लगा जैसे कोई बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो। कान्हा के लिए वह सिर्फ एक शब्द नहीं था, बल्कि उन दो सालों की मेहनत और धैर्य की सबसे बड़ी जीत थी। मैं आज भी उस पल को याद करती हूँ तो महसूस होता है कि कान्हा की खुशी कितनी मासूम और सच्ची थी। वह खुशी किसी बड़े इनाम जैसी नहीं, बल्कि एक बहुत ही सुकून भरी मुस्कान जैसी थी—जैसे एक लंबे सफर के बाद उन्हें अपना घर मिल गया हो।
​लेकिन असली जादू 'हाँ' कहने के बाद शुरू हुआ। हम सिर्फ दो अजनबी नहीं रहे, हम 'दोस्त' बन गए। अब फेसबुक के वो बेजान मैसेज, भावनाओं से लबरेज़ होने लगे थे। मैसेज से शुरू हुई बातें धीरे-धीरे कॉल पर तब्दील हो गईं। वह पहली कॉल, वो पहली बार उनकी आवाज़ को अपने कानों में महसूस करना—सब कुछ कितना जादुई था! उस आवाज़ में एक ऐसा ठहराव और अपनापन था, जिसने मेरे सारे गुस्से को एक झटके में बहा दिया। हम दोनों एक-दूसरे को समझने लगे थे।
​सच कहूँ तो, उस वक्त भी मैं बहुत कम बोलती थी। कॉल पर मैं सिर्फ 'हाँ', 'हूँ', या 'हम्म' कहकर अपना फर्ज निभा देती थी। कान्हा के पास तो किस्सों का पूरा खजाना होता था, वो अपनी दुनिया, अपने बचपन और अपने सपनों की बातें करते, और मैं? मैं बस उन्हें सुनती रहती। मुझे आज भी लगता है कि कान्हा को उस वक्त मेरी आवाज़ सुनने की कितनी जल्दी रहती होगी। मेरी वो छोटी-छोटी प्रतिक्रियाएं—'हूँ', 'हम्म'—कान्हा के लिए किसी लंबी कविता से कम नहीं होती थीं। शायद उनके लिए मेरा कॉल उठा लेना ही उनकी आधी जीत थी। वो बोलते जाते थे, अपनी बातें साझा करते जाते थे, और उन्हें शायद इस बात की परवाह भी नहीं होती थी कि मैं कम बोल रही हूँ या नहीं। उन्हें तो बस इस बात का सुकून था कि मैं उनकी बातों को सुन रही हूँ।
​मैं अक्सर खुद पर मुस्कुराती हूँ कि मैं कितनी अजीब थी। कान्हा अपना दिल खोलकर रख देते थे, अपनी हर खुशी, अपना हर दर्द मुझसे बांटते थे, और मैं बस एक श्रोता (listener) बनकर बैठी रहती थी। वो कभी मुझसे शिकायत नहीं करते थे कि मैं बोलती क्यों नहीं। उन्हें पता था कि मेरी 'हम्म' में भी मेरी रजामंदी और मेरा साथ छिपा है।
​धीरे-धीरे दोस्ती, प्यार की उन नाज़ुक गलियों में मुड़ने लगी थी, जहाँ शब्द कम और भावनाएं ज्यादा होती हैं। हम एक-दूसरे को गहराई से महसूस करने लगे थे, लेकिन तभी मेरी जिंदगी में एक ऐसा मोड़ आया, एक ऐसी घटना हुई जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया। वह दौर मेरे लिए मानसिक रूप से बहुत भारी और गंदा था। मुझे लगा कि कान्हा का साथ ही वह एकमात्र सहारा है जो मुझे इस अंधेरे से बाहर निकाल सकता है। लेकिन एक डर भी था—अगर मैंने उन्हें यह बताया, तो क्या वो मुझे गलत समझेंगे? क्या हमारा रिश्ता वहीं टूट जाएगा?
​एक लंबी कशमकश के बाद, मैंने तय किया कि मुझे यह बात कान्हा को बतानी ही चाहिए। एक सच्चे रिश्ते की नींव झूठ या छुपाव पर नहीं, बल्कि सच्चाई और विश्वास पर टिकी होती है। मैंने बहुत हिम्मत जुटाई, खुद को संभाला और फाइनली मिलने का फैसला किया। वह दिन था—3 दिसंबर 2022।
​उस दिन दिल की धड़कनें काबू में नहीं थीं। मेरे साथ मेरी एक दोस्त भी थी, जो मेरी हिम्मत बनी हुई थी। मिलने की उस जगह पर पहुँचते ही जब मैंने कान्हा को पहली बार सामने देखा, तो उस वक्त की खामोशी में भी एक शोर था। मेरा मन किसी तूफान की तरह था, मैंने  कान्हा को ज़ब देखा तो वो एकदम सिंपल थे और decent लग रहे थे वाइट Tशर्ट  पहनी हुई थी कान्हा ने... हम जैसे ही पास गए कान्हा ने हाथ मिलाने के  लिए हाथ बढ़ाया तो पता नहीं क्यों मने बस हाथ जोड़ दिए पर हाथ नहीं मिलाया मुझे नहीं पता कान्हा क्या सोच रहे होंगे मेरे बारे और सच खुद तो मुझे टेंशन हो रही थी पहली बार ऐसे किसी लडके से मिलने घर पे बिना बताये कॉलेज से गए थे हम.. तो  फिर हम एक ररेस्टोरेंट मैं गए तीनो  ताकि बैठ कर बात कर सके मैं बहुत  ज्यादा nourvos हो रही थी!
हम बैठ गए दोनों और वो लड़की हमारे सामने वाली चेयर पर थी कुछ टाइम बाद उसने अपने पुरुष मित्र को  बुला लिया था वही पर और मुझे इस बारे मैं कुछ पता नहीं था फिर वो दोनो आपस मैं बिजी हो गए और मैं और कान्हा बात  करने लगे मैं बहुत कुछ कहना  चाहती थी पर हिम्मत नहीं हो रही कैसे  कहु क्या कहु शायद कान्हा समझ गए थे.. वो बिलकुल नार्मल थे और कॉन्फिडेंस मैं थे  फिर उन्होंने  मेरा हाथ पकड़ लिया मुझे आज भी याद है वो अहसास ज़ब पहली बार कान्हा ने मेरा हाथ पकड़ा और पता नहीं क्यों वो हाथ वो स्पर्श मुझे अनजान नहीं  लगा एक अपनापन था  उस स्पर्श मैं जिससे मुझमे इतनी हिम्मत आ गयी की मैं अपनी बात उनसे कह पायी...
मैंने बहुत मुश्किल से अपने भीतर के उस डर को बाहर निकाला और उन्हें वह सब सच बता दिया जो मैं अपने सीने में दबाए बैठी थी। मेरी आँखें भर आई थीं, आवाज़ लड़खड़ा रही थी। मुझे लग रहा था कि शायद अब कान्हा का चेहरा बदल जाएगा, शायद वे वहाँ से चले जाएंगे। लेकिन कान्हा... उन्होंने मेरी बात पूरी धैर्य और गंभीरता से सुनी।
​जब मैंने बोलना बंद किया, तो चारों तरफ सन्नाटा छा गया। मुझे डर था कि अब क्या होगा। लेकिन कान्हा ने जो किया, उसने मेरा पूरा नजरिया ही बदल दिया। उन्होंने मुझे जज नहीं किया, न ही मेरी तरफ घृणा से देखा। बल्कि उन्होंने मेरा हाथ कसके पकड़ा  और कहा मैं हु ना उस टाइम कान्हा की आँखो मैं भी आंसू थे और मुझे नहीं पता था मैं क्या रिएक्शन करू पर कान्हा ने खुद को संभाला और मुझे भी  यकीन दिलाया कि मैं अकेली नहीं हूँ। उस दिन मुझे समझ आया कि कान्हा सिर्फ मेरे प्रेमी या दोस्त नहीं हैं, वे मेरे प्रोटेक्टर भी हैं। वो मेरे सब कुछ है ❤️
​3 दिसंबर की उस मुलाकात ने सब कुछ बदल दिया। वह घटना, जिसे मैं अपनी जिंदगी का सबसे 'गंदा' पन्ना समझती थी, कान्हा के साथ ने उसे मेरा सबसे मजबूत सबक बना दिया। उस दिन मैंने कान्हा की आँखों में जो प्यार, जो फिक्र और जो सम्मान देखा, उसने मेरे अंदर के डर को हमेशा के लिए खत्म कर दिया।
​वो मुलाकात सिर्फ दो लोगों का मिलना नहीं था, वह दो आत्माओं का एक-दूसरे पर अटूट भरोसा करने का दिन था। उस दिन मैंने यह महसूस किया कि कान्हा के होने का मतलब क्या है। मैंने उन्हें न सिर्फ अपना राज़ दिया था, बल्कि अपनी जिंदगी की चाबी भी उनके हाथों में सौंप दी थी। 
थैंक्स कान्हा मेरी लाइफ मैं आने के लिए और मेरा सपोर्ट बनने के  लिए 🥹....


आगे का पार्ट कंटिन्यू है अभी.....