हर बड़ा इंसान, अपने अंदर एक छोटा बच्चा हमेशा संभाल कर रखता है। कान्हा की शख्सियत की गहराई को समझने के लिए, मुझे उनके बचपन के उन पन्नों को पलटना ज़रूरी लगता है, जहाँ से इस सादगी और ज़िद का जन्म हुआ।कान्हा का बचपन बहुत ही अलग और अपनी ही धुन में रहने वाला रहा है। जहाँ दूसरे बच्चे खिलौनों के पीछे भागते थे, कान्हा में बचपन से ही एक ऐसी समझ थी जो उनकी उम्र से कहीं बड़ी लगती थी। सुनने में आता है कि वो बचपन में बहुत ही भोले और मासूम थे ,याद आता है वह दिन, जब कान्हा LKG में थे और 26 जनवरी का पावन पर्व था। स्कूल में देशभक्ति का माहौल था और कान्हा ने पहली बार स्टेज पर कदम रखा था। उस नन्हे कलाकार का डांस परफॉरमेंस आज भी किसी की यादों में बसा होगा। उस दिन इनाम के रूप में उन्हें जो पेंसिल, एक रबर और एक शार्पनर मिला, वह शायद बाजार में चंद रुपयों की चीजें रही होंगी, लेकिन कान्हा के लिए वह एक अमूल्य खजाना था। आज के दौर के बच्चे अक्सर नए खिलौने पाकर पुराने को भूल जाते हैं, लेकिन कान्हा ने उन मामूली स्टेशनरी की चीजों को न जाने कितने महीनों तक, कितनी हिफाजत से एक 'सम्मान' के साथ संजो कर रखा। उनकी यह छोटी-सी आदत बताती है कि वे बचपन से ही कितने भावुक और दिल के साफ इंसान थे; उन्हें चीजों की कीमत नहीं, उन चीजों के पीछे छुपे प्यार और मेहनत की कद्र करना आता था।
जैसे-जैसे कान्हा थोड़े बड़े हुए, उनका संसार कंचों (marbles) की उस जादुई दुनिया में सिमट गया। वे कंचे खेलने में इतने माहिर थे कि उनकी उंगलियां कंचों की हर चाल को समझती थीं। देखते ही देखते, उनके पास 7-8 हजार कंचों का एक विशाल साम्राज्य इकट्ठा हो गया। वे हर बाजी में जीतते थे, और फिर उन कंचों को बेचने का उनका तरीका किसी बड़े बिजनेसमैन से कम नहीं था। वे बाजार के उतार-चढ़ाव को अपनी ही भाषा में समझते थे—कभी 1 रुपये के 5 कंचे बेचते, तो कभी मांग और आपूर्ति के हिसाब से 1 रुपये के 3, और अंत में जब उनका वर्चस्व बढ़ा, तो 1 रुपये के 2! यह सिर्फ खेल नहीं था, यह उनकी वह व्यावहारिक बुद्धिमत्ता थी जो उन्हें सिखा रही थी कि जिंदगी में आगे कैसे बढ़ना है। साथ ही, उनका बचपन नदी की उन अठखेलियां करती लहरों में नहाते हुए बीता। वह स्वच्छ पानी, वह खुला आसमान और दोस्तों के साथ वह बेफिक्र मस्ती आज की किसी भी लग्जरी और आलीशान छुट्टियों से कहीं बढ़कर थी।
कान्हा खाने-पीने के भी बड़े शौकीन थे, खासकर 'बताशों' के। बचपन में चोरी-छिपे बताशे खाने का उनका वह मासूम अंदाज़ आज भी जब याद आता है, तो चेहरे पर एक मीठी मुस्कान आ जाती है। एक बार तो उन्होंने अनजाने में बताशे के साथ एक चींटा तक खा लिया था! वे किस्से सुनकर आज भले ही हंसी आती हो, लेकिन उनकी उस मासूमियत पर प्यार भी बहुत आता है। बचपन तो होता ही नादान है, और कान्हा भी कोई अपवाद नहीं थे। एक बार उन्होंने घर से 10 रुपये की चोरी की थी—शायद किसी मनपसंद चीज को पाने की जिद में। मजे की बात तो यह है कि वे दुकान से चीजें तो ले आए, लेकिन बाकी के पैसे वहीं दुकानदार के पास ही भूल आए! उस वक्त मम्मी-पापा की जो पिटाई उन्हें पड़ी, वह कोई साधारण सजा नहीं थी, बल्कि उनके जीवन का सबसे बड़ा 'अनुशासन का पाठ' था। उस मार ने उन्हें सिखाया कि ईमानदारी क्या होती है और मर्यादा का पालन कैसे किया जाता है।
उनकी सीखने की ललक और साहस का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे महज 7 साल की उम्र में साइकिल चलाना सीख गए थे। उनका संतुलन और आत्मविश्वास उस उम्र के हिसाब से बहुत अधिक था। लेकिन आप यकीन नहीं करेंगे, महज 11 साल की छोटी-सी उम्र में कान्हा ने 'बाइक' चलाना सीख लिया था! जो काम करने की उम्र में बच्चे ठीक से साइकिल भी नहीं चला पाते, कान्हा ने तब बाइक की कमान थाम ली थी। वे अपनी मेहनत और ज़िद के इतने पक्के थे कि जब उन्हें अपनी खुद की साइकिल की चाहत हुई, तो उन्होंने किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। उन्होंने एक-एक पैसा जोड़कर अपनी गुल्लक भरी और फिर उसी जमा-पूंजी से अपने लिए अपनी साइकिल खरीदी। वह साइकिल सिर्फ एक सवारी नहीं थी, बल्कि उनकी स्वावलंबन और मेहनत की पहली जीत थी।
मगर उनके पूरे बचपन का सबसे चमकता हुआ सितारा उनकी गणित (Maths) के प्रति दीवानगी थी। वे कक्षा में हमेशा टॉप करते थे। उनकी बुद्धि का स्तर तो यह था कि 10वीं कक्षा में उन्होंने अपने स्कूल के शिक्षकों को ही चुनौती दे दी थी—कि गणित की पूरी किताब से कोई भी सवाल पूछ लो, मैं हल कर दूँगा! जब वे उस चुनौती में जीते और प्रिंसिपल सर ने उन्हें 500 रुपये का इनाम दिया, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था। उस दिन उन्हें महसूस हुआ होगा कि मेहनत का फल कितना मीठा होता है। लेकिन उस नन्हे से बच्चे का दिल देखिए—वे 500 रुपये उन्होंने अपने लिए कुछ खरीदने में खर्च नहीं किए। घर पहुँचकर उन्होंने वे पैसे चुपचाप अपने बीमार पापा को थमा दिए ताकि उनकी दवाइयां आ सकें। एक ऐसा बच्चा, जो अपनी छोटी-छोटी खुशियों के लिए दिन-रात मेहनत करता है, उसी बच्चे ने अपनी सबसे बड़ी खुशी अपने पापा के स्वास्थ्य के लिए त्याग दी।
कान्हा का बचपन सिर्फ खेल-कूद या पढ़ाई का नाम नहीं है, यह तो संघर्ष, शरारत, ईमानदारी और सबसे बढ़कर 'निस्वार्थ प्रेम' का एक संगम है। यही वो कान्हा है, जिसकी गहराई को आज मैं महसूस करती हूँ। जिस बच्चे ने बचपन से ही अपने परिवार और अपनी जिम्मेदारियों को इतना समझा हो, वह कान्हा आज भी वही है—दिल का राजा, जो आज भी अपनों की मुस्कान के लिए सब कुछ न्योछावर करने को तैयार रहता है। उनका बचपन आज मेरी इस किताब का वह सबसे खूबसूरत पन्ना है, जिसे मैं बार-बार पढ़ना चाहती हूँ।