भारत के महाराष्ट्र के चौदहवीं शताब्दी के परम सिद्ध, विद्रोही और वारकरी संप्रदाय के महान संत चोखामेला जी की एक अत्यंत मर्मस्पर्शी और प्रसिद्ध अमृत वाणी (अभंग) यहाँ दी गई है। यह वाणी समाज में किसी व्यक्ति की जाति, रंग या बाहरी रूप को न देखकर उसके भीतर छिपी आत्मा और प्रेम की शुद्धता को पहचानना सिखाती है।
संत चोखामेला जी की यह वाणी किसी भी प्रकार के सामाजिक ऊंच-नीच के पाखंड को तोड़कर भीतर के सच्चे भाव से जीवन जीने का मार्ग दिखाती है।
“ऊस डोंगा परी रस नव्हे डोंगा।
काय भुललासी वरलीया रंगा॥
चोखा डोंगा परी भाव नव्हे डोंगा।”
अभंग का हिंदी अर्थ : गन्ना भले ही देखने में टेढ़ा-मेढ़ा (डोंगा) होता है, लेकिन उसके भीतर भरा हुआ मीठा रस कभी टेढ़ा-मेढ़ा नहीं होता। तुम बाहर के इस रंग-रूप और बनावट को देखकर क्यों भ्रम में पड़े हुए हो? चोखामेला भले ही समाज की नज़र में अछूत, हीन या टेढ़ा-मेढ़ा हो सकता है, लेकिन परमात्मा के प्रति उसका आंतरिक भाव और भक्ति कभी टेढ़ी-मेढ़ी या अशुद्ध नहीं हो सकती।
अक्सर लोग इस वाणी को सुनकर गहरे संशय में पड़ जाते हैं कि क्या संत चोखामेला यहाँ केवल समाज के खिलाफ अपनी कड़वाहट निकाल रहे हैं? क्या वे बाहरी सुंदरता या नियमों का पूरी तरह खंडन कर रहे हैं? लेकिन संत चोखामेला यहाँ समाज के प्रति कोई नफ़रत नहीं फैला रहे हैं, बल्कि वे हमें इंसानी स्वभाव के एक बहुत बड़े विरोधाभास से सचेत कर रहे हैं। इस संसार में जब कोई व्यक्ति किसी को परखता है, तो वह सबसे पहले उसकी जाति, उसका धन, उसका सुंदर चेहरा या उसके कीमती कपड़े देखता है। संत कहते हैं कि बाहर की यह पैकेजिंग देखकर किसी के चरित्र का अंदाजा लगाना सबसे बड़ी भूल है। असली सुंदरता इंसान के शरीर में नहीं, उसके मन की पवित्रता में होती है।
गहरे अर्थ की व्याख्या
सिर्फ बाहरी रूप से खुद को बहुत ऊंचा, सुंदर या संस्कारी दिखाना मन को एक झूठी संतुष्टि तो दे सकता है, लेकिन जब तक हमारे भीतर करुणा और शुद्ध विचार नहीं हैं, तब तक हमारा वह रूप बिल्कुल व्यर्थ है। जो व्यक्ति समाज में ऊंचे कुल में पैदा हुआ है लेकिन उसके कर्म नीच और विचार हिंसक हैं, उसे कभी साक्षात परमात्मा का आशीर्वाद नहीं मिल सकता। इसके विपरीत, जो व्यक्ति समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़ा है लेकिन उसका हृदय सबके लिए प्रेम और दया से भरा है, वही ईश्वर का सबसे प्रिय भक्त है। जब मनुष्य बाहरी दिखावे को छोड़कर भीतर के गुणों की कद्र करना सीखता है, तभी उसके जीवन में सच्ची समता और आत्मिक शांति का उदय होता है।
व्यावहारिक उदाहरण
इसे आप आज के आधुनिक जीवन के बहुत ही सीधे उदाहरण से समझ सकते हैं। जब हम बाज़ार से कोई फल जैसे नारियल खरीदने जाते हैं, तो उसका बाहरी छिलका बहुत खुरदरा, गंदा और बदसूरत दिखाई देता है। लेकिन जब हम उसे तोड़ते हैं, तो उसके भीतर से अत्यंत सफेद, मीठा और पवित्र जल निकलता है जिसका उपयोग भगवान के चरणों में चढ़ाने के लिए किया जाता है। इसके विपरीत, कई बार कुछ फल बाहर से बेहद चमकदार, सुंदर और रसायनों से रंगे हुए दिखते हैं, लेकिन जब उन्हें काटा जाता है तो वे अंदर से सड़े हुए निकलते हैं। समाज के इंसान भी ठीक इसी तरह हैं। बड़ी-बड़ी डिग्रियां और सुंदर चेहरे वाले लोग कई बार अंदर से धोखेबाज होते हैं, और एक साधारण सा दिखने वाला गरीब मजदूर दिल का बेहद सच्चा और ईमानदार होता है।
इसके विपरीत, खुद संत चोखामेला जी के जीवन का एक बहुत ही अद्भुत और भावुक कर देने वाला प्रसंग आता है। चोखामेला जी जाति से महार (अछूत) थे, इसलिए उन्हें पंढरपुर के विट्ठल (भगवान कृष्ण) के मंदिर के भीतर जाने की अनुमति नहीं थी। वे हमेशा मंदिर के मुख्य द्वार की सीढ़ियों पर बैठकर रोते रहते थे और दूर से ही प्रभु के दर्शन करते थे। एक रात स्वयं भगवान विट्ठल मंदिर के गर्भगृह से बाहर आए, चोखामेला का हाथ पकड़ा और उन्हें अपने साथ मंदिर के भीतर ले गए। जब सुबह मंदिर के पुजारियों ने यह देखा, तो उन्होंने चोखामेला को बहुत भला-बुरा कहा और उन्हें चंद्रभागा नदी के उस पार भगा दिया। लेकिन चोखामेला के मन में कोई क्रोध नहीं था। वे नदी किनारे अपनी झोपड़ी में बैठ गए। कुछ दिनों बाद जब पुजारियों ने देखा कि मंदिर की मूर्ति से भोग गायब है और वह भोग नदी पार चोखामेला की झोपड़ी में मिल रहा है, तब उन पुजारियों की आंखें खुलीं कि भगवान तो केवल भाव के भूखे हैं, उन्हें किसी जाति या मंदिर की दीवारों से कोई सरोकार नहीं है।
विरोधाभास का समाधान
यहाँ मन में यह शंका आ सकती है कि क्या फिर हमें अपने बाहरी रहन-सहन, अनुशासन या सुंदरता पर बिल्कुल ध्यान नहीं देना चाहिए? संत चोखामेला स्वच्छता या मर्यादा का विरोध नहीं करते। वे सिर्फ यह समझा रहे हैं कि अपनी बाहरी चमक-दमक को ही सब कुछ मानकर घमंड मत पालो। सुंदर दिखना या अच्छे कुल में होना कोई पाप नहीं है, बशर्ते आपके भीतर का इंसान भी उतना ही साफ हो। असली समझदार व्यक्ति वह है, जो किसी भी इंसान से मिलते समय उसकी बाहरी स्थिति को नजरअंदाज करके उसकी आत्मा और उसके सद्गुणों का सम्मान करना जानता है।
जीवन के लिए मुख्य सीख
★ किसी भी व्यक्ति की योग्यता उसके जन्म, जाति या कपड़ों से नहीं आंकी जा सकती। चाहे कोई समाज में कितना भी साधन-संपन्न क्यों न हो, जब तक उसके विचार पवित्र नहीं हैं, उसका जीवन अधूरा है।
★ जब हमारे भीतर यह गहरी समझ आ जाती है कि परमात्मा ने हर जीव को एक समान बनाया है और अंतर केवल बाहरी आवरण का है, तो हमारे मन का यह घमंड पूरी तरह टूट जाता है कि “मैं दूसरों से श्रेष्ठ हूँ।” हर इंसान के श्रम और उसके अस्तित्व का आदर करना ही जीवन का सबसे बड़ा सच है।
आज की पावन प्रार्थना
“हे परमात्मा, मुझे ऐसी सच्चाई और शक्ति दें कि मेरे शब्दों और कर्मों में हमेशा एकरूपता बनी रहे। मेरे भीतर का पाखंड और किसी को छोटा समझने का अहंकार दूर हो ताकि मैं बाहरी रंग-रूप के भ्रम से ऊपर उठकर हर जीव में केवल आपकी ही पवित्र छवि देख सकूं। 🙏”