एक जोड़ी चप्पल🩴
लेखिका
प्राची गुर्जर
लेखिका की ओर से
कुछ कहानियाँ लिखी नहीं जातीं, वे चुपचाप हमारे भीतर जन्म लेती हैं।
इस कहानी का बीज भी मुझे किसी पुस्तक, समाचार या शोध से नहीं मिला। यह मुझे एक बहुत छोटी-सी घटना ने दिया।
एक दिन मैंने दो छोटी बच्चियों को देखा। उनके पास पहनने के लिए सिर्फ़ एक ही जोड़ी जूते थे। दोनों को अलग-अलग रिश्तेदारों के घर जाना था। पहले एक बच्ची वही जूते पहनकर गई। उसके लौटने का इंतज़ार दूसरी ने किया। फिर उसने वही जूते पहने और अपनी राह चल पड़ी।
वह दृश्य कुछ ही मिनटों का था, लेकिन मेरे मन में बहुत देर तक ठहरा रहा।
मैं सोचती रही कि जिन बच्चों के लिए जूते सिर्फ़ एक ज़रूरत हैं, उनके लिए हम जैसी छोटी-सी चीज़ भी कितनी बड़ी ख़ुशी हो सकती है। उसी पल मेरे मन में यह प्रश्न आया कि अगर दो बच्चे एक जोड़ी जूतों को इतने सहज प्रेम से बाँट सकते हैं, तो क्या दो दोस्त पूरी ज़िंदगी एक-दूसरे का दुख और सुख भी नहीं बाँट सकते?
यहीं से इस कहानी की शुरुआत हुई।
इसके बाद जो कुछ आपने पढ़ा है, वह मेरी कल्पना है। जमुना, फूलमती, बड़गाँव और इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक हैं। लेकिन उनकी भावनाएँ, उनका आत्मसम्मान, उनका संघर्ष और उनकी दोस्ती हमारे समाज के उन अनगिनत लोगों से प्रेरित है, जिन्हें शायद इतिहास कभी याद न रखे, लेकिन जिनकी इंसानियत दुनिया को आज भी बेहतर बनाए हुए है।
मैं नहीं चाहती कि इस कहानी को पढ़कर आपको सिर्फ़ दो सहेलियाँ याद रहें। मैं चाहती हूँ कि अगली बार जब आप किसी नंगे पैर चलते इंसान को देखें, तो उसकी मजबूरी पर नज़र डालने से पहले उसके आत्मसम्मान को देख सकें।
अगर यह कहानी पढ़ने के बाद आपके भीतर किसी एक इंसान के लिए भी थोड़ी-सी संवेदना, थोड़ी-सी करुणा और थोड़ा-सा सम्मान जन्म ले, तो एक लेखिका के रूप में मुझे लगेगा कि मेरी कलम ने अपना काम पूरा कर दिया।
स्नेह सहित,प्राची गुर्जर…..
बरसात अभी-अभी थमी थी।
मिट्टी की सोंधी महक पूरे गाँव में फैली हुई थी। कहीं बच्चे नालियों में कागज़ की नाव बहा रहे थे, कहीं औरतें आँगन में भीगे कपड़े फैला रही थीं। गाँव का नाम था बड़गाँव। छोटा-सा गाँव, जहाँ हर घर की छत दूसरे घर का हाल जानती थी।
गाँव के आख़िरी छोर पर दो मिट्टी के घर थे।
एक घर में रहती थी जमुना।
दूसरे में उसकी बचपन की सहेली फूलमती।
लोग कहते थे कि दोनों की दोस्ती भगवान ने बनाई है।
कोई उन्हें सगी बहन समझता, कोई जुड़वाँ।
असल में दोनों का रिश्ता खून का नहीं था, मगर भरोसे का था।
सुबह सूरज उगने से पहले ही दोनों घर से निकल जातीं।
सिर पर टोकरी।
हाथ में दरांती।
और पैरों में…
सिर्फ़ एक जोड़ी चप्पल।
वह भी नई नहीं।
रबर घिस चुकी थी।
पट्टी कई जगह तार से बाँधी गई थी।
उस चप्पल का भी अपना नियम था।
आज जमुना पहनेगी।
कल फूलमती।
अगर दोनों को एक साथ कहीं जाना हुआ…
तो पहले एक जाएगी।
फिर दूसरी।
कभी किसी ने शिकायत नहीं की।
गाँव के लोग अक्सर उन्हें देखकर हँसते।
चौपाल पर बैठे लाला रामदयाल बीड़ी का कश लगाकर बोले,
“अरे ओ जमुना…
आज चप्पल तेरे हिस्से आई है क्या?”
सारे आदमी ठहाका लगाने लगे।
फूलमती मुस्कुराकर बोली,
“हाँ लाला जी…
आज मेरी छुट्टी है चप्पल से।”
सब फिर हँस पड़े।
लेकिन हँसी और मज़ाक में फ़र्क होता है।
यह मज़ाक था।
और उसका दर्द सिर्फ़ वही दोनों समझती थीं।
…
दोपहर की धूप सिर पर चढ़ी हुई थी।
दोनों खेत में धान की रोपाई कर रही थीं।
कीचड़ घुटनों तक था।
जमुना अचानक बोली,
“फूलो…”
“हूँ?”
“अगर हमारे पास दो जोड़ी चप्पल होती ना…”
फूलमती मुस्कुराई।
“तो?”
“तो हम साथ बाज़ार जाते।”
फूलमती ने हाथ का कीचड़ उसके गाल पर लगा दिया।
“और क्या करती?”
“गोलगप्पे खाते।”
“फिर?”
“झूला झूलते।”
“फिर?”
“बस…”
दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ीं।
पास काम कर रही बूढ़ी सरस्वती काकी उन्हें देखकर बोलीं,
“अरे पगली लड़कियों…
तुम दोनों की हँसी सुनकर लगता ही नहीं कि तुम गरीब हो।”
जमुना ने जवाब दिया,
“काकी…
गरीब आदमी अगर हँसना छोड़ दे…
तो जीएगा कैसे?”
सरस्वती काकी की आँखें भर आईं।
…
शाम को दोनों गाँव के हैंडपंप पर पानी भर रही थीं।
तभी गाँव का लड़का भूरा अपने दो दोस्तों के साथ आया।
वह अक्सर दोनों का मज़ाक उड़ाता था।
“अरे देखो…
एक चप्पल वाली बहनें आ गईं।”
सारे लड़के हँसने लगे।
भूरा बोला,
“अरे तुम दोनों शादी कैसे करोगी?
दूल्हा भी आधा-आधा बाँटोगी क्या?”
चारों तरफ़ हँसी गूँज गई।
जमुना ने सिर झुका लिया।
लेकिन फूलमती का चेहरा लाल हो गया।
उसने पानी की बाल्टी नीचे रख दी।
धीरे-धीरे भूरा के सामने जाकर खड़ी हो गई।
“भूरा…”
“क्या है?”
“आज चप्पल का मज़ाक उड़ा रहा है ना?”
“हाँ…”
“कल तेरे बाप का बैल बेच जाएगा…
तब मत कहना गाँव वालों से कि हमारी गरीबी पर मत हँसो।”
भूरा तिलमिला गया।
“ज़ुबान देख इसकी।”
उसने फूलमती का हाथ पकड़ लिया।
अगले ही पल…
जमुना ने उसका हाथ झटक दिया।
“हाथ नीचे।”
भूरा हँसा।
“नहीं तो?”
जमुना ने बिना सोचे उसे ज़ोर का धक्का दे दिया।
वह सीधे कीचड़ में गिर पड़ा।
आस-पास खड़े लोग हँसने लगे।
भूरा उठकर गुस्से से बोला,
“दो कौड़ी की मज़दूर…”
फूलमती बीच में आ गई।
“हम दो कौड़ी के होंगे…
पर बिके नहीं हैं।”
भूरा कुछ पल उन्हें देखता रहा।
फिर गाली देकर चला गया।
दोनों कुछ देर चुप रहीं।
फिर फूलमती बोली,
“तू पागल है क्या?
अगर वह मार देता तो?”
जमुना ने हँसकर कहा,
“पहले तुझे मारता…
फिर मुझे।
अकेली थोड़ी पिटती।”
दोनों फिर हँसने लगीं।
हँसी कभी-कभी आँसुओं को भी शर्मिंदा कर देती है।
…
रात को जमुना के घर चूल्हा जल रहा था।
बस दो रोटियाँ बनी थीं।
इतने में फूलमती आ गई।
“खा लिया?”
जमुना बोली,
“हाँ।”
फूलमती समझ गई।
झूठ बोल रही है।
उसने अपनी पोटली खोली।
उसमें भी सिर्फ़ दो रोटियाँ थीं।
एक जमुना के सामने रख दी।
“ले।”
“नहीं।”
“खा ले।”
“तू क्या खाएगी?”
फूलमती हँस दी।
“हमारी दोस्ती में हिसाब कब से होने लगा?”
दोनों ने एक-एक रोटी आधी-आधी तोड़ ली।
उसी समय सरस्वती काकी बाहर से गुज़रीं।
उन्होंने यह दृश्य देखा।
धीरे से बुदबुदाईं,
“भगवान…
अगर दोस्ती बनानी हो…
तो ऐसी बनाना।
जहाँ आधी रोटी भी पूरी लगने लगे।”
…
उस रात गाँव में बिजली नहीं थी।
आसमान तारों से भरा था।
दोनों अपने-अपने घर की चौखट पर बैठी थीं।
बीच में सिर्फ़ एक कच्ची गली थी।
फूलमती ने आवाज़ लगाई,
“जमुना…”
“हाँ?”
“अगर एक दिन हम अमीर हो गए ना…”
“तो सबसे पहले क्या खरीदेगी?”
जमुना ने बिना सोचे जवाब दिया,
“दो जोड़ी चप्पल।”
फूलमती हँस पड़ी।
“बस?”
“नहीं…
एक तेरे लिए।
एक मेरे लिए।
और उस दिन…
हम पहली बार साथ बाज़ार जाएँगे।”
दोनों देर तक आसमान देखती रहीं।
उन्हें नहीं पता था…
ज़िंदगी उनके लिए क्या लिख चुकी है।
लेकिन गाँव के उसी अँधेरे में…
दो लड़कियाँ अपने हिस्से की रोशनी बचाए बैठी थीं।
रात बीत चुकी थी।
मुर्गे की पहली बाँग के साथ ही पूरा बड़गाँव जाग उठा।
कहीं चूल्हों में आग जल रही थी, कहीं बैलों की घंटियाँ बज रही थीं। खेतों की ओर जाते किसानों के पैरों से उठती मिट्टी की खुशबू हवा में घुल रही थी।
जमुना आज फिर सबसे पहले उठ गई।
उसने आँगन में झाड़ू लगाई, चूल्हा जलाया और माँ के लिए रोटी सेंकने लगी।
इतने में दरवाज़े पर आवाज़ आई।
“ओ जमुना… जाग गई क्या?”
वह बिना देखे ही मुस्कुरा दी।
“आ जा फूलो…”
फूलमती हाथ में पीतल का छोटा-सा डिब्बा लिए खड़ी थी।
“ये क्या है?”
“गुड़।”
“कहाँ से लाई?”
“कल मालिक की घरवाली ने दिया था। सोचा अकेले खाऊँगी तो मीठा नहीं लगेगा।”
जमुना ने आधा गुड़ तोड़कर उसके हाथ में रख दिया।
“आधा तू खा।”
फूलमती हँस पड़ी।
“हम दोनों से ज़्यादा बराबरी तो तराज़ू भी नहीं करता।”
दोनों हँसने लगीं।
उस दिन गाँव में बड़ी हलचल थी।
सावन का मेला लगने वाला था।
बच्चे नए कपड़ों की बात कर रहे थे।
औरतें चूड़ियाँ और बिंदी खरीदने की।
मर्द बैलों के लिए नई रस्सियाँ लेने की।
गाँव के चौक में रंग-बिरंगी दुकानें सजने लगी थीं।
फूलमती की आँखें चमक उठीं।
“जमुना…”
“हाँ?”
“इस बार साथ चलेंगे?”
जमुना कुछ पल चुप रही।
फिर नीचे चप्पल की ओर देखने लगी।
दोनों समझ गईं।
साथ जाना फिर संभव नहीं था।
एक चप्पल…
दो सहेलियाँ।
फूलमती ने मुस्कुराने की कोशिश की।
“कोई बात नहीं।”
“पहले तू चली जाना।”
जमुना ने सिर हिला दिया।
“नहीं।”
“पहले तू जा।”
“क्यों?”
“क्योंकि पिछले साल मैं पहले गई थी।”
दोनों फिर बहस करने लगीं।
इतने में सरस्वती काकी उधर से निकलीं।
उन्होंने दोनों को देखा और बोलीं,
“अरे तुम दोनों आज भी उसी चप्पल पर लड़ रही हो?”
फूलमती ने हँसते हुए कहा,
“काकी…
हम चप्पल पर नहीं लड़ते…
एक-दूसरे को पहले भेजने पर लड़ते हैं।”
सरस्वती काकी ने गहरी साँस ली।
“भगवान करे…
तुम्हारी दोस्ती किसी की नज़र न लगे।”
दोपहर तक खेत का काम खत्म हुआ।
दोनों ने मजदूरी ली।
मालिक ने एक-एक सौ बीस रुपये उनके हाथ में रखे।
जमुना ने पैसे आँचल में बाँध लिए।
फूलमती ने गिनकर जेब में रखे।
उसी समय मालिक का बेटा सुरेश वहाँ आया।
उसने दोनों को ऊपर से नीचे तक देखा।
फिर हँसते हुए बोला,
“अरे…
आज भी वही पुरानी चप्पल?”
फूलमती चुप रही।
सुरेश ने जेब से दो हज़ार रुपये निकाले।
“लो…
नई खरीद लो।”
जमुना ने पैसे की ओर देखा भी नहीं।
“हमें नहीं चाहिए।”
सुरेश हँस पड़ा।
“अरे मुफ्त में दे रहा हूँ।”
जमुना ने पहली बार उसकी आँखों में देखकर कहा,
“मुफ्त की चीज़ें अक्सर बहुत महँगी पड़ती हैं मालिक।”
सुरेश का चेहरा उतर गया।
वह बड़बड़ाता हुआ चला गया।
फूलमती ने धीरे से पूछा,
“अगर ले लेते तो?”
जमुना मुस्कुराई।
“जिस दिन मेहनत छोड़ देंगे…
उस दिन खुद को आईने में कैसे देखेंगे?”
शाम को मेला शुरू हो चुका था।
ढोल बज रहे थे।
झूले घूम रहे थे।
जलेबी की खुशबू दूर तक आ रही थी।
पहले फूलमती गई।
उसने चप्पल पहनी।
जमुना ने उसके पल्लू की गाँठ बाँधते हुए कहा,
“जल्दी लौट आना।”
“आ जाऊँगी।”
“कुछ खाना मत भूलना।”
“पैसे कहाँ हैं?”
दोनों हँस पड़ीं।
फूलमती मेले की ओर चल पड़ी।
मेले में हर तरफ़ भीड़ थी।
वह कभी खिलौनों को देखती।
कभी चूड़ियों को।
कभी रंग-बिरंगे दुपट्टों को।
लेकिन खरीदने की हिम्मत नहीं हुई।
वह बस देखती रही।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
“अरे…
एक चप्पल वाली!”
वह पलटी।
भूरा और उसके दोस्त फिर सामने खड़े थे।
भूरा ज़ोर से बोला,
“सुनो…
अगर दूसरी चप्पल चाहिए तो मेरी पुरानी ले जाना।”
चारों तरफ़ लोग हँसने लगे।
फूलमती की आँखें झुक गईं।
वह चुपचाप आगे बढ़ने लगी।
तभी भीड़ चीरती हुई जमुना वहाँ पहुँची।
वह नंगे पैर दौड़ती हुई आई थी।
साँस तेज़ चल रही थी।
“भूरा!”
भूरा मुस्कुराया।
“लो…
दूसरी भी आ गई।”
जमुना ने बिना कुछ कहे उसके हाथ से चप्पल उठाई…
और पास बहते नाले में फेंक दी।
पूरा मेला सन्न रह गया।
भूरा चिल्लाया,
“पागल हो गई है क्या?”
जमुना ने पहली बार ऊँची आवाज़ में कहा,
“चप्पल पुरानी होने से इंसान छोटा नहीं हो जाता।
लेकिन किसी की गरीबी पर हँसने वाला…
ज़रूर छोटा हो जाता है।”
भीड़ में खामोशी फैल गई।
एक बूढ़े आदमी ने ताली बजाई।
फिर दूसरी।
फिर तीसरी।
धीरे-धीरे पूरा चौक तालियों से गूँज उठा।
भूरा शर्म से सिर झुकाकर वहाँ से चला गया।
फूलमती ने जमुना का हाथ पकड़ लिया।
“तू यहाँ क्यों आई?”
जमुना मुस्कुराई।
“दिल घबरा रहा था।”
“क्यों?”
“पता नहीं…
लग रहा था तुझे मेरी ज़रूरत पड़ेगी।”
फूलमती की आँखों से आँसू बह निकले।
“और तू?”
जमुना हँसी।
“मैं तेरे बिना मेला कैसे देखती?”
दोनों मेले से बिना कुछ खरीदे लौट आईं।
लेकिन उस रात…
दोनों के पास पूरे मेले की सबसे कीमती चीज़ थी।
एक-दूसरे का साथ।
रात को गाँव में तेज़ बारिश शुरू हो गई।
कच्चे घरों की छतों से पानी टपकने लगा।
जमुना अपने घर की छत के नीचे बाल्टी रख रही थी कि बाहर से फूलमती की घबराई हुई आवाज़ आई।
“जमुना…
दरवाज़ा खोल!”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
जमुना ने दरवाज़ा खोला।
फूलमती पूरी भीगी हुई थी।
उसके हाथ में वही पुरानी चप्पल थी।
लेकिन इस बार…
उसकी एक पट्टी पूरी तरह टूट चुकी थी।
दोनों कुछ देर उसे चुपचाप देखती रहीं।
ऐसा लग रहा था जैसे सिर्फ़ चप्पल नहीं टूटी थी…
उनके साथ-साथ चलने की आख़िरी उम्मीद भी टूट गई हो।
“कुछ चीज़ें बाज़ार से नहीं खरीदी जातीं। और कुछ रिश्ते एक टूटी हुई चप्पल से भी ज़्यादा मज़बूत होते हैं।”
रात भर बारिश होती रही।
मिट्टी का आँगन दलदल बन चुका था। छत से गिरती पानी की बूंदें अब भी मिट्टी के घड़ों पर टप… टप… टप… की आवाज़ कर रही थीं।
जमुना और फूलमती चूल्हे के पास बैठी थीं।
उनके बीच वही पुरानी चप्पल रखी थी।
उसकी टूटी हुई पट्टी मानो दोनों की ओर देखकर कुछ कह रही थी।
कुछ देर तक दोनों चुप रहीं।
फिर फूलमती ने चप्पल को सहलाते हुए कहा,
“याद है… यह चप्पल पहली बार कब खरीदी थी?”
जमुना मुस्कुराई।
“कैसे भूल सकती हूँ?”
“पूरा एक साल पैसे जोड़े थे।”
“और खरीदते समय भी दुकानदार से पाँच रुपये कम करवाए थे।”
दोनों हल्का-सा हँस पड़ीं।
हँसी जल्दी ही फिर खामोशी में बदल गई।
“अब?” फूलमती ने पूछा।
“अब क्या करेंगे?”
जमुना ने टूटी पट्टी को हाथ में लिया।
“जो हमेशा करते आए हैं।”
“मतलब?”
“पहले इसे ठीक करवाएँगे।”
“और अगर ठीक नहीं हुई?”
जमुना ने उसकी आँखों में देखा।
“तो नंगे पैर चल लेंगे।”
अगली सुबह दोनों गाँव के मोची रघु काका के पास पहुँचीं।
रघु काका गाँव के सबसे बूढ़े आदमी थे।
मोटी ऐनक।
सफेद दाढ़ी।
और हाथों में ऐसा हुनर कि फटी हुई चीज़ भी नई लगने लगे।
उन्होंने चप्पल हाथ में ली।
बहुत देर तक देखते रहे।
फिर धीरे से बोले,
“बेटियों…”
दोनों एक साथ बोलीं,
“जी काका?”
“इसने जितना चलना था, चल चुकी।”
फूलमती का चेहरा उतर गया।
“मतलब…?”
“अब इसमें नई पट्टी भी लगा दूँ, तो रबर साथ नहीं देगा।”
जमुना ने धीरे से पूछा,
“कितने की नई आएगी?”
“डेढ़ सौ।”
दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा।
दोनों की जेब में मिलाकर सिर्फ़ अठहत्तर रुपये थे।
रघु काका सब समझ गए।
उन्होंने चप्पल वापस देते हुए कहा,
“पैसे हो जाएँ तब ले जाना।”
फूलमती ने मुस्कुराने की कोशिश की।
“ठीक है काका।”
दोनों मुड़कर चल दीं।
रघु काका देर तक उन्हें जाते देखते रहे।
फिर अपनी दुकान के अंदर गए।
पुरानी लकड़ी की संदूकची खोली।
उसमें रखे कुछ सिक्कों को देखा।
धीरे से बोले,
“हे भगवान…
किसी की गरीबी इतनी भी लंबी मत करना कि चप्पल भी उससे पहले हार जाए।”
दोपहर तक दोनों खेत में पहुँच गईं।
आज गाँव के बाहर वाले खेत में धान लगना था।
मालिक ने सख्त आवाज़ में कहा,
“आज देर हुई तो आधी मजदूरी कटेगी।”
सब औरतें जल्दी-जल्दी काम में लग गईं।
कीचड़ इतना था कि पैर निकालना भी मुश्किल हो रहा था।
फूलमती नंगे पैर थी।
अचानक…
“आह…”
उसके मुँह से चीख निकली।
एक लंबा काँटा उसके तलवे में धँस गया था।
खून की पतली धार निकल आई।
जमुना भागती हुई पहुँची।
“फूलो…”
वह घुटनों के बल बैठ गई।
अपने आँचल से उसका पैर साफ़ किया।
काँटा निकाला।
फूलमती दर्द से दाँत भींचे बैठी रही।
मालिक दूर से चिल्लाया,
“क्या नाटक लगा रखा है?”
“काम करो।”
जमुना ने पहली बार मालिक की तरफ़ देखकर कहा,
“पहले इंसान है… फिर मज़दूर।”
मालिक बड़बड़ाता हुआ चला गया।
शाम को दोनों घर लौट रही थीं।
रास्ते में गाँव के बच्चे खेल रहे थे।
एक लड़के ने ज़ोर से कहा,
“देखो… एक चप्पल वाली आ गईं।”
बाकी बच्चे भी हँसने लगे।
एक छोटी लड़की भी उन्हीं की नकल करने लगी।
जमुना रुक गई।
वह उस बच्ची के पास गई।
घुटनों के बल बैठी।
मुस्कुराकर बोली,
“बिटिया… नाम क्या है?”
“गुड़िया।”
“अगर कल तेरे पास चप्पल न हो…”
“और कोई तुझ पर हँसे…”
“अच्छा लगेगा?”
बच्ची का सिर झुक गया।
उसने धीरे से “नहीं” कहा।
जमुना ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
“फिर कभी किसी की मजबूरी पर मत हँसना।”
भूरा थोड़ी दूर खड़ा यह सब देख रहा था।
उसने पहली बार नज़रें झुका लीं।
उस रात…
गाँव में जन्माष्टमी का कार्यक्रम था।
मंदिर के बाहर भजन चल रहे थे।
पूरा गाँव जमा था।
जमुना और फूलमती सबसे पीछे बैठी थीं।
उनके पैरों पर सबकी नज़र जाती।
फिर धीरे-धीरे लोग दूसरी तरफ़ देखने लगते।
तभी मंदिर के पुजारी ने घोषणा की,
“जो भी भगवान को चप्पल दान करना चाहता है, आगे आए।”
एक अमीर आदमी पाँच जोड़ी चप्पल लेकर आया।
लोग उसकी तारीफ़ करने लगे।
“वाह सेठ जी…”
“बड़ा पुण्य मिलेगा।”
फूलमती ने धीरे से जमुना से कहा,
“देख…”
“भगवान के पास पाँच जोड़ी पहुँच गईं।”
“हमारे पास एक भी नहीं।”
जमुना मुस्कुराई।
“भगवान मंदिर में नहीं बैठते फूलो…”
“वो तो शायद वहीं होंगे…”
“जहाँ किसी के पैर जल रहे होंगे।”
फूलमती ने पहली बार उसकी बात का जवाब नहीं दिया।
बस उसकी ओर देखती रह गई।
रात गहरी हो चुकी थी।
दोनों घर लौट रही थीं।
रास्ते में अचानक उन्हें किसी के रोने की आवाज़ सुनाई दी।
झाड़ियों के पीछे एक सात-आठ साल का बच्चा बैठा था।
उसके पैर में काँच घुसा हुआ था।
वह दर्द से रो रहा था।
जमुना तुरंत उसके पास बैठ गई।
“नाम क्या है?”
“छोटू…”
“घर कहाँ है?”
“माँ नहीं मिल रही…”
फूलमती ने बिना एक पल सोचे…
अपने हाथ में पकड़ी वही टूटी चप्पल बच्चे के सामने रख दी।
जमुना हैरान होकर बोली,
“ये क्या कर रही है?”
फूलमती बोली,
“इसके पैर ज़्यादा ज़रूरी हैं।”
“हम तो इतने साल नंगे पैर चले हैं।”
“ये अभी छोटा है।”
जमुना ने उसकी तरफ़ देखा।
उसकी आँखें भर आईं।
दोनों ने बच्चे को उसके घर पहुँचाया।
लौटते समय…
अब उनके पास चप्पल भी नहीं थी।
दोनों नंगे पैर चल रही थीं।
कंकड़ चुभ रहे थे।
मिट्टी ठंडी थी।
लेकिन दोनों के चेहरे पर एक अजीब-सी शांति थी।
चलते-चलते फूलमती हँसी।
“जमुना…”
“हूँ?”
“अब तो सच में बराबरी हो गई।”
“कैसी बराबरी?”
“अब तेरे पास भी चप्पल नहीं…”
“और मेरे पास भी नहीं।”
जमुना हँसते-हँसते रो पड़ी।
उसने फूलमती का हाथ कसकर पकड़ लिया।
दोनों चाँदनी रात में धीरे-धीरे गाँव की ओर बढ़ती रहीं।
उन्हें नहीं पता था…
कि दूर खड़ा एक आदमी यह सब देख रहा था।
वह था ठाकुर हरिराम…
गाँव का सबसे अमीर आदमी।
और शायद…
आज पहली बार उसके मन में गरीबी के लिए दया नहीं…
सम्मान पैदा हुआ था।
“कुछ लोग चप्पल पहनकर भी इंसान नहीं बन पाते, और कुछ लोग नंगे पैर चलकर भी पूरी इंसानियत अपने साथ लेकर चलते हैं।”
सर्दियों की पहली सुबह थी।
धूप अभी तक धरती पर नहीं उतरी थी। खेतों के ऊपर हल्का-सा कोहरा पसरा हुआ था। दूर मंदिर की घंटियाँ बज रही थीं और गाँव की औरतें सिर पर घड़े रखे कुएँ की ओर जा रही थीं।
जमुना और फूलमती भी आज जल्दी निकल गई थीं।
कल रात दोनों ने तय किया था कि अगर थोड़ा और काम मिल जाए, तो शायद महीने के अंत तक नई चप्पल खरीद लें।
रास्ते में फूलमती ने मुस्कुराकर कहा,
“जमुना…”
“हूँ?”
“अगर सच में नई चप्पल आ गई ना…”
“तो पहली बार हम दोनों साथ-साथ चलेंगे।”
जमुना हँसी।
“और पूरे गाँव में ऐसे चलेंगे जैसे रानी-महारानी हों।”
दोनों हँस पड़ीं।
गरीब लोगों के सपने अक्सर बहुत छोटे होते हैं।
इसलिए पूरे भी हो जाएँ, तो दुनिया उन्हें समझ नहीं पाती।
उस दिन खेत में काम कम था।
मालिक ने आधे मजदूर लौटा दिए।
जमुना और फूलमती भी खाली हाथ वापस आने लगीं।
रास्ते में चौपाल पर कुछ औरतें बैठी थीं।
उनमें जमुना की चाची बिमला भी थी।
जैसे ही दोनों वहाँ से गुज़रीं, बिमला ने ऊँची आवाज़ में कहा,
“अरी जमुना… अब तेरी उम्र काम करने की नहीं, शादी करने की है।”
दूसरी औरत बोली,
“कौन करेगा इससे शादी? दहेज में एक जोड़ी चप्पल भी नहीं दे पाएँगे।”
सब ज़ोर से हँस पड़ीं।
जमुना चुपचाप आगे बढ़ गई।
लेकिन फूलमती रुक गई।
उसने पलटकर कहा,
“चाची…”
“दहेज में चप्पल देने से अच्छा है, बेटी को इज़्ज़त दे दीजिए।”
बिमला का चेहरा तमतमा गया।
“बहुत ज़ुबान चलने लगी है तेरी।”
“गरीब होकर भी अकड़ है।”
फूलमती कुछ कहती, उससे पहले जमुना ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“चल।”
दोनों आगे बढ़ गईं।
कुछ दूर आने के बाद फूलमती बोली,
“तू हर बार मुझे रोक क्यों लेती है?”
जमुना ने धीरे से कहा,
“क्योंकि कुछ लोग जवाब सुनने के लिए नहीं बोलते…”
“…सिर्फ़ हमें छोटा महसूस कराने के लिए बोलते हैं।”
दोपहर को दोनों नदी किनारे बैठकर सूखी रोटियाँ खा रही थीं।
तभी वहाँ एक बूढ़ी औरत आई।
उसकी उम्र अस्सी के आसपास होगी।
हाथ काँप रहे थे।
सिर पर लकड़ियों का गट्ठर था।
चलते-चलते उसका संतुलन बिगड़ गया।
पूरा गट्ठर ज़मीन पर गिर पड़ा।
आस-पास से कई लोग गुज़रे।
किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया।
जमुना तुरंत उठी।
“अम्मा… रहने दो।”
उसने लकड़ियाँ समेटनी शुरू कर दीं।
फूलमती ने गट्ठर सिर पर रख लिया।
अम्मा की आँखें भर आईं।
“बेटियों…”
“भगवान तुम्हें सुख दे।”
फूलमती हँसकर बोली,
“अम्मा… हमारे हिस्से का सुख तो शायद रास्ता भूल गया है।”
अम्मा मुस्कुराईं।
“नहीं बेटी…”
“सुख कभी रास्ता नहीं भूलता।”
“बस थोड़ा देर से आता है।”
शाम को दोनों गाँव लौट रही थीं।
अचानक उन्होंने देखा कि चौपाल के पास भीड़ लगी हुई है।
गाँव का बनिया माधव साहू एक छोटे लड़के को डाँट रहा था।
“चोर कहीं का।”
लड़का रोते हुए कह रहा था,
“मैंने कुछ नहीं लिया।”
“झूठ मत बोल।”
माधव ने उसके कान पकड़ लिए।
भीड़ तमाशा देख रही थी।
जमुना आगे बढ़ी।
“क्या हुआ?”
माधव बोला,
“इसने मेरी दुकान से गुड़ चुराया है।”
जमुना ने लड़के से पूछा,
“सच बता।”
लड़का रोते-रोते बोला,
“मेरी छोटी बहन तीन दिन से बीमार है।”
“वो गुड़ माँग रही थी।”
“मेरे पास पैसे नहीं थे।”
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
माधव फिर भी बोला,
“चोरी तो चोरी होती है।”
फूलमती ने अपनी मजदूरी के पैसे निकाले।
सारे पैसे उसकी हथेली पर रख दिए।
“ये लो।”
“गुड़ के पैसे काट लो।”
माधव ने पैसे गिने।
फिर धीरे से बोला,
“इतनी भी ज़रूरत नहीं थी।”
जमुना ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
“जिस दिन भूख का हिसाब पैसे से होने लगेगा…”
“…उस दिन इंसानियत बहुत महँगी हो जाएगी।”
माधव कुछ नहीं बोला।
उसने पैसे वापस कर दिए।
गुड़ का पूरा टुकड़ा उस लड़के के हाथ में रख दिया।
लड़का रोते-रोते दोनों के पैर छूने लगा।
जमुना पीछे हट गई।
“नहीं।”
“अगर बड़ा होकर किसी भूखे की मदद करेगा…”
“तो वही हमारे लिए सबसे बड़ा धन्यवाद होगा।”
रात को दोनों अपने घरों के बाहर बैठी थीं।
आसमान बिल्कुल साफ़ था।
तारों की भीड़ लगी हुई थी।
फूलमती धीरे से बोली,
“जमुना…”
“हूँ?”
“आज हमारे पास कितने पैसे हैं?”
दोनों ने अपने-अपने आँचल खोले।
जमुना के पास साठ रुपये थे।
फूलमती के पास नब्बे।
कुल मिलाकर…
डेढ़ सौ रुपये।
दोनों एक-दूसरे को देखने लगीं।
फूलमती उछल पड़ी।
“इतने में तो नई चप्पल आ जाएगी।”
जमुना की आँखें भी चमक उठीं।
“हाँ…”
“कल सुबह सबसे पहले रघु काका के पास चलेंगे।”
उस रात दोनों को कई महीनों बाद चैन की नींद आई।
लेकिन…
सुबह सूरज निकलने से पहले ही गाँव में शोर मच गया।
“आग…”
“आग लग गई…”
पूरा गाँव भागता हुआ चौधरी रामस्वरूप के खलिहान की ओर दौड़ा।
सूखी फसल धू-धू करके जल रही थी।
और उसी आग के बीच…
रघु काका की छोटी-सी मोची की दुकान भी थी।
कुछ ही मिनटों में…
दुकान राख बन गई।
जमुना और फूलमती वहीं खड़ी रह गईं।
उनकी मुट्ठी में कसकर पकड़े हुए डेढ़ सौ रुपये अब भी थे।
लेकिन जिस आदमी से वे नई चप्पल खरीदने वाली थीं…
उसके पास अब बेचने के लिए कुछ बचा ही नहीं था।
फूलमती ने धीरे से कहा,
“जमुना…”
“अब?”
जमुना ने अपनी मुट्ठी खोली।
फिर उन पैसों को देखा।
और बिना एक पल सोचे…
रघु काका की हथेली पर रख दिए।
रघु काका चौंक गए।
“अरे नहीं बेटियों…”
“ये तुम्हारे चप्पल के पैसे हैं।”
जमुना मुस्कुराई।
“चप्पल फिर कभी आ जाएगी काका…”
“लेकिन अगर आपकी दुकान नहीं बनी…”
“…तो पूरे गाँव के पैरों का सहारा चला जाएगा।”
रघु काका की आँखों से आँसू टपक पड़े।
उन्होंने दोनों के सिर पर हाथ रख दिया।
“आज पहली बार…”
“…मुझे लगा कि भगवान मंदिर में नहीं…”
“…तुम दोनों के रूप में मेरे सामने खड़े हैं।”
दोनों सहेलियाँ चुपचाप वहाँ से चल दीं।
फिर से…
नंगे पैर।
लेकिन इस बार…
उनके पैरों से ज़्यादा भारी उनका दिल नहीं था।
उन्हें यकीन था…
जिस रास्ते पर इंसानियत साथ चल रही हो,
उस रास्ते पर देर हो सकती है,
अँधेरा हो सकता है,
लेकिन मंज़िल कभी खोती नहीं।
सर्दियाँ दस्तक दे चुकी थीं।
सुबह की धूप अब देर से निकलती थी और शाम जल्दी ढल जाती थी। खेतों पर ओस की बूंदें मोतियों की तरह चमकती थीं। बड़गाँव में हर कोई अपने-अपने काम में लगा था, लेकिन पिछले कुछ दिनों से गाँव में एक ही चर्चा थी।
“ठाकुर हरिराम ने जमुना और फूलमती को अपनी तेल मिल में काम पर बुलाया है।”
किसी को खुशी हुई।
किसी को जलन।
और कुछ लोगों को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई।
दोनों सहेलियाँ पहली बार गाँव से बाहर बनी छोटी-सी तेल मिल में काम करने पहुँचीं।
मशीनें लगातार चल रही थीं।
सरसों की खुशबू पूरे आँगन में फैली हुई थी।
वहाँ पहले से काम कर रहे मजदूर उन्हें घूर रहे थे।
एक आदमी ने दूसरे से धीरे से कहा,
“यही हैं वो दोनों… जिनकी दोस्ती की कहानियाँ पूरा गाँव सुनाता फिरता है।”
दूसरा हँसा।
“दोस्ती पेट नहीं भरती भाई।”
जमुना ने सब सुन लिया।
लेकिन हमेशा की तरह चुप रही।
फूलमती का मन हुआ जवाब दे।
जमुना ने धीरे से उसका हाथ दबा दिया।
“हर बात का जवाब ज़ुबान से नहीं दिया जाता।”
शाम को काम खत्म हुआ।
ठाकुर हरिराम ने दोनों को मजदूरी के साथ पचास रुपये अलग से दिए।
फूलमती ने चौंककर पूछा,
“बाबूजी… ये किस बात के?”
हरिराम मुस्कुराए।
“ईमानदारी की मजदूरी है।”
दोनों ने पैसे वापस कर दिए।
“हमें उतना ही चाहिए जितना हमने कमाया है।”
हरिराम देर तक उन्हें देखते रहे।
धीरे से बोले,
“आज समझ आया…
गरीब जेब से होता है, नीयत से नहीं।”
गाँव लौटते समय रास्ते में फिर भूरा मिला।
लेकिन आज उसके चेहरे पर पहले जैसी अकड़ नहीं थी।
उसने धीरे से कहा,
“जमुना…”
दोनों रुक गईं।
“क्या है?”
भूरा सिर झुकाकर बोला,
“उस दिन… मेले में…”
“मुझसे गलती हो गई थी।”
फूलमती ने पहली बार उसे गौर से देखा।
“गलती?”
“हाँ।”
“मुझे लगा था गरीबी मज़ाक होती है।”
“लेकिन जिस दिन मेरे बाप की तबीयत खराब हुई और घर में दवा के पैसे नहीं थे…”
“…उस दिन समझ आया कि मजबूरी कैसी होती है।”
कुछ पल के लिए तीनों चुप रहे।
जमुना मुस्कुराई।
“गलती मान लेना ही सबसे बड़ी बहादुरी है।”
भूरा चला गया।
फूलमती ने धीरे से पूछा,
“तूने उसे माफ़ कर दिया?”
“हाँ।”
“इतनी आसानी से?”
जमुना बोली,
“जो इंसान बदलना चाहता हो…
उसे उसके पुराने गुनाहों से बाँधकर नहीं रखना चाहिए।”
उस रात…
फूलमती बहुत देर तक सो नहीं पाई।
वह छत की ओर देखती रही।
फिर बोली,
“जमुना…”
“हूँ?”
“अगर हमारे पास बहुत सारे पैसे होते ना…”
“तो?”
“मैं सबसे पहले ढेर सारी चप्पल खरीदती।”
जमुना हँस दी।
“फिर?”
“फिर पूरे गाँव में बाँट देती।”
“ताकि किसी बच्चे को नंगे पैर स्कूल, खेत या बाज़ार न जाना पड़े।”
जमुना ने उसकी तरफ देखा।
“तुझे पता है फूलो…”
“तेरे पास पैसे नहीं हैं…”
“लेकिन दिल बहुत अमीर है।”
कुछ दिनों बाद…
गाँव में खबर फैली कि शहर से बड़े व्यापारी आने वाले हैं।
ठाकुर हरिराम अपनी मिल बेचना चाहते थे।
अगर मिल बिक गई…
तो गाँव के आधे मजदूर बेरोज़गार हो जाते।
सबके चेहरों पर चिंता थी।
मिल में काम करने वाले बूढ़े रामू ने कहा,
“अगर यह मिल बंद हो गई…”
“तो हमारे घर का चूल्हा भी बंद हो जाएगा।”
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
फूलमती पहली बार डर गई।
“जमुना…”
“अगर काम चला गया तो?”
जमुना कुछ देर चुप रही।
फिर बोली,
“काम जाता है…”
“हाथ नहीं।”
“जब तक हाथ सलामत हैं…”
“रास्ते भी मिलते रहेंगे।”
अगले दिन व्यापारी आए।
महँगी गाड़ियाँ।
साफ़ कपड़े।
चमचमाते जूते।
उन्होंने मजदूरों को ऐसे देखा जैसे वे इंसान नहीं, सामान हों।
एक व्यापारी ने हँसते हुए कहा,
“इतने गरीब लोग हैं यहाँ…”
“इनके बिना भी काम चल जाएगा।”
जमुना से रहा नहीं गया।
उसने धीरे लेकिन साफ़ आवाज़ में कहा,
“साहब…”
“मशीनें तेल निकाल सकती हैं…”
“लेकिन मेहनत नहीं।”
व्यापारी उसकी ओर देखने लगा।
“क्या नाम है तुम्हारा?”
“जमुना।”
“बहुत बोलती हो।”
जमुना मुस्कुराई।
“सच हमेशा थोड़ा ज़्यादा सुनाई देता है।”
हरिराम दूर खड़े सब देख रहे थे।
उनकी आँखों में गर्व था।
उसी शाम…
मिल के बाहर अफरा-तफरी मच गई।
एक मजदूर का छोटा बेटा खेलते-खेलते मशीन वाले हिस्से में चला गया।
लोग चीखने लगे।
“बचाओ…!”
कोई आगे नहीं बढ़ा।
मशीन चल रही थी।
एक पल की देरी जान ले सकती थी।
जमुना दौड़ी।
बिना सोचे मशीन की तरफ भागी।
फूलमती भी उसके पीछे थी।
जमुना ने बच्चे को अपनी ओर खींच लिया।
लेकिन उसी समय उसका पैर फिसल गया।
वह गिरते-गिरते बची।
फूलमती ने झट से उसका हाथ पकड़ लिया।
दोनों ज़मीन पर गिर गईं।
बच्चा सुरक्षित था।
पूरा आँगन तालियों से गूँज उठा।
उस बच्चे की माँ रोते-रोते जमुना के पैरों में बैठ गई।
“बिटिया…”
“आज तूने मेरा बेटा लौटा दिया।”
जमुना घबरा गई।
उसने तुरंत उसे उठाया।
“अम्मा…”
“माँ कभी बेटी के पैर नहीं छूती।”
आस-पास खड़े लोगों की आँखें नम हो गईं।
उस रात…
ठाकुर हरिराम अपने आँगन में अकेले बैठे थे।
उन्होंने अपने मुनीम से कहा,
“मैंने जिंदगी भर ज़मीन खरीदी…”
“अनाज खरीदा…”
“मिल खरीदी…”
“लेकिन आज पहली बार समझ आया…”
“इंसानियत खरीदी नहीं जाती।”
उन्होंने लंबी साँस ली।
“कल पंचायत बुलाओ।”
मुनीम ने पूछा,
“किसलिए मालिक?”
हरिराम ने दूर अँधेरे में देखते हुए कहा,
“अब समय आ गया है…”
“कि पूरा गाँव जाने…”
“असली अमीरी किसे कहते हैं।”
“कुछ लोग जूतों की आवाज़ से पहचाने जाते हैं, और कुछ अपने नंगे पैरों के निशानों से। समय बीत जाता है, मगर इंसानियत के निशान मिटते नहीं।”
रघु काका की दुकान जले हुए आज पूरे सात दिन हो चुके थे।
गाँव से गुज़रने वाला हर आदमी उस राख के ढेर को एक बार ज़रूर देखता था। जहाँ कभी हथौड़ी की टक-टक सुनाई देती थी, वहाँ अब सिर्फ़ सन्नाटा था।
रघु काका सुबह उसी राख के सामने बैठ जाते।
जली हुई चमड़े की गंध अब भी हवा में तैरती रहती।
जमुना और फूलमती रोज़ काम पर जाने से पहले उनके पास बैठतीं।
एक दिन फूलमती ने धीरे से पूछा,
“काका… फिर से दुकान बनवाओगे ना?”
रघु काका मुस्कुराए।
“बेटी… दुकान बन जाती है।”
“लेकिन उम्र दोबारा नहीं बनती।”
जमुना ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“उम्र नहीं बनी तो क्या हुआ…”
“हम हैं ना।”
इसी बीच गाँव में पंचायत की बैठक बुला ली गई।
चौपाल लोगों से भर चुकी थी।
बुज़ुर्ग…
किसान…
औरतें…
बच्चे…
सब मौजूद थे।
ठाकुर हरिराम भी पहली बार बिना किसी घमंड के सबसे नीचे वाली चौकी पर बैठे थे।
लोग आपस में फुसफुसा रहे थे।
“आज पंचायत किस बात की है?”
“सुना है कोई बड़ा फैसला होगा।”
थोड़ी देर बाद हरिराम खड़े हुए।
उन्होंने चारों तरफ़ देखा।
फिर बोले,
“आज मैं गाँव के सामने दो लोगों का नाम लेना चाहता हूँ…”
“जिन्होंने मुझे इंसानियत का मतलब सिखाया।”
भीड़ में खुसर-पुसर होने लगी।
हरिराम ने हाथ से इशारा किया।
“जमुना…”
“फूलमती…”
“इधर आओ बेटियों।”
दोनों घबरा गईं।
धीरे-धीरे आगे आईं।
सिर झुका हुआ था।
हरिराम बोले,
“जिस दिन रघु काका की दुकान जली थी…”
“इन दोनों के पास सिर्फ़ डेढ़ सौ रुपये थे।”
“नई चप्पल खरीदने के लिए जोड़े हुए पैसे।”
“लेकिन इन्होंने अपने लिए चप्पल नहीं खरीदी।”
“रघु काका की दुकान बचाने के लिए दे दिए।”
पूरा चौपाल एकदम शांत हो गया।
लोग पहली बार यह बात सुन रहे थे।
भीड़ में खड़ी बिमला चाची का सिर झुक गया।
यही वह औरत थी जिसने कभी कहा था,
“दहेज में चप्पल भी नहीं दे पाएँगे।”
आज उसकी आँखें जमुना से मिल भी नहीं पा रही थीं।
भूरा भी पीछे खड़ा था।
वह धीरे-धीरे आगे आया।
सबकी नज़रें उसकी ओर थीं।
उसने बिना कुछ कहे…
जमुना और फूलमती के सामने हाथ जोड़ दिए।
“माफ़ कर दो।”
“मैंने बहुत मज़ाक उड़ाया था।”
फूलमती कुछ पल उसे देखती रही।
फिर बोली,
“भूरा…”
“गरीबी का मज़ाक मत उड़ाना।”
“क्योंकि वक्त…”
“कभी किसी का एक जैसा नहीं रहता।”
भूरा की आँखें भर आईं।
इतने में भीड़ में से एक आवाज़ आई।
“चप्पल तो फिर भी नहीं है इनके पास।”
लोगों ने पीछे मुड़कर देखा।
वह माधव साहू था।
गाँव का बनिया।
उसने अपनी दुकान से एक नया डिब्बा मँगवाया।
डिब्बा खोलते ही उसमें चमचमाती नई चप्पलों की जोड़ी रखी थी।
वह मुस्कुराया।
“ये मेरी तरफ़ से।”
फूलमती ने तुरंत हाथ पीछे कर लिए।
“नहीं साहू जी।”
“हम दान नहीं लेते।”
माधव बोला,
“दान नहीं है बेटी…”
“उस दिन तुमने एक भूखे बच्चे की इज़्ज़त बचाई थी।”
“आज मुझे अपनी बचानी है।”
जमुना ने फूलमती की ओर देखा।
दोनों समझ गईं।
यह एहसान नहीं था।
यह सम्मान था।
फूलमती ने चप्पल हाथ में ली।
लेकिन पहनने से पहले…
वह रघु काका के पास चली गई।
“काका…”
“पहली सिलाई आपकी होगी।”
रघु काका मुस्कुरा दिए।
“नई चप्पल में कैसी सिलाई?”
फूलमती बोली,
“ताकि हर कदम पर आपकी मेहनत भी साथ चले।”
रघु काका रो पड़े।
पंचायत खत्म होने लगी।
तभी जमुना ने हाथ जोड़कर कहा,
“मुझे भी कुछ कहना है।”
सब रुक गए।
वह धीरे-धीरे बोली,
“आज सब हमारी तारीफ़ कर रहे हैं।”
“लेकिन गाँव में सिर्फ़ हम गरीब नहीं हैं।”
“सिर्फ़ हमारी चप्पल नहीं टूटी थी।”
“कई घरों की छत टूटी है।”
“कई लोगों के चूल्हे ठंडे हैं।”
“कई बूढ़े अकेले हैं।”
“अगर आज आप सच में हमारी इज़्ज़त करना चाहते हैं…”
“तो वादा कीजिए…”
“आज के बाद किसी की मजबूरी पर हँसेंगे नहीं।”
“किसी गरीब को देखकर उसका मज़ाक नहीं उड़ाएँगे।”
“और…”
“अगर किसी के पैर नंगे दिखें…”
“तो उसे शर्मिंदा नहीं…”
“उसके साथ चलेंगे।”
चौपाल में ऐसी खामोशी छा गई कि दूर मंदिर की घंटी तक सुनाई दे रही थी।
सरस्वती काकी की आँखों से आँसू बह रहे थे।
उन्होंने कहा,
“बेटी…”
“आज तुमने पूरे गाँव को पढ़ा दिया…”
“बिना किताब खोले।”
उस शाम एक अनोखी बात हुई।
गाँव के बच्चों ने खेलना शुरू किया।
उनमें से एक बच्चा अचानक अपनी चप्पल उतारकर नंगे पैर चलने लगा।
दूसरे ने पूछा,
“ऐसा क्यों?”
वह मुस्कुराया।
“जमुना दीदी कहती हैं…”
“नंगे पैर चलने वाले छोटे नहीं होते।”
यह बात सुनकर जमुना ने तुरंत उसे रोक लिया।
वह उसके सामने बैठ गई।
“नहीं रे…”
“नंगे पैर चलना मजबूरी है…”
“शान नहीं।”
“अगर तेरे पास चप्पल है…”
“तो उसे पहन।”
“लेकिन…”
“जिसके पास नहीं है…”
“उसका मज़ाक कभी मत उड़ाना।”
बच्चे ने सिर हिलाया।
और चुपचाप अपनी चप्पल पहन ली।
दूर खड़ी फूलमती यह सब देख रही थी।
वह मुस्कुराई।
धीरे से बोली,
“देखा…”
“हमारी चप्पल नहीं थी…”
“फिर भी हमारी बात लोगों तक पहुँच गई।”
जमुना ने आसमान की ओर देखा।
डूबते सूरज की लाल रोशनी पूरे गाँव पर फैल रही थी।
उसने धीरे से कहा,
“फूलो…”
“शायद इंसान अपने पैरों से नहीं…”
“अपने कर्मों से रास्ते छोड़कर जाता है।”
दोनों सहेलियाँ फिर उसी कच्ची पगडंडी पर चल पड़ीं।
इस बार उनके पैरों में नई चप्पल थी।
लेकिन उनके कदम पहले जैसे ही थे।
धीमे…
साधारण…
और इंसानियत से भरे हुए।
“जिस दिन समाज किसी की गरीबी देखकर हँसना छोड़ देगा, उसी दिन अमीरी का असली अर्थ समझ में आएगा।”
साल बीतते देर नहीं लगती।
जिस पगडंडी पर कभी जमुना और फूलमती एक टूटी हुई चप्पल बाँटकर चला करती थीं, उसी रास्ते पर अब बच्चे स्कूल जाते समय उन्हें हाथ जोड़कर नमस्ते करते थे।
गाँव बदल रहा था।
धीरे-धीरे।
बिना किसी शोर के।
अब चौपाल पर गरीबों का मज़ाक कम और उनकी मदद की बातें ज़्यादा होने लगी थीं।
भूरा, जो कभी दोनों को “एक चप्पल वाली” कहकर चिढ़ाता था, अब हर रविवार रघु काका की दुकान पर बैठकर मुफ्त में लोगों की चप्पलें साफ़ करता।
रघु काका की दुकान भी फिर से बन चुकी थी।
लकड़ी की नई अलमारी, चमड़े की खुशबू और बाहर टंगा एक छोटा-सा बोर्ड…
“रघु मोची”
लेकिन उस बोर्ड के नीचे एक और पंक्ति लिखी थी।
“इस दुकान की पहली ईंट दो बेटियों की इंसानियत ने रखी थी।”
उस दिन गाँव में फिर मेला लगा था।
ठीक एक साल बाद।
वही झूले।
वही जलेबियाँ।
वही ढोल।
बस इस बार कुछ बदल गया था।
जमुना और फूलमती पहली बार…
एक साथ मेले जा रही थीं।
दोनों के पैरों में नई चप्पल थी।
फूलमती चलते-चलते अचानक रुक गई।
उसने पीछे मुड़कर उस पगडंडी को देखा।
फिर मुस्कुराकर बोली,
“याद है…?”
जमुना हँस दी।
“क्या?”
“हम यहीं बैठकर तय करते थे कि पहले कौन जाएगा।”
दोनों कुछ पल चुप रहीं।
फिर एक साथ हँस पड़ीं….
मेले में बच्चों की भीड़ लगी थी।
एक छोटी लड़की अपनी माँ का हाथ पकड़े चप्पल की दुकान पर खड़ी थी।
वह बार-बार गुलाबी चप्पल की ओर देख रही थी।
माँ दुकानदार से बोली,
“भैया… अगले महीने ले लेंगे।”
लड़की ने कुछ नहीं कहा।
बस मुस्कुराकर चल दी।
फूलमती की नज़र उस पर पड़ गई।
उसने जमुना की ओर देखा।
दोनों बिना कुछ बोले समझ गईं।
वे चुपचाप दुकान पर गईं।
चप्पल खरीदी।
और उस बच्ची के पीछे दौड़ पड़ीं।
“बिटिया…”
लड़की पलटी।
फूलमती ने चप्पल उसके हाथ में रख दी।
लड़की ने हैरानी से पूछा,
“लेकिन… पैसे?”
जमुना मुस्कुराई।
“जब तू बड़ी हो जाना…”
“…और किसी को नंगे पैर चलते देखना…”
“…तो उसके लिए चप्पल खरीद देना।”
“बस… हमारे पैसे लौट आएँगे।”
लड़की ने चप्पल सीने से लगा ली।
उसकी माँ की आँखें भर आईं।
रात को मेला खत्म होने लगा।
पूरा गाँव वापस लौट रहा था।
जमुना और फूलमती उसी पुराने बरगद के नीचे बैठ गईं।
जहाँ वे बचपन से बैठती आई थीं।
हवा में ठंडक थी।
दूर कहीं बाँसुरी बज रही थी।
फूलमती ने धीरे से पूछा,
“जमुना…”
“हाँ?”
“अगर कल हम दोनों न रहें…”
“तो क्या कोई हमें याद करेगा?”
जमुना मुस्कुराई।
“नाम शायद नहीं।”
“लेकिन…”
“अगर किसी दिन कोई गरीब किसी गरीब का हाथ पकड़ ले…”
“…तो समझ लेना…”
“…हम अभी भी यहीं हैं।”
फूलमती ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“तू हर बात इतनी गहरी कैसे सोच लेती है?”
जमुना ने हँसते हुए कहा,
“गरीबी बहुत कुछ सिखा देती है।”
कुछ दिनों बाद…
जमुना की माँ की तबीयत अचानक बिगड़ गई।
गाँव के वैद्य ने शहर ले जाने को कहा।
पैसे कम थे।
गाड़ी का इंतज़ाम नहीं था।
जमुना की आँखों में पहली बार डर साफ़ दिखाई दे रहा था।
वह चौपाल पर खड़ी थी।
कुछ कह भी नहीं पा रही थी।
तभी…
एक बैलगाड़ी आकर रुकी।
उसे भूरा चला रहा था।
“चल जमुना…”
“अम्मा को शहर ले चलते हैं।”
पीछे से माधव साहू आ गए।
उन्होंने दवाइयों के लिए पैसे पकड़ाए।
रघु काका ने अपनी पुरानी ऊनी चादर लाकर जमुना की माँ पर डाल दी।
सरस्वती काकी ने रास्ते के लिए खाना बाँध दिया।
देखते ही देखते…
पूरा गाँव वहाँ खड़ा था।
फूलमती की आँखों से आँसू बह निकले।
वह धीरे से बोली,
“देख…”
“आज पूरा गाँव हमारी तरह हो गया।”
जमुना ने भर्राई आवाज़ में कहा,
“नहीं फूलो…”
“आज गाँव इंसान बन गया।”
कई महीने बीत गए।
एक शाम…
सूरज ढल रहा था।
रघु काका अपनी दुकान बंद कर रहे थे।
उन्होंने देखा…
दुकान के बाहर दो पुरानी चप्पलें रखी थीं।
वही…
जिसकी पट्टी तार से बँधी रहती थी।
वही…
जिसने दो सहेलियों की पूरी जवानी देखी थी।
साथ में एक छोटा-सा कागज़ रखा था।
उस पर लिखा था…
“अब हमारी ज़रूरत पूरी हो गई है।
अगर कभी किसी और के पाँव नंगे मिलें…
तो उसे ये कहानी ज़रूर सुनाना।
चप्पल नहीं… इंसानियत पहनाना।
“जमुना और फूलमती”
रघु काका ने काँपते हाथों से वह चप्पल उठाई।
उनकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।
उन्होंने उसे अपनी दुकान की सबसे ऊँची कील पर टाँग दिया।
उस दिन से…
गाँव में आने वाला हर मुसाफ़िर उस चप्पल के बारे में पूछता।
रघु काका मुस्कुराकर कहते,
“ये कोई चप्पल नहीं है…”
“ये दो बेटियों की कहानी है।”
“इन्होंने मुझे सिखाया कि इंसान की हैसियत उसके पैरों में नहीं…”
“…उसके दिल में होती है।”
उपसंहार
बरसों बाद…
बड़गाँव पहले जैसा नहीं रहा।
कच्ची पगडंडियों की जगह पक्की सड़कें बन गईं। कई पुराने घर टूटकर नए मकानों में बदल गए। चौपाल के बरगद की कुछ शाखाएँ सूख गईं, तो कुछ नई निकल आईं।
समय ने गाँव का चेहरा बदल दिया था।
लेकिन रघु काका की छोटी-सी दुकान में एक चीज़ कभी नहीं बदली।
दीवार की सबसे ऊँची कील पर आज भी एक पुरानी, घिसी हुई चप्पल टँगी रहती थी।
कोई बच्चा उसे देखकर पूछता,
“काका, इतनी पुरानी चप्पल क्यों संभालकर रखी है?”
रघु काका मुस्कुरा देते।
“यह चप्पल नहीं है बेटा…”
“यह दो सहेलियों की दोस्ती है।”
फिर वे जमुना और फूलमती की कहानी सुनाते।
कैसे दो लड़कियों ने अपनी गरीबी को कभी अपनी पहचान नहीं बनने दिया।
कैसे उन्होंने आधी रोटी बाँटी, एक-दूसरे का दर्द बाँटा और ज़रूरत पड़ने पर अपनी छोटी-सी खुशियाँ भी दूसरों के नाम कर दीं।
कहानी सुनने वाले अक्सर चुप हो जाते।
जाते-जाते कोई अपनी पुरानी चप्पल किसी ज़रूरतमंद के लिए छोड़ जाता।
कोई किसी मज़दूर के बच्चे के लिए जूते खरीद देता।
कोई अपने घर लौटकर पहली बार अपने नौकर से इंसान की तरह बात करता।
रघु काका तब धीरे से कहते,
“कहानी कभी दुनिया नहीं बदलती…
लेकिन कहानी सुनने वाला इंसान बदल जाए, तो दुनिया अपने आप बदलने लगती है।”
और हर शाम, दुकान बंद करने से पहले वे उस पुरानी चप्पल पर जमी धूल बड़े प्यार से झाड़ देते।
मानो वह चमड़ा नहीं…
दो दिलों की दोस्ती हो, जिसे समय भी पुराना नहीं कर पाया।
समाप्त।
प्राची गुर्जर ।