लाल बत्ती पर बिकते गुलाब ? prachi Gurjar द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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लाल बत्ती पर बिकते गुलाब ?

लाल बत्ती पर बिकते गुलाब 🌹 

लेखिका की ओर से

कभी-कभी ज़िंदगी हमें सबसे बड़े सबक उन लोगों से सिखाती है, जिनसे मिलने की हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती।

यह कहानी केवल एक अमीर लड़की और एक फूल बेचने वाली लड़की की नहीं है। यह दो अलग दुनियाओं के मिलने की कहानी है। एक ऐसी दुनिया जहाँ सब कुछ है, लेकिन सुकून नहीं। और दूसरी, जहाँ बहुत कुछ नहीं है, फिर भी मुस्कुराने की वजहें हैं।

मैं हमेशा मानती हूँ कि खुशियाँ हमारी कमाई से नहीं, हमारे रिश्तों से बड़ी होती हैं। हम अक्सर सफलता, पैसा और पहचान के पीछे भागते-भागते यह भूल जाते हैं कि दिन के अंत में हमें किसी ऐसे इंसान की ज़रूरत होती है जो बिना किसी वजह के पूछे, “आज तुम्हारा दिन कैसा था?”

यह कहानी लिखते समय मैंने बार-बार महसूस किया कि गरीबी हमेशा पैसों की नहीं होती। कभी-कभी सबसे बड़ी गरीबी अपनेपन की होती है। और सबसे बड़ी अमीरी किसी ऐसे कंधे का होना, जिस पर सिर रखकर इंसान कुछ देर चुप रह सके।

अगर इस कहानी को पढ़ने के बाद आप अपने किसी पुराने दोस्त को याद करें, अपने परिवार के साथ थोड़ा और समय बिताएँ, या किसी अनजान इंसान की मुस्कान की कीमत समझ पाएँ, तो मुझे लगेगा कि मेरी यह कहानी अपने उद्देश्य तक पहुँच गई।

यह कहानी मेरे लिए सिर्फ़ एक कहानी नहीं, बल्कि उन छोटी-छोटी खुशियों को लिखा गया एक धन्यवाद है, जिन्हें हम अक्सर बहुत साधारण समझकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

— प्राची गुर्जर

कहानी शुरू करते है …………..

जुलाई की शाम थी।

घड़ी में छह बजकर तैंतालीस मिनट हो रहे थे।

अभी थोड़ी देर पहले ही बारिश थमी थी। कनॉट प्लेस की सड़कों पर पानी की पतली परत बिछी हुई थी। लाल बत्ती पर गाड़ियों की लंबी कतार लगी थी। कहीं भुट्टे की महक थी, कहीं चाय की भाप उठ रही थी। मेट्रो के खंभों के नीचे लोग बारिश से बचने के लिए खड़े थे और फुटपाथ पर छोटे-छोटे दुकानदार अपनी दुकानें फिर से सजा रहे थे।

उसी भीड़ में एक काली मर्सिडीज आकर रुकी।

गाड़ी के अंदर बैठी लड़की का नाम था नित्या दास।

सत्ताईस साल की।

सफेद शर्ट की बाज़ुएँ मुड़ी हुई थीं। बाल बिखरे हुए थे। आँखें लाल थीं, जैसे कई घंटों से रोना रोक रखा हो।

सुबह उसका रिश्ता टूट गया था।

और दोपहर में बोर्ड मीटिंग।

वहाँ उसके पिता ने सबके सामने सिर्फ़ एक वाक्य कहा था।

“आज से तुम कंपनी की डायरेक्टर नहीं हो।”

बस इतना।

कोई बहस नहीं।

कोई सफाई नहीं।

कोई दूसरा मौका नहीं।

नित्या पूरे रास्ते गाड़ी चलाती रही। उसे याद भी नहीं था कि वह घर क्यों नहीं गई।

मोबाइल फिर बजा।

माँ कॉलिंग…

उसने स्क्रीन देखी और फोन उल्टा करके सीट पर रख दिया।

तभी शीशे पर हल्की सी दस्तक हुई।

“मैडम… गुलाब ले लो।”

नित्या ने सिर उठाया।

शीशे के उस पार एक दुबली-पतली लड़की खड़ी थी। उम्र मुश्किल से उन्नीस-बीस साल होगी। हाथ में रंग-बिरंगे गुलाबों के बुके थे। सलवार-कमीज़ पुरानी थी, चप्पल घिस चुकी थी, लेकिन चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जैसे दुनिया का कोई दुख उसे छू ही नहीं सकता।

नित्या ने शीशा थोड़ा नीचे किया।

“कितने का है?”

“दो सौ रुपये का।”

“और सारे?”

लड़की हँस दी।

“आप जैसे लोग पहले यही पूछते हैं, फिर एक ही लेते हैं।”

नित्या के होंठों पर हल्की मुस्कान आ गई।

कई दिनों बाद।

“अगर सारे खरीद लूँ तो?”

लड़की ने बुके गिने।

“लगभग पंद्रह सौ के होंगे।”

नित्या ने पर्स से दो हजार का नोट निकाला और उसकी तरफ बढ़ा दिया।

“रख लो।”

लड़की ने हाथ पीछे कर लिया।

“नहीं।”

नित्या चौंक गई।

“क्यों?”

“क्योंकि आप फूल नहीं खरीद रहीं। बस पैसे दे रही हैं।”

“दोनों में फर्क क्या है?”

लड़की ने बिना मुस्कुराए कहा,

“बहुत फर्क है।”

नित्या पहली बार उसे ध्यान से देखने लगी।

“नाम क्या है तुम्हारा?”

“मुस्कान।”

“स्कूल जाती हो?”

“नहीं।”

“पढ़ना आता है?”

मुस्कान ने सिर हिला दिया।

“नहीं।”

कुछ पल दोनों चुप रहीं।

लाल बत्ती अभी भी लाल थी।

बारिश की दो-तीन बूंदें फिर से गिरने लगीं।

मुस्कान ने धीरे से एक गुलाब उठाया और गाड़ी की खिड़की के अंदर रख दिया।

“अब पैसे दे सकती हो। अब मैंने तुम्हें कुछ बेचा है।”

नित्या ने दो हजार का नोट उसकी हथेली पर रख दिया।

मुस्कान ने पैसे मोड़कर दुपट्टे के कोने में बाँध लिए।

“अब एक बात पूछूँ?”

नित्या ने सिर हिलाया।

“पूछो।”

मुस्कान ने बिना झिझक पूछा,

“इतनी उदास क्यों हो?”

नित्या हँसना चाहती थी, लेकिन हँसी नहीं आई।

“तुम्हें कैसे पता कि मैं उदास हूँ?”

“जो लोग खुश होते हैं, वो लाल बत्ती पर खिड़की खोलकर बारिश नहीं देखते।”

नित्या कुछ सेकंड तक उसे देखती रही।

फिर बोली,

“मेरे पास सब कुछ है।”

“अच्छा?”

“घर है।”

“हूँ।”

“गाड़ी है।”

“हूँ।”

“पैसा है।”

“हूँ।”

“लेकिन… खुशी नहीं है।”

मुस्कान ने सड़क की दूसरी तरफ देखा।

फिर अचानक ज़ोर से आवाज़ लगाई,

“अरे छोटू… इधर आ।”

कुछ ही सेकंड में गुब्बारे बेचने वाला एक दुबला-पतला लड़का दौड़ता हुआ आ गया।

“क्या हुआ?”

“गुड्डू को बुला।”

गुड्डू खिलौनों की टोकरी लेकर आ गया।

“रानी को बुला।”

फूलों की मालाएँ बेचती रानी भी आ गई।

“सोनू कहाँ है?”

“यहीं हूँ।”

विंडशील्ड साफ़ करता हुआ सोनू भी पास आ गया।

एक मिनट के अंदर पाँच लोग मुस्कान के आसपास खड़े थे।

सबकी उम्र लगभग बीस साल के आसपास थी।

सबके कपड़े साधारण थे।

लेकिन चेहरों पर एक अजीब सी चमक थी।

रानी ने मुस्कान से पूछा,

“क्या हुआ?”

मुस्कान ने हँसते हुए कहा,

“मैडम पूछ रही हैं मैं खुश कैसे रहती हूँ।”

सब एक साथ हँस पड़े।

छोटू बोला,

“गलत लड़की से पूछ लिया।”

गुड्डू ने मुस्कुराकर कहा,

“इसको तो बारिश में भी मज़ा आता है।”

रानी ने मुस्कान के कंधे पर हाथ रखा।

“इसका दिल बड़ा है, इसलिए जेब छोटी होने का दुख नहीं होता।”

नित्या चुपचाप उन्हें देख रही थी।

उसे याद नहीं था कि उसने आख़िरी बार दोस्तों के साथ ऐसे कब हँसा था।

तभी पीछे से एक पुरानी मोटरसाइकिल आकर रुकी।

उस पर चाय का बड़ा स्टील का डिब्बा बंधा था।

एक लड़का उतरा।

गेहुँआ रंग।

भीगे हुए बाल।

चेहरे पर दिनभर की थकान।

लेकिन जैसे ही उसकी नज़र मुस्कान पर पड़ी, उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

“इतनी देर क्यों कर दी?” मुस्कान ने शिकायत की।

“नसीम चाचा ने दुकान बंद करने में देर कर दी।”

उसने अपने बैग से अख़बार में लिपटा बन-मक्खन निकाला।

“पहले ये खा लो। सुबह से कुछ नहीं खाया होगा।”

मुस्कान ने बिना बहस किए बन ले लिया।

“और तुम?”

“मैं बाद में खा लूँगा।”

“झूठ मत बोलो।”

उसने बन का आधा हिस्सा तोड़ा और इमरान के हाथ में रख दिया।

“अब बराबर।”

इमरान मुस्कुरा दिया।

नित्या उन्हें देख रही थी।

उसे लगा जैसे उसने किसी फिल्म का नहीं, किसी सच्ची ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत दृश्य देख लिया हो।

इमरान ने पहली बार नित्या की तरफ देखा।

“नई ग्राहक हैं?”

मुस्कान ने मुस्कुराकर कहा,

“नहीं…”

फिर एक पल रुककर बोली,

“शायद दोस्त बनने वाली हैं।”

नित्या ने पता नहीं क्यों, कई महीनों बाद पहली बार अपने भीतर कुछ पिघलता हुआ महसूस किया।

तभी सिग्नल हरा हो गया।

पीछे खड़ी गाड़ियों ने हॉर्न बजाना शुरू कर दिया।

लेकिन नित्या ने गाड़ी आगे नहीं बढ़ाई।

उसने इंजन बंद कर दिया।

और शायद पहली बार…

उसे कहीं पहुँचने की नहीं,

किसी के साथ ठहरने की जल्दी थी।

पीछे खड़ी गाड़ियों के हॉर्न लगातार बज रहे थे।

एक ट्रैफिक पुलिस वाले ने दूर से हाथ हिलाकर इशारा किया।

“मैडम… गाड़ी आगे बढ़ाइए।”

नित्या जैसे किसी गहरी सोच से बाहर आई। उसने गाड़ी धीरे से किनारे पार्क कर दी।

पर्स उठाया और पहली बार अपनी दुनिया से निकलकर उस फुटपाथ की तरफ चली गई जहाँ मुस्कान और उसके दोस्त रहते थे।

उसके महँगे जूतों पर मिट्टी लग गई।

लेकिन इस बार उसने उन्हें साफ करने की कोशिश नहीं की।

फुटपाथ पर एक पुराना नीला तिरपाल बिछा था।

उस पर सब गोल घेरा बनाकर बैठे थे।

बीच में नसीम चाचा की चाय की केतली रखी थी।

“आइए मैडम…”

मुस्कान ने जगह बनाते हुए कहा।

“यहाँ बैठिए।”

नित्या थोड़ी झिझकी।

उसने शायद पहली बार ज़िंदगी में सड़क के किनारे ज़मीन पर बैठना था।

रानी मुस्कुरा दी।

“डरिए मत… मिट्टी अमीर और गरीब दोनों के कपड़ों पर एक जैसी लगती है।”

सब हँस पड़े।

नित्या भी।

बहुत हल्का सा।

नसीम चाचा ने कुल्हड़ में चाय डालते हुए पूछा,

“बेटी, चीनी कम या ज़्यादा?”

नित्या ने जवाब दिया,

“जैसी आप सब पीते हैं।”

चाचा मुस्कुराए।

“फिर तो आज पहली बार असली चाय पियोगी।”

कुछ देर सब चुपचाप चाय पीते रहे।

बारिश फिर शुरू हो गई।

इस बार हल्की।

बूंदें टीन की छत पर पड़ रही थीं।

एक अजीब सा सुकून था वहाँ।

नित्या ने पूछा,

“तुम लोग रोज़ ऐसे ही साथ बैठते हो?”

छोटू ने तुरंत कहा,

“नहीं।”

नित्या ने हैरानी से देखा।

“रोज़ इससे भी ज़्यादा शोर करते हैं।”

सब फिर हँस पड़े।

मुस्कान ने चाय का कुल्हड़ नीचे रखा।

“जानती हो मैडम…”

“हम्म?”

“हमारे पास पैसे कम हैं।”

“लेकिन लोग ज़्यादा हैं।”

“क्या मतलब?”

“अगर मैं आज बीमार पड़ जाऊँ…”

उसने रानी की तरफ देखा।

“ये मेरे फूल बेच देगी।”

रानी बोली,

“और पैसे पूरे इसके हाथ में दूँगी।”

सोनू बोला,

“अगर मेरा शीशा साफ करने वाला कपड़ा खो जाए…”

“तो छोटू अपना दे देता है।”

छोटू ने हँसते हुए कहा,

“फटा हुआ वाला।”

“नया कभी नहीं देता।”

सब फिर हँस पड़े।

नित्या उन्हें देख रही थी।

इतने कम में…

इतनी हँसी?

उससे समझ नहीं आ रहा था।

“तुम लोग कभी लड़ते नहीं?”

गुड्डू बोला,

“दिन में चार बार।”

“फिर?”

“शाम तक भूल जाते हैं।”

“कैसे?”

इमरान पहली बार बोला।

“क्योंकि भूखे पेट लड़ाई ज़्यादा देर नहीं चलती।”

सब फिर मुस्कुरा दिए।

कुछ देर बाद नित्या ने धीरे से पूछा,

“मुस्कान…”

“हूँ?”

“तुमने कहा था तुम्हारे पास खुशी है।”

“हाँ।”

“मिलती कहाँ है?”

मुस्कान कुछ देर सोचती रही।

फिर बोली,

“खुशी खरीदी नहीं जाती।”

“तो?”

“उगाई जाती है।”

नित्या समझी नहीं।

“कैसे?”

मुस्कान ने सामने पड़े गमले की तरफ इशारा किया।

उसमें एक छोटा सा तुलसी का पौधा था।

“रोज़ थोड़ा पानी दो।”

“धूप मिले।”

“समय दो।”

“तभी बड़ा होता है।”

“रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं।”

नित्या चुप हो गई।

थोड़ी देर बाद उसने पूछा,

“तुम्हारा परिवार?”

मुस्कान की आँखें एक पल के लिए झुक गईं।

“अम्मी पाँच साल पहले चली गईं।”

“अब्बू का पता नहीं।”

“फिर?”

“बस… ये लोग हैं।”

उसने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

“यही घर हैं।”

नित्या ने धीरे से पूछा,

“और इमरान?”

मुस्कान मुस्कुरा दी।

“बचपन से साथ है।”

छोटू बीच में बोल पड़ा,

“जब ये दोनों छोटे थे ना…”

“तब भी लड़ते थे।”

रानी हँसने लगी।

“आज भी लड़ते हैं।”

इमरान ने मुस्कुराकर कहा,

“अच्छा है।”

“जो लोग लड़ना छोड़ देते हैं…”

“वो बात करना भी छोड़ देते हैं।”

बारिश अब तेज़ हो गई थी।

लोग भागकर छज्जों के नीचे आ रहे थे।

एक छोटी बच्ची भीगती हुई रो रही थी।

उसके हाथ से गुब्बारा उड़ गया था।

छोटू बिना कुछ सोचे उसके पीछे भागा।

दो मिनट बाद वापस आया।

हाथ में वही लाल गुब्बारा था।

उसने बच्ची को पकड़ा दिया।

बच्ची हँसने लगी।

नित्या ने पूछा,

“कितने का था?”

“बीस रुपये।”

“और तुमने मुफ्त दे दिया?”

छोटू ने कंधे उचकाए।

“उसकी हँसी बीस रुपये से महँगी थी।”

नित्या ने कुछ नहीं कहा।

उसने सिर्फ़ पहली बार महसूस किया…

कि शायद दुनिया का हिसाब वही नहीं था जो उसने बिज़नेस स्कूल में सीखा था।

रात के आठ बजने वाले थे।

सड़क की बत्तियाँ जल चुकी थीं।

लोग कम होने लगे थे।

इमरान ने अपना बैग खोला।

उसमें से एक पुरानी, घिसी हुई किताब निकाली।

नित्या ने पूछा,

“ये क्या है?”

मुस्कान की आँखें चमक उठीं।

“मेरी सबसे पसंदीदा चीज़।”

“तुम तो पढ़ नहीं सकती।”

“नहीं।”

“फिर?”

मुस्कान मुस्कुराई।

“मैं नहीं पढ़ सकती…”

“लेकिन ये पढ़कर सुनाता है।”

उसने इमरान की तरफ देखा।

“रोज़ रात को।”

इमरान ने किताब खोली।

पन्ने इतने पुराने थे कि किनारे पीले पड़ चुके थे।

उसने धीरे से कहा,

“आज जौन एलिया सुनें?”

मुस्कान ने बच्चे जैसी खुशी से सिर हिलाया।

नित्या पहली बार उत्सुक होकर उनकी तरफ देखने लगी।

उसे नहीं पता था…

कि अगले कुछ मिनट उसकी पूरी ज़िंदगी का नज़रिया बदलने वाले थे।

बारिश अब थम चुकी थी।

सड़क पर पानी की छोटी-छोटी परछाइयाँ स्ट्रीट लाइट की रोशनी में चमक रही थीं।

राजीव चौक की भागती हुई दुनिया धीरे-धीरे शांत हो रही थी।

फुटपाथ पर बैठे सब लोग इमरान की तरफ देखने लगे।

उसने अपनी पुरानी किताब खोली।

किताब के पहले पन्ने पर नीली स्याही से लिखा था,

“अगर कभी जिंदगी बहुत भारी लगे, तो कविता पढ़ लेना। शायद शब्द तुम्हारा थोड़ा बोझ उठा लें।”

नित्या ने धीरे से पूछा,

“ये किसने लिखा?”

इमरान मुस्कुराया।

“मैंने।”

“मुस्कान पढ़ नहीं सकती… इसलिए हर किताब में उसके लिए कुछ लिख देता हूँ।”

मुस्कान ने किताब को ऐसे छुआ जैसे कोई बच्चा अपना सबसे प्यारा खिलौना छूता है।

“मुझे अक्षर नहीं आते…”

“लेकिन इनकी आवाज़ याद रहती है।”

इमरान ने पन्ना पलटा और पढ़ना शुरू किया।

“शायद मुझे किसी से मोहब्बत नहीं हुई… लेकिन यक़ीन सबको दिलाता रहा हूँ मैं…”

वह रुका।

“जौन एलिया।”

मुस्कान ने आँखें बंद कर लीं।

उसके चेहरे पर वैसी शांति थी जैसी किसी मंदिर की सीढ़ियों पर बैठने के बाद मिलती है।

नित्या उन्हें देख रही थी।

उसने पहली बार महसूस किया कि कविता पढ़ना और कविता सुनना दो अलग चीज़ें हैं।

जब कोई अपना इंसान तुम्हारे लिए पढ़ता है…

तो शब्द सिर्फ़ कानों तक नहीं पहुँचते।

दिल तक उतर जाते हैं।

“और सुनाओ।”

मुस्कान ने कहा।

इमरान ने इस बार किताब बंद कर दी।

“आज याद से सुनाता हूँ।”

उसने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा,

“बहुत कुछ खोकर भी अगर मुस्कुराना आ जाए तो समझ लेना जिंदगी तुम्हें हराने नहीं सिखाने आई थी।”

“ये किसकी है?”

नित्या ने पूछा।

इमरान हँसा।

“मेरी।”

मुस्कान ने गर्व से कहा,

“ये भी लिखता है।”

“छिपकर।”

इमरान थोड़ा शर्माने लगा।

“अरे… ऐसी ही।”

कुछ देर सब चुप रहे।

फिर नित्या ने धीमी आवाज़ में पूछा,

“तुम लोग कभी डरते नहीं?”

रानी बोली,

“डरते हैं।”

“रोज़।”

“किससे?”

“कल से।”

सोनू ने कहा,

“अगर कल बारिश हुई तो कमाई कम होगी।”

गुड्डू बोला,

“अगर बीमार पड़ गए तो दवा के पैसे कहाँ से आएँगे।”

छोटू बोला,

“अगर पुलिस ने यहाँ से भगा दिया तो?”

सबके पास अपने-अपने डर थे।

नित्या ने सोचा…

फिर भी ये लोग हँस कैसे लेते हैं?

मुस्कान ने जैसे उसके मन की बात पढ़ ली।

“डर होना और डर के साथ जीना अलग बात है।”

“हम डरते हैं…”

“लेकिन डर को खाना नहीं खिलाते।”

“मतलब?”

“अगर मैं पूरे दिन यही सोचती रहूँ कि कल क्या होगा…”

“तो आज जो मेरे पास है, वो भी चला जाएगा।”

नित्या की आँखें भर आईं।

उसने पहली बार अपने बारे में कहना शुरू किया।

“मैंने कभी किसी चीज़ की कमी नहीं देखी।”

“मेरे पापा ने जो माँगा, उससे ज़्यादा दिया।”

“सबसे अच्छा स्कूल।”

“सबसे अच्छी यूनिवर्सिटी।”

“सबसे बड़ी नौकरी।”

“लेकिन…”

वह रुक गई।

“मैंने कभी किसी को समय नहीं दिया।”

“दोस्त छूटते गए।”

“रिश्ते छूटते गए।”

“मैं सोचती रही कि बाद में मिल लूँगी।”

“बाद में बात कर लूँगी।”

“बाद में जी लूँगी।”

उसकी आवाज़ भर्रा गई।

“और आज…”

“मेरे पास सब कुछ है।”

“बस कोई नहीं है।”

मुस्कान ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया।

उसके हाथ ठंडे थे।

“अकेलापन बहुत महँगा होता है।”

“पैसों से भी ज़्यादा।”

कुछ देर बाद नसीम चाचा चाय लेकर आए।

उन्होंने एक कुल्हड़ नित्या की तरफ बढ़ाया।

“बेटी…”

“ज़िंदगी में दो चीज़ें कभी अकेले मत पीना।”

“चाय…”

“और दुख।”

नित्या ने उनकी तरफ देखा।

“क्यों?”

चाचा मुस्कुराए।

“क्योंकि दोनों बाँटने से हल्के हो जाते हैं।”

रात के लगभग साढ़े नौ बज चुके थे।

सड़क लगभग खाली हो चुकी थी।

मुस्कान अपना बचा हुआ सामान समेट रही थी।

नित्या ने पूछा,

“रोज़ यहीं मिलोगी?”

“अगर बारिश नहीं हुई तो।”

“और अगर हुई?”

मुस्कान मुस्कुराई।

“तो भी यहीं।”

“बस छाता लेकर।”

दोनों हँस पड़ीं।

नित्या ने अपने पर्स से एक विज़िटिंग कार्ड निकाला।

“अगर कभी मदद चाहिए हो…”

मुस्कान ने कार्ड देखा।

फिर वापस कर दिया।

“रख लो।”

“क्यों?”

“जब सच में ज़रूरत होगी…”

“मैं खुद आ जाऊँगी।”

“अभी मेरे पास सब है।”

नित्या ने हैरानी से पूछा,

“सब?”

मुस्कान ने अपने दोस्तों की तरफ देखा।

फिर इमरान की तरफ।

फिर आसमान की तरफ।

“हाँ…”

“सब।”

नित्या गाड़ी में बैठ गई।

इंजन स्टार्ट किया।

लेकिन इस बार उसने शीशा बंद नहीं किया।

हवा अंदर आती रही।

गुलाब की हल्की खुशबू पूरी गाड़ी में फैल गई।

सिग्नल पार करते हुए उसने रियर व्यू मिरर में देखा।

मुस्कान और उसके दोस्त फिर किसी बात पर हँस रहे थे।

शायद किसी ने फिर किसी का समोसा खा लिया था।

शायद किसी ने किसी की खिल्ली उड़ा दी थी।

उसे नहीं पता।

लेकिन उसे पहली बार लगा…

कि खुशी बड़ी घटनाओं में नहीं रहती।

वो छोटी-छोटी आदतों में रहती है।

किसी का इंतज़ार करने में।

आधा बन-मक्खन बाँट लेने में।

बारिश में भीगकर भी हँस लेने में।

किसी ऐसे इंसान का होना…

जो तुम्हें किताब पढ़कर सुनाए क्योंकि तुम पढ़ नहीं सकते।

अगले सोमवार नित्या फिर उसी सिग्नल पर पहुँची।

इस बार उसके हाथ में कोई महँगा बैग नहीं था।

बस एक कप चाय थी।

और एक किताब।

उसने मुस्कान के सामने बैठकर कहा,

“आज तुम सुनोगी…”

“या मैं पढ़ूँ?”

मुस्कान खिलखिलाकर हँस पड़ी।

“आज तुम पढ़ो।”

नित्या ने किताब खोली।

शब्द धीरे-धीरे उसके होंठों से निकले।

मुस्कान आँखें बंद करके सुनती रही।

और पहली बार…

नित्या को लगा…

कि शायद वह फिर से जीना सीख रही है।

उस रात नित्या ने अपनी डायरी में सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी।

“मेरे पास सब कुछ था, सिवाय उन लोगों के जिनके साथ मैं अपना ‘सब कुछ’ बाँट सकती। और यह बात मुझे एक लाल बत्ती पर फूल बेचने वाली लड़की ने सिखाई।”

प्राची गुर्जर…..