ज़िंदगी सच में अजीब होती है।
इतना कुछ हो जाता है कि एक दिन अचानक एहसास होता है—हम बड़े कब हो गए?
लोग अक्सर कहते हैं, "काश बचपन वापस मिल जाए।"
लेकिन मैं हमेशा चुप रह जाती हूँ।
क्योंकि मेरे लिए बचपन सिर्फ़ मासूमियत नहीं था। अगर बचपन वापस आएगा, तो उसके साथ वो दिन भी लौटेंगे जिन्हें भूलने में ही बरस लग गए। कुछ यादें ऐसी होती हैं जिन्हें दोबारा जीने की हिम्मत शायद किसी में नहीं होती।
हाँ, अगर वक़्त सच में पीछे लौट सकता… और मुझे सिर्फ़ एक दिन बदलने का मौका मिलता, तो शायद मैं उसे बदल देती।
लेकिन ज़िंदगी ऐसी कहाँ होती है?
जब हर नया दिन अपने साथ एक नई परेशानी लेकर आए, तो इंसान हर रोज़ क्या-क्या ठीक करे?
कभी-कभी लगता है कि ज़िंदगी कोई परीक्षा नहीं, बल्कि एक लंबी कहानी है, जिसमें हर अध्याय पिछले से थोड़ा ज़्यादा मुश्किल होता जाता है।
अब अपने बारे में क्या बताऊँ?
मैं कोई जीनियस नहीं हूँ। मेरे पास ऐसी कोई खास प्रतिभा भी नहीं है जिस पर दुनिया तालियाँ बजाए। मैं बस एक बिल्कुल साधारण इंसान हूँ।
सीखने का शौक बहुत है। नई-नई चीज़ें शुरू करती हूँ, बड़े उत्साह से। लेकिन अक्सर बीच रास्ते में ही मेरा ध्यान भटक जाता है। शायद फोकस ही मेरी सबसे बड़ी कमजोरी है।
मुझे बहुत-सी चीज़ें थोड़ी-थोड़ी आती हैं।
खाना बना लेती हूँ। इतना अच्छा नहीं कि लोग तारीफ़ करते न थकें, लेकिन इतना भी नहीं कि कोई खाने से मना कर दे।
घर के छोटे-मोटे बिजली के काम भी कभी जुगाड़ से कर लेती हूँ।
नई चीज़ें सीखने की कोशिश करती रहती हूँ, लेकिन किसी एक चीज़ में पूरी तरह माहिर नहीं बन पाती।
ड्रॉइंग कभी ठीक से नहीं आई। सजना-सँवरना भी कभी-कभी ही किया। अब तो उस पर भी ज़्यादा ध्यान नहीं जाता।
पढ़ाई भी हमेशा वैसी नहीं हो पाती जैसी मैं खुद से उम्मीद करती हूँ।
मैं दो बहनों और एक भाई में दूसरी संतान हूँ।
शायद इसलिए थोड़ा गुस्सा जल्दी आ जाता है।
लेकिन अजीब बात ये है कि मेरा गुस्सा ज़्यादातर मेरे अंदर ही रहता है। मैं ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने वालों में नहीं हूँ। हाँ, अगर बात गलत लगे तो जवाब ज़रूर दे देती हूँ। इसलिए कई लोग मुझे तेज़-तर्रार या ज़िद्दी भी कहते हैं।
हर इंसान की तरह मैंने भी लोगों की राय सुनी है—कभी रंग पर, कभी चेहरे पर, कभी किसी और बात पर। समाज अक्सर बाहरी चीज़ों से फैसले जल्दी कर लेता है।
पहले ऐसी बातें चुभती थीं।
अब कोशिश करती हूँ कि उन्हें अपने दिल का हिस्सा न बनने दूँ।
शायद हर किसी की ज़िंदगी में कुछ न कुछ ऐसा होता है, जिसे लेकर लोग बिना सोचे टिप्पणी कर देते हैं।
मेरी ज़िंदगी भी कुछ वैसी ही है—आधी-आधी।
थोड़ी-सी पढ़ाई, थोड़ा-सा प्रोग्रामिंग, थोड़ी-सी लड़ाई करने की हिम्मत, थोड़ा-सा हर काम।
सब कुछ छू लेती हूँ…
लेकिन किसी एक चीज़ को इतनी मज़बूती से पकड़ नहीं पाती कि कह सकूँ—"हाँ, यही मेरी पहचान है।"
फिर भी…
ज़िंदगी चल रही है।
न बिल्कुल परफेक्ट…
न बिल्कुल बुरी…
बस अपने तरीके से आगे बढ़ रही है।
और शायद खुद को वैसा ही स्वीकार कर लेना, जैसा मैं सच में हूँ—मेरी सबसे बड़ी जीत है।
क्योंकि हर कहानी किसी हीरो से शुरू नहीं होती।
कुछ कहानियाँ एक बिल्कुल साधारण इंसान से शुरू होती हैं…
जो हर दिन थोड़ा टूटता है, थोड़ा सीखता है, फिर भी अगले दिन उठकर ज़िंदगी जीने की कोशिश करता है।
शायद… मेरी कहानी भी उन्हीं में से एक है।
Aarushi Singh Rajput 🖤😈