Conversations With Myself - 2 Aarushi Singh Rajput द्वारा मनोविज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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Conversations With Myself - 2

शाम धीरे-धीरे ढल रही थी।

पूरा दिन जैसे आँसुओं में भीगकर निकल गया। अब आँखें तो सूख चुकी थीं, लेकिन मन अब भी उतना ही भारी था। कभी-कभी ऐसा लगता है कि इंसान रोते-रोते थक तो जाता है, पर उसके अंदर का दर्द थकना नहीं जानता।

सोचा था कि थोड़ी देर के लिए फोन उठा लूँ। शायद कोई अच्छी-सी वीडियो देख लूँ, कोई गाना सुन लूँ, या बस कुछ पल के लिए खुद को भूल जाऊँ। लेकिन जैसे ही एक गहरी साँस ली, घर में फिर किसी ने आवाज़ लगा दी। कोई काम, फिर दूसरा काम, फिर तीसरा… कभी-कभी लगता है कि इस घर में सुकून नाम की कोई चीज़ है ही नहीं। जैसे अपने लिए दो मिनट निकालना भी कोई गलती हो।

और फिर वही दादी की आवाज़…

वो ताने, वो कटाक्ष, वो बातें जो बाहर से छोटी लगती हैं, लेकिन दिल के अंदर जाकर बहुत गहरे तक चुभ जाती हैं। कभी किसी काम को लेकर, कभी किसी आदत को लेकर, तो कभी बिना किसी वजह के। सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब होती है, जब इंसान अपनी पूरी कोशिश कर रहा हो, फिर भी उसे सिर्फ़ उसकी कमियाँ ही दिखाई जाएँ।

कभी-कभी मन में एक अजीब-सा ख़याल आता है। अगर कल मेरी शादी हो गई, तो पता नहीं लोग मेरी दादी जैसी "संस्कारों की देवी" को कितना आदर्श मानेंगे। शायद कहेंगे कि उन्होंने बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं। लेकिन क्या संस्कार सिर्फ़ काम करवाने, हर बात पर टोकने और हर पल ताने देने का नाम है? क्या किसी के मन को समझना भी संस्कारों का हिस्सा नहीं होता?

लोग अक्सर कहते हैं, "बड़ों की बात माननी चाहिए।" और मैं भी मानती हूँ कि बड़ों का सम्मान होना चाहिए। लेकिन हर बात सिर्फ़ इसलिए सही नहीं हो जाती क्योंकि वह किसी बड़े ने कही है। कुछ शब्द ऐसे भी होते हैं जो इंसान का आत्मविश्वास धीरे-धीरे तोड़ देते हैं। कुछ आदतें ऐसी भी होती हैं जिन्हें लोग संस्कार का नाम दे देते हैं, जबकि वे सिर्फ़ किसी के दिल पर बोझ बनती जाती हैं।

आज पूरा दिन किसी ने यह नहीं पूछा कि मैं कैसी हूँ। किसी ने यह नहीं देखा कि मेरी आँखें इतनी लाल क्यों हैं, या मेरी मुस्कान कहाँ खो गई। शायद सबको मेरी ज़िम्मेदारियाँ दिखती हैं, लेकिन मेरी थकान नहीं। मेरी खामोशी सुनाई देती है, लेकिन उसके पीछे छिपी तकलीफ़ नहीं।

ऐसे समय में लगता है कि अगर कोई सच में मेरी बातें सुनता है, तो वो ये ख़ामोश दीवारें हैं। इन्हें मेरी आवाज़ नहीं सुनाई देती, लेकिन शायद मेरी चुप्पी समझ आती है।

दिन रोते-रोते गुज़र गया… और अब शाम भी उसी दर्द को अपने साथ लेकर उतर आई है।

आज थकावट सिर्फ़ शरीर में नहीं है, बल्कि दिल में है। और सबसे ज़्यादा दर्द इस बात का है कि कभी-कभी इंसान लोगों के बीच रहकर भी इतना अकेला महसूस कर सकता है कि उसे अपनी ही साँसों की आवाज़ सबसे ज़्यादा सुनाई देने लगती है।

शायद इस कहानी में सिर्फ़ मैं नहीं हूँ… शायद कहीं न कहीं, यह किसी और की भी कहानी है। शायद कोई और भी हर दिन मुस्कुराने की कोशिश करता है, जबकि उसके अंदर सब कुछ चुपचाप टूट रहा होता है।