अतीत का कसाई और वजूद का कत्ल (बीस खौफनाक भाग)
भाग एक: आँखों में जमा बर्फ
अजनबी के उन तीन शब्दों—" वह लौट आई" —ने इकबाल के भीतर के जलते हुए ज्वालामुखी को एक ठंडी राख में बदल दिया. उसके हाथ कांपने लगे. उसे महसूस हुआ कि उसके ठीक पीछे कोई खडा है, जिसकी सांसों में वफादारी नहीं, बल्कि सडते हुए सपनों और धोखे की बदबू है.
भाग दो: बलरामपुर का वो विषैला साया
दरवाजा पूरी तरह खुलता है. सामने खडी है' वह' उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले की उन गलियों से आई वह औरत, जिसने कभी इकबाल के नाम का सिंदूर लगाया था और फिर उसी सिंदूर से उसकी बर्बादी की इबारत लिखी थी. उसके चेहरे पर वही कुटिल मुस्कान है जिसे देखकर कभी इकबाल का दिल धडकता था, पर आज रूह कांप रही है.
भाग तीन: AK Service' की असली कातिल
उसकी आवाज गूँजती है, इकबाल, मुंबई की सडकों पर हाथ- गाडी खींचते- खींचते तुम बलरामपुर का वो रूतबा भूल गए? यह वही औरत है जिसने इकबाल के हँसते- खेलते' AK Service' के साम्राज्य को अपने लालच और गद्दारी से राख कर दिया था. वह सिर्फ एक धोखेबाज पत्नी नहीं, वह इकबाल के वजूद को दीमक की तरह चाटने वाली एक रूहानी परजीवी है.
भाग चार: मनोवैज्ञानिक पासा (The Mind Trap)
उसकी आँखों में देखते ही इकबाल को अपना सबकॉन्शियस माइंड (अचेतन मन) बिखरता हुआ महसूस होता है. मानव विज्ञान कहता है कि इंसान अपने सबसे बडे' ट्रॉमा' के सामने फिर से वही बेबस इंसान बन जाता है. इकबाल आज फिर वही लाचार पत्रकार है, जिसके सामने उसकी तबाही का मंजर बलरामपुर की धूल की तरह उडने लगा है.
भाग पाँच: जुबेदा का खौफनाक सच
वह औरत जुबेदा की तरफ मुडती है और एक शैतानी हंसी हंसती है. जुबेदा, तुम तो सिर्फ एक जरिया थीं. इकबाल को इस सगाई वाले घर तक लाने का रास्ता मैंने बलरामपुर से ही साफ किया था. ताकि मैं उसे उस मुकाम पर टूटते देख सकूँ जहाँ से वह कभी खडा न हो सके।
भाग छह: डिजिटल मतिभ्रम (Psychological Trauma)
इकबाल को अचानक हॉल की दीवारों पर' AK Service' के पुराने जलते हुए दस्तावेज और राख होते कैमरे दिखने लगते हैं. यह उसका मतिभ्रम (Hallucination) है या हकीकत? वह अपने कान बंद कर लेता है, लेकिन उस औरत की फुसफुसाहट उसके दिमाग की नसों के अंदर हथौडे चला रही है.
भाग सात: वह गद्दार चेहरा
वह औरत धीरे- धीरे करीब आती है. उसके हाथों में वही कंगन हैं जो इकबाल ने अपनी पहली बडी पत्रकारिता की कमाई से बलरामपुर के बाजार से खरीदे थे. वह उन्हें खनकाती है और कहती है, इन्हीं कंगनों की खनक ने तुम्हें तबाह किया था इकबाल, और आज यही तुम्हारी मौत का संगीत बजाएंगी।
भाग आठ: यादों का कब्रिस्तान
हॉल में मौजूद मेहमान अब इंसान नहीं, बल्कि हिलते हुए साये लग रहे हैं. फरहान और जुबेदा का भाई उस औरत के पीछे छुप जाते हैं. ऐसा लगता है जैसे इस औरत ने बलरामपुर से लेकर मुंबई तक सबको अपने तंत्र- जाल में बांध लिया है.
भाग नौ: बाइनरी आक्रोश का पतन
इकबाल का' डिजिटल गुस्सा' अब शांत हो रहा है. उसे अपने कानों में एक पुराने टाइपराइटर की आवाज सुनाई देती है. उसे लगता है कि कोई उसकी जिंदगी की कहानी को लाइव डिलीट (Delete) कर रहा है. उसकी पहचान अब एक' ERROR चार सौ चार: IDENTITY NOT FOUND' में तब्दील हो रही है.
भाग दस: बलरामपुर का वो काला अध्याय
वह औरत अपने बैग से एक पुरानी पीली पड चुकी फाइल निकालती है. यह वही फाइल है जिसमें इकबाल के पत्रकारिता के दिनों के वो राज दफन हैं जिन्हें उजागर करने पर बलरामपुर से लखनऊ तक की राजनीति हिल सकती थी. वह कहती है, तुमने अपनी इज्जत की फाइल दिखाई, अब मेरी गद्दारी का वो सबूत देखो जिसे तुम कभी ढूंढ नहीं पाए!
भाग ग्यारह: भाई का विश्वासघात
वह औरत एक ऐसा राज खोलती है जो इकबाल के सीने में खंजर की तरह उतर जाता है. तुम्हारा वो भाई जो तुम्हें आज सपोर्ट कर रहा है? वह बलरामपुर में मेरे साथ मिला हुआ था इकबाल. AK Service' की राख पर उसने भी अपना भविष्य बनाया था।
भाग बारह: रूहानी कत्लेआम की शुरुआत
इकबाल का चेहरा अब सफेद पड चुका है. सदमे (Shock) की यह चरम अवस्था है जहाँ शरीर पत्थर बन जाता है पर दिमाग के अंदर यादों का तेजाब उबलता रहता है. वह चीखना चाहता है, पर बलरामपुर की वो धूल उसके गले में फंस गई है.
भाग तेरह: जुबेदा की आँखों में बदलता जहर
जुबेदा अब कांप नहीं रही, बल्कि उस औरत के साथ खडी होकर एक अजीब सी नफरत भरी नजर से इकबाल को देख रही है. इकबाल, तुमने सोचा था तुम बदला लोगे? तुम तो खुद एक ऐसी शतरंज के मोहरे हो जिसका अंत बलरामपुर की गलियों में ही लिख दिया गया था।
भाग चौदह: रूह का विभाजन (The Split Personality)
हॉल के कांच में इकबाल को अपने दो रूप दिखते हैं. एक वह जो मशाल लेकर बदला लेना चाहता है, और दूसरा वह बलरामपुर का पत्रकार जो अपनी पत्नी के पैरों में गिरकर वफा की भीख मांग रहा है. उसकी शख्शियत के टुकडे- टुकडे हो रहे हैं.
भाग पंद्रह: अंधेरे का जादू
हॉल की लाइटें फिर से टिमटिमाती हैं. उस औरत की छाया दीवार पर किसी खौफनाक दानव की तरह फैलती जा रही है. वह कहती है, तुमने खुद को' किस्मत का मालिक' कहा था? आज देखो, तुम्हारी किस्मत बलरामपुर की सडकों पर लावारिस पडी है।
भाग सोलह: सस्पेंस का खूनी मोड
अचानक पूरे हॉल में एक छोटे बच्चे के सिसकने की आवाज आती है. वह आवाज इकबाल के रोंगटे खडे कर देती है. क्या यह वही बच्चा है जिसे बलरामपुर के मलबे में वह मरा हुआ मान चुका था? क्या इस औरत ने उसे भी अपनी साजिश का हिस्सा बनाया?
भाग सत्रह: यादों का श्मशान
इकबाल को मुंबई की वो हाथ- गाडी याद आती है जिसे खींचते- खींचते उसके कंधों से खून निकलता था. वह अपनी उंगलियों को दांतों से काटता है ताकि यह पक्का कर सके कि यह हकीकत है. दर्द असली है, और यह औरत भी.
भाग अठारह: वह अजनबी और आखिरी चाल
वह अजनबी शख्स, जिसने इकबाल को रोका था, अब उस औरत के पास जाकर खडा होता है. काम हो गया मालकिन, इकबाल की मानसिक स्थिति अब उसे पागलखाने भेजने के लिए काफी है।
भाग उन्नीस: मौत का आखिरी पैंतरा
इकबाल फिर से खडा होने की कोशिश करता है. उसकी आँखों में अब आक्रोश नहीं, बल्कि एक शून्य है. वह मशाल उठाता है, लेकिन इस बार वह हॉल को नहीं, बल्कि खुद को उस औरत के अतीत से जलाना चाहता है.
भाग बीस: शून्य की ओर वापसी
जैसे ही इकबाल कदम बढाता है, उसे महसूस होता है कि हॉल की जमीन गायब हो गई है. वह खुद को बलरामपुर के उसी मलबे के सामने खडा पाता है. क्या यह मुंबई का सफर, यह सगाई, यह जुबेदा. सब कुछ सिर्फ एक पागल पत्रकार के दिमाग की उपज थी?
लेखक का नोट (The Psychological Hook):
" अध्याय बारह ने आपके अंतर्मन को झकझोर दिया होगा. बलरामपुर की वह औरत क्या हकीकत है या इकबाल के टूटे हुए मन का सबसे बडा खौफ? असली शतरंज की बिसात तो अब बिछी है, जहाँ अपने ही कातिल निकले।
. अंतिम चेतावनी (रात बारह: शून्य बजे का महा- धमाका):
" तैयार रहिये अध्याय तेरह के लिए, जो ठीक रात बारह: शून्य बजे आपके होश फाख्ता कर देगा. तेरहवां अध्याय उस रहस्य की परतें खोलेगा जिसे सुनकर आपकी रूह फना हो जाएगी. क्या इकबाल उस' धोखेबाज औरत' को खत्म कर पाएगा या बलरामपुर का वो अतीत उसे खुद निगल जाएगा? बारह: शून्य बजे वाली किश्त में वह' बच्चा' सामने आएगा जिसकी एक झलक के लिए इकबाल ने अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगा दी. सावधान! अगली किश्त आपकी रातों की नींद छीन लेगी!
(क्रमशः)
लेखक की रूहानी पुकार:
दोस्तों, 'IJ अधूरा प्यार' की इस खौफनाक दास्तान में आप भी मेरे साथ उस अंधेरे में भटक रहे हैं, जहाँ इकबाल को ढूंढना नामुमकिन सा लगता है। क्या आप वाकई इकबाल तक पहुँच पाएंगे? सच कहूँ तो, मुझे भी नहीं लग रहा था... लेकिन हार मान लेना इकबाल की फितरत नहीं है।
मैंने आप सभी के लिए एक रास्ता खोल दिया है। जो लोग इस खौफ के सफर में मेरे साथ लाइव रूबरू होना चाहते हैं और जानना चाहते हैं कि इकबाल इस दास्तान में आगे क्या भुगतने वाला है, वे अभी फेसबुक पर सर्च करें— 'IJ Adhura Pyaar'।
देखते हैं, आपमें से कितने लोग मुझे वहां ढूँढ पाते हैं! क्या आप तैयार हैं इस डिजिटल पहेली को सुलझाने के लिए? मैं फेसबुक के उस पन्ने पर आपका इंतज़ार कर रहा हूँ, जहाँ सस्पेंस का असली चेहरा दिखेगा।