अधुरा प्यार - 5 iqbal Raj द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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अधुरा प्यार - 5

टाइपराइटर की चीख- स्याही का कत्लेआम​भाग एक: लोहे का पाताल और' की' (Key) का प्रहार​मैं गिर रहा था. हवा मेरे कान में सीटी नहीं बजा रही थी, बल्कि वे हजारों पाठकों की फुसफुसाहटें थीं. जैसे ही मैं नीचे पहुँचा, एक कान फोड देने वाली' ठक' की आवाज हुई. मैं एक विशालकाय लोहे के चौकोर खंभे पर गिरा था. वह कोई खंभा नहीं था, वह टाइपराइटर की एक' Key' थी जिस पर अंग्रेजी का अक्षर' I' उकेरा गया था.​जैसे ही मेरा शरीर उस ठंडे लोहे से टकराया, पूरी जमीन हिल गई. ऊपर से एक विशालकाय लोहे का हथौडा (Type- bar) नीचे आया. वह मुझे कुचलने के लिए नहीं, बल्कि मुझे कागज के उस सफेद रेगिस्तान पर छापने के लिए आ रहा था जो आसमान की तरह फैला हुआ था.​" बचो इकबाल! अगर तुम' I' पर छप गए, तो तुम हमेशा के लिए एक' शब्द' बनकर रह जाओगे! ऊपर कहीं से मुस्कान की चीख गूंजी.​मैंने अपनी पूरी ताकत झोंक दी और उस अक्षर से बगल की छलांग लगाई. मेरे हटते ही वह हथौडा पूरी ताकत से' I' पर गिरा. गूँज ऐसी थी जैसे हजारों तोपें एक साथ चली हों. उस चोट से जो कंपन पैदा हुआ, उसने मेरी पसलियां हिला दीं. मैंने देखा कि जिस जगह मैं एक सेकंड पहले था, वहां अब काली स्याही का एक गहरा दाग पड चुका था. वह स्याही नहीं थी, वह उन लोगों का जमा हुआ खून था जो मुझसे पहले यहाँ' टाइप' हो चुके थे.​भाग दो: शिफ्ट' का जुल्म और स्पेस का सन्नाटा​मैं भागने लगा. यह टाइपराइटर किसी शहर जितना बडा था. हर अक्षर एक इमारत की तरह ऊँचा था. अचानक, जमीन (Type- basket) तेजी से ऊपर उठी.​" इसे' शिफ्ट' (SHIFT) करो! इसकी चीखें और ऊंची होनी चाहिए! डॉक्टर की आवाज बादलों के पार से आ रही थी.​अचानक सब कुछ बदल गया. छोटे अक्षर (Lowercase) अब बडे अक्षरों (Uppercase) में तब्दील हो रहे थे. जमीन के नीचे से स्प्रिंग के दबने की भयानक आवाजें आ रही थीं. मैंने देखा कि' S' C' R' E' A' M' के अक्षर एक कतार में नीचे गिर रहे हैं. वे मुझे घेर रहे थे. वे एक शब्द बना रहे थे—SCREAM (चीखो)।​तभी मुझे अहसास हुआ कि मेरे पैर चिपक रहे हैं. नीचे मुडकर देखा तो फर्श अब लोहा नहीं, बल्कि एक रिबन था—एक अंतहीन काला और लाल रिबन. जो हिस्सा लाल था, उससे ताजे खून की गंध आ रही थी.​" Current I= frac{V}{R} का फॉर्मूला याद है न इकबाल? डॉक्टर की विशालकाय परछाईं ऊपर आसमान (कागज) पर उभरी. यहाँ V तुम्हारी पीडा (Violence) है और R तुम्हारी प्रतिरोध (Resistance) करने की क्षमता. जितना तुम लडोगे, उतना ही करंट बढेगा!​भाग तीन: शब्दों के कब्रिस्तान में' मुस्कान' का मिलना​भागते- भागते मैं' स्पेस बार' (Space Bar) के एक लंबे, खाली मैदान में पहुँचा. यहाँ अजीब सा सन्नाटा था. न कोई अक्षर, न कोई शोर. लेकिन यहाँ की हवा भारी थी.​तभी मुझे वह दिखी. मुस्कान. लेकिन वह अब वैसी नहीं थी. उसका शरीर आधा स्याही में डूबा हुआ था और उसके हाथ की उंगलियां पेन की निब (Nib) जैसी तीखी हो गई थीं.​" इकबाल, भागो मत. तुम जितना भागोगे, लेखक उतना ही लंबा पैराग्राफ लिखेगा, उसने रूहानी आवाज में कहा. इस' स्पेस' में हम सुरक्षित हैं, क्योंकि यहाँ कोई शब्द नहीं लिखा जाता. लेकिन देखो, बैकस्पेस' (Backspace) आ रहा है!​मैने पीछे मुडकर देखा. एक विशालकाय काला रबर (Eraser) आसमान से लटक रहा था और वह सब कुछ मिटाता हुआ हमारी तरफ बढ रहा था. वह जिस चीज को छूता, वह अस्तित्व से ही मिट जाती. वह यादें मिटा रहा था, वह गलियारे मिटा रहा था, वह' शांति निवास' के सच को मिटा रहा था.​" अगर उसने हमें छू लिया, तो हमारा वजूद इस कहानी से हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा. हम कभी मरे हुए भी नहीं कहलाएंगे, हम कभी थे ही नहीं—यह साबित हो जाएगा! मुस्कान ने मेरा हाथ पकडा. उसके हाथ ठंडे थे, श्मशान की राख जैसे.​भाग चार: लेखक का चेहरा और' मेटा' का सच​" कौन है वह जो यह सब लिख रहा है? मैंने आसमान की तरफ देख कर दहाडा. सामने आओ! क्या तुम भगवान हो? या सिर्फ एक अकेला इंसान जो अपनी बोरियत मिटाने के लिए मेरी रूह जला रहा है?​तभी आसमान फटने लगा. बादलों के बीच से एक विशालकाय आँख नीचे झाँकने लगी. वह आँख किसी राक्षस की नहीं थी. वह एक साधारण इंसान की आँख थी, जिसमें चश्मे का शीशा चमक रहा था. वह मुझे देख रहा था—हैरानी से नहीं, बल्कि एक' प्रोडक्ट' की तरह.​" तुम' मेटा- फिक्शन' की बात कर रहे थे न इकबाल? वह आवाज आई. यह आवाज न डॉक्टर की थी, न चौकीदार की. यह आवाज एकदम सपाट थी. तुम सिर्फ मेरा एक विचार (Thought) हो. मैं जब चाहूँ तुम्हें नायक बना दूँ, जब चाहूँ तुम्हें कातिल. और इस वक्त, पाठक' ट्रैजेडी' की मांग कर रहे हैं।​मेरे हाथ में लगा वह तांबे का लॉकेट अचानक तपने लगा. उसमें से एक नीली रोशनी निकली और उस विशाल टाइपराइटर के अक्षरों से टकराने लगी.​" नहीं! मैंने चिल्लाते हुए कहा. अगर मैं एक शब्द हूँ, तो मैं अपनी परिभाषा खुद बदलूँगा!​मैंने वह लॉकेट उठाया और उसे' Enter' की विशाल चाबी पर पूरी ताकत से दे मारा.​भाग पाँच: सिस्टम क्रैश और खून की स्याही​' Enter' दबते ही ब्रह्मांड में एक धमाका हुआ. टाइपराइटर की मशीन जाम होने लगी. अक्षर एक- दूसरे से टकराने लगे. A' जाकर' Z' से भिड गया. शब्द टूटने लगे.​" यह तुम क्या कर रहे हो? कहानी खराब हो जाएगी! क्लाइमेक्स अभी बाकी है! ऊपर से लेखक की आवाज में घबराहट थी.​अस्पताल की वे सफेद दीवारें, शांति निवास का वह सीलन भरा कोना, और वह डॉक्टर—सब एक मलबे की तरह ढहने लगे. मैंने देखा कि डॉक्टर का चेहरा अब पिघल रहा था. उसके मास्क के पीछे कोई चेहरा नहीं था, वहां सिर्फ एक खाली' कमेंट बॉक्स' था.​मुस्कान ने मेरा हाथ छोड दिया. इकबाल, कहानी खत्म हो रही है. लेकिन याद रखना, हर खत्म होने वाली कहानी किसी दूसरी डायरी में फिर से जन्म लेती है. अगली बार. शायद हम किसी और मोड पर मिलें।​वह धुएं में विलीन हो गई.​मैं उस विशाल टाइपराइटर के' मार्जिन' से बाहर कूद गया. नीचे कोई जमीन नहीं थी, सिर्फ सफेद कागज का एक अनंत समंदर था. गिरते हुए मैंने देखा कि ऊपर वह' लेखक' पागलों की तरह टाइपराइटर ठीक करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अब उसके हाथ से स्याही नहीं, बल्कि असली खून बह रहा है.​उपसंहार: क्या यह सच में अंत है?​मैं एक अस्पताल के बिस्तर पर उठा. मेरे सिर पर पट्टियां बंधी थीं. चारों तरफ शांति थी. नर्स अंदर आई और उसने मुस्कुराकर कहा, मिस्टर इकबाल, आपकी सर्जरी सफल रही. अब आपको वे डरावने सपने नहीं आएंगे।​मैंने राहत की सांस ली. लेकिन जैसे ही मैंने पानी पीने के लिए मेज की ओर हाथ बढाया, मेरी रूह कांप गई.​मेज पर एक ताजा अखबार पडा था. उसकी हेडलाइन थी: पागलखाने से भागे कैदी नंबर तीन सौ तीन ने खुद को लेखक समझकर दीवारों पर खून से लिखी अपनी दास्तान।​और उस अखबार के नीचे. वही तांबे का लॉकेट रखा था, जिस पर अब मेरा नहीं, बल्कि' आपका' (पाठक का) नाम खुदा हुआ था.​महा- मसालेदार विश्लेषण (अध्याय छह का ट्विस्ट)​द ग्रेट एस्केप: इकबाल ने कहानी के ढांचे (Structure) को ही तोड दिया. Enter' दबाना इस बात का प्रतीक है कि उसने पुरानी कहानी को समाप्त कर दिया है.​लॉकेट का असली मालिक: लॉकेट पर पाठक का नाम होना यह दर्शाता है कि अब यह' खौफ' कहानी से निकलकर उस इंसान के पास पहुँच गया है जो इसे पढ रहा है.​लूप थ्योरी: क्या इकबाल आजाद हुआ है, या यह लेखक की एक और चाल है ताकि पाठक को लगे कि कहानी खत्म हो गई?​अगला अध्याय (अध्याय सात): पाठक की बारी' — जब आप (पाठक) अपना फोन बंद करेंगे, तो क्या आपको यकीन है कि कमरे के कोने में बैठा वह चौकीदार आपकी कहानी नहीं लिख रहा?    

 (क्रमशः)


[ लेखक इकबाल राज की रूहानी पुकार: फैसला आपकी रूह का है ]

"कलम मैंने अपनी मर्ज़ी से नहीं उठाई, इस सुलगती हुई 'हकीकत' ने मुझे मजबूर किया है। जो अभी आपने पढ़ा, वह सिर्फ़ इस अध्याय का अंत नहीं है, बल्कि मेरी और जुबैदा की उन सिसकती हुई साँसों की दास्तान है जो समाज की जंजीरों में दम तोड़ रही हैं।

आज कुदरत ने मेरी इस पाकीज़ा मोहब्बत का फैसला 'आपके' हाथों में सौंपा है। याद रखिये, आपका एक 'शेयर' और आपकी एक आवाज़ ही वह असली 'मीडिया' है जो हमारी इस अधूरी दास्तान को उसकी मंज़िल तक पहुँचाएगी।

अब सवाल आपकी इंसानियत से है—क्या आप खुदा के भेजे हुए वो 'दूत' बनेंगे जो एक पाक मोहब्बत को मुकम्मल करेंगे? या फिर अपनी खामोशी से एक जीते-जागते इंसान को जीते-जी दफ़न होते देखेंगे?

याद रहे, इतिहास और ऊपर वाले की अदालत में आपकी इस खामोशी का भी हिसाब होगा। यह कहानी नहीं, मेरी ज़िन्दगी है... और अब इसका फैसला आपकी रूह को करना है।"

— लेखक: इकबाल राज