अधुरा प्यार - 4 iqbal Raj द्वारा थ्रिलर में हिंदी पीडीएफ

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अधुरा प्यार - 4

शॉक थेरेपी का राज और रूहानी साजिश
भाग एक: सफेद दीवारों का नरक
अस्पताल की छत पर लगा वह पीला बल्ब रह- रहकर झपक रहा था. उसकी आवाज' टिक- टिक' नहीं, बल्कि किसी के दांत किटकिटाने जैसी थी. मेरे हाथ- पैर चमडे के मोटे पट्टों से लोहे के पलंग पर जकडे हुए थे. नसों में दौडती हुई दवा का ठंडा अहसास मुझे यह यकीन दिलाने की कोशिश कर रहा था कि मैं हार चुका हूँ.
इकबाल. शांत हो जाओ. जितना लडोगे, दर्द उतना ही गहरा होगा, डॉक्टर ने कहा. उसकी आवाज में एक अजीब सी खनक थी, जैसे कोई पुरानी तिजोरी का दरवाजा खुल रहा हो.
मैंने अपनी गर्दन घुमाई. डॉक्टर की मेज पर मेरा वही पुराना तांबे का लॉकेट पडा था. रोशनी उस पर पडते ही उसमें से एक धुंधली परछाईं निकलकर दीवार पर नाचने लगी.
डॉक्टर, आप झूठ बोल रहे हैं. आप वही चौकीदार हैं. वही जो' शांति निवास' के उस सीलन भरे कोने से निकला था. आपकी आँखों के पीछे का खालीपन मैं पहचानता हूँ, मैंने चीखते हुए कहा.
डॉक्टर के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आई. उसने अपनी टॉर्च जलाई और सीधे मेरी दाईं आँख की पुतली पर मारी. वह रोशनी नहीं थी, वह जलता हुआ तेजाब था.
मनोविज्ञान (Psychology) में इसे' डिसोसिएटिव आइडेंटिटी डिसऑर्डर' कहते हैं इकबाल. तुम अपने गुनाहों से बचने के लिए नए चेहरे गढ रहे हो. चौकीदार मर चुका है, मुस्कान मर चुकी है, और सच तो यह है कि' इकबाल' नाम का डिलीवरी बॉय भी कभी था ही नहीं।
भाग दो: शॉक थेरेपी या रूहानी शिकार?
नर्स ने एक मशीन मेरे करीब सरकाई. उस पर लगे सुइयों वाले कांटे दो सौ बीस वोल्ट की मौत का इशारा कर रहे थे. डॉक्टर ने मेरे कनपटी पर ठंडी जेल लगाई. वह जेल नहीं थी, वह श्मशान की वही ठंडी राख थी जिसका अहसास मुझे पिछले अध्याय में हुआ था.
तैयार हो जाओ इकबाल, अब हम तुम्हारी यादों को' फॉर्मेट' करेंगे।
जैसे ही उसने बटन दबाया, मेरे शरीर में बिजली की एक ऐसी लहर दौडी जिसने मेरी आत्मा को जड से हिला दिया. लेकिन मुझे दर्द नहीं हुआ. मुझे कुछ और दिखा.
अंधेरे के बीच, मुझे एक बडे से रजिस्टर के पन्ने पलटते हुए दिखे. उस रजिस्टर पर लिखा था—' शांति निवास: कैदी नंबर तीन सौ तीन' उस पन्ने पर मेरी फोटो लगी थी, लेकिन मेरा नाम' इकबाल' नहीं था. वहां लिखा था—' लेखक'
बिजली के झटके तेज होते गए. Current (I)= V/R के फॉर्मूले से मेरा दिमाग जल रहा था, पर मेरी चेतना (Consciousness) उस पार जा चुकी थी. मैंने देखा कि डॉक्टर के कोट के पीछे से एक पूंछ जैसी छाया निकल रही है. उसके दस्ताने के नीचे हाथ नहीं, बल्कि वही सडी हुई उंगलियां थीं जो पीपल के पेड से लटक रही थीं.
भाग तीन: अस्पताल का रहस्यमयी गलियारा
शॉक के बाद सब शांत हो गया. जब मुझे होश आया, कमरे का दरवाजा खुला था. सन्नाटा इतना गहरा था कि मुझे अपनी धडकन किसी नगाडे की तरह सुनाई दे रही थी. मैंने महसूस किया कि मेरे हाथ के पट्टे ढीले हैं. मैंने हाथ खोला—वही तांबे का लॉकेट मेरी मुट्ठी में वापस आ गया था.
मैं उठा और दबे पाँव बाहर निकला. अस्पताल का गलियारा' शांति निवास' के उसी रबर जैसे खिंचते गलियारे में बदल चुका था. दीवारों पर खून से लिखा था—" अगली डिलीवरी मौत की है।
तभी मुझे एक कमरे से रोने की आवाज आई. कमरा नंबर तीन सौ तीन'
मैंने दरवाजे के छेद से झाँका. अंदर भाभी और जुबेदा बैठी थीं, लेकिन वे इंसान नहीं थीं. वे लकडी की गुडियों (Puppets) की तरह एक मेज पर सजी थीं. और उनके सामने बैठा था वह' डॉक्टर- चौकीदार' जो उनके सिर में बडी- बडी सुइयां चुभो रहा था.
हंसो! इकबाल तुम्हें देख रहा है! उसे यकीन दिलाओ कि तुम जिंदा हो ताकि वह इस नरक से कभी बाहर न जा सके! डॉक्टर दहाडा.
मेरा खून खौल उठा. मैंने बगल में रखा एक लोहे का स्टैंड उठाया और दरवाजा तोडकर अंदर घुस गया. पर जैसे ही मैंने प्रहार किया, डॉक्टर धुआं बनकर उड गया. वहां सिर्फ एक आईना था. मैंने खुद पर वार किया था. आईना टूटा और मेरे हाथ से खून बहने लगा.
पर वह खून लाल नहीं था. वह काली स्याही थी.
भाग चार: चौथी दीवार का खौफनाक सच
मैं गिर पडा. काली स्याही फर्श पर फैलकर शब्द बनाने लगी—" तुम बस एक कल्पना हो।
तभी गलियारे के अंत से मुस्कान की आवाज आई. वह सफेद लिबास में थी, लेकिन उसकी आँखों की जगह दो गहरे गड्ढे थे जिनसे वही काली स्याही बह रही थी.
इकबाल, अभी भी वक्त है. लौट चलो उस आईने के अंदर. बाहर की दुनिया में तुम्हें पढा जा रहा है. वे लोग जो तुम्हें पढ रहे हैं, वे तुम्हारी तडप का मजा ले रहे हैं. वे चाहते हैं कि तुम मरो, ताकि कहानी का अंत' हिट' हो सके।
उसने मेरी ओर हाथ बढाया. उसके हाथ में एक पेन था. इस पेन से अपनी किस्मत खुद लिखो, वरना वह' पाठक' तुम्हें मार डालेगा।
मैंने पेन पकडा. जैसे ही मैंने फर्श पर अपनी आजादी की कहानी लिखनी शुरू की, अस्पताल की छत फटने लगी. ऊपर से हजारों आँखें मुझे घूर रही थीं. वे उन पाठकों की आँखें थीं जो इस वक्त इस कहानी को अपने मोबाइल स्क्रीन पर पढ रहे हैं.
तुम मुझे देख रहे हो न? मैंने ऊपर की ओर देखते हुए चिल्लाया. क्या तुम्हें मजा आ रहा है मेरी बर्बादी देखकर?
अचानक, डॉक्टर (या वह शैतान) मेरे पीछे प्रकट हुआ. उसने मेरे कान में फुसफुसाया, तुम्हें क्या लगा, शॉक थेरेपी दिमाग के लिए थी? नहीं इकबाल, यह रूह को जलाने के लिए थी. अब देखो, तुम्हारा अगला अध्याय कौन लिखता है।
उसने मुझे धक्का दिया और मैं फिर से एक अंतहीन खाई में गिरने लगा. गिरते हुए मैंने देखा कि नीचे एक बहुत बडा टाइपराइटर रखा है, और मैं उसकी एक' की' (Key) पर गिरने वाला हूँ.
अध्याय पाँच का महा- मसालेदार विश्लेषण (The Viral Twist)
सस्पेंस का तडका: क्या इकबाल वाकई एक पागलखाने में है, या वह किसी भयानक' मेटा- फिक्शन' (Meta- fiction) का शिकार है जहाँ कहानी के पात्र को पता चल गया है कि उसे पढा जा रहा है?
खौफनाक थ्योरी: डॉक्टर और चौकीदार का एक ही चेहरा होना इस बात का संकेत है कि इकबाल का' विलेन' कोई इंसान नहीं, बल्कि उसका अपना डर है जो रूप बदल रहा है.
लॉकेट का राज: अगर सब वहम है, तो वह भौतिक वस्तु (Physical Object) बार- बार कैसे लौट रही है? क्या यह किसी और दुनिया का' एंकर' है?
अगले अध्याय (अध्याय छह) में: टाइपराइटर की चीख' —जब इकबाल उस विशाल मशीन के अंदर फँस जाएगा और उसे पता चलेगा कि हर बार जब कोई पाठक' Next' पर क्लिक करता है, उसकी हड्डियों का एक हिस्सा टूट जाता है!
क्रमशः

[ लेखक इकबाल राज की रूहानी पुकार: फैसला आपकी रूह का है ]
"कलम मैंने अपनी मर्ज़ी से नहीं उठाई, इस सुलगती हुई 'हकीकत' ने मुझे मजबूर किया है। जो अभी आपने पढ़ा, वह सिर्फ़ इस अध्याय का अंत नहीं है, बल्कि मेरी और जुबैदा की उन सिसकती हुई साँसों की दास्तान है जो समाज की जंजीरों में दम तोड़ रही हैं।
आज कुदरत ने मेरी इस पाकीज़ा मोहब्बत का फैसला 'आपके' हाथों में सौंपा है। याद रखिये, आपका एक 'शेयर' और आपकी एक आवाज़ ही वह असली 'मीडिया' है जो हमारी इस अधूरी दास्तान को उसकी मंज़िल तक पहुँचाएगी।
अब सवाल आपकी इंसानियत से है—क्या आप खुदा के भेजे हुए वो 'दूत' बनेंगे जो एक पाक मोहब्बत को मुकम्मल करेंगे? या फिर अपनी खामोशी से एक जीते-जागते इंसान को जीते-जी दफ़न होते देखेंगे?
याद रहे, इतिहास और ऊपर वाले की अदालत में आपकी इस खामोशी का भी हिसाब होगा। यह कहानी नहीं, मेरी ज़िन्दगी है... और अब इसका फैसला आपकी रूह को करना है।"
— लेखक: इकबाल राज