षड्यंत्र - भाग 14 Ratna Pandey द्वारा क्राइम कहानी में हिंदी पीडीएफ

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षड्यंत्र - भाग 14

अभी तक आपने पढ़ा कि बसंती लगातार रितु की देखभाल करती रही, क्योंकि उसे डर था कि बेटी कहीं कुछ गलत कदम न उठा ले। वहीं किशन नफ़रत और बदले की आग में डूबा गुमसुम रहने लगा। एक रात उसने अपने दोस्तों को बुलाकर बीना से बदला लेने की योजना बनाई, ताकि उसे उसके किए की सज़ा मिल सके। अब इसके आगे पढ़ें-

किशन अपने दोस्तों के साथ ऊपर गया है, यह बात घर में कोई नहीं जानता था। लेकिन किशन जिस समय  रितु के कमरे में आया था, वह बंद आंखों से जाग रही थी। उसने देख लिया था कि किशन उसे देखने आया है। इस बात को साधारण बात समझकर रितु ने ध्यान नहीं दिया क्योंकि उसे देखने के लिए अक्सर बसंती कमरे में आया करती थी । किंतु आज किशन को देखकर रितु को कुछ संदेह हुआ। तब कुछ ही पलों के बाद रितु किशन के कमरे में गई। उसने देखा तो किशन वहाँ नहीं था। रितु का माथा ठनका कि इतनी रात को वह कहाँ गया होगा?

उसने धीरे से दरवाज़ा खोला तो उसे छत से धीमी-धीमी आवाजें आ रही थीं। वह दबे पांव ऊपर गई और उनकी सारी बातें उसने सुन लीं।

जिस समय किशन यह कह रहा था कि "उसे तो मैं बर्बाद कर दूंगा, तभी मुझे सुकून मिलेगा," यह सुनते ही रितु ऊपर सबके सामने आ गई।

उसने किशन के गाल पर लगातार एक, दो, तीन, चार तमाचे मारने शुरू कर दिए। वह जब तक थक नहीं गई, उसका हाथ चलता रहा। सारे दोस्त खड़े-खड़े बर्फ की सिला के समान जम गए और किशन समझ गया कि जीजी ने सब सुन लिया है। वह चांटे खाता रहा और आंसू बहाता रहा।

थकने के बाद रितु ने कहा, " क्या करने का सोच रहा है तू? वही जो उन पापियों ने किया? अरे, उन्होंने तो अपनी माँ की कोख को लजा दिया है। एक स्त्री के सतीत्व को घायल किया है। उनका पाप दुनिया का सबसे नीच और सबसे घृणित पाप है और तू ...? तू वही करने की योजना बना रहा है? देख नहीं रहा, ऐसी स्त्री जिसके साथ ऐसा होता है, वह कैसी हो जाती है? जीते जी मर जाती है, हर पल शर्मिंदगी महसूस करती है। वह पल बार-बार दिमाग़ के पटल पर आ जाते हैं। भूलना चाहकर भी नहीं भूल पाती। मरने को जी चाहता है। वे सब तो नर्क में जाएंगे ही जाएंगे, लेकिन तू? तूने यह कैसे सोच लिया मेरे भाई? कहाँ गए हमारे संस्कार जो माँ ने तुझे दिए थे? अपनी बहन के साथ सबकी बहनों की रक्षा करना। अरे, वह भी किसी की बहन-बेटी है। क्या गुजर रही है अम्मा-बाबूजी के सीने में, तू देख ही रहा है। क्या गुजर रही है तेरी बहन पर, यह भी तू देख रहा है और क्या गुजर रही है तेरे ऊपर, यह भी तू जानता है। क्यों एक और परिवार को इस बर्बादी के दलदल में फेंकना चाहता है किशन, क्यों? "

रात के इस सन्नाटे में इस समय केवल रितु की ही आवाज़ आ रही थी। इस समय उसका गुस्सा चरमोत्कर्ष पर था।

एक गहरी साँस लेते हुए उसने फिर कहा, " किशन मेरे भाई, तेरे ऐसा करने से मेरा तो कोई फायदा नहीं होगा। मेरे साथ तो जो होना था, वह हो गया। लेकिन किसी और लड़की के साथ ऐसा कभी न हो, मैं अपनी अंतिम सांस तक भगवान से यही प्रार्थना करूंगी, समझा? मत कर मेरे भाई ऐसा मत कर। "

इसके बाद रितु ने किशन के दोस्तों की तरफ़ देखते हुए कहा, "और तुम? तुम सब भी तैयार हो गए? तुम्हें तो किशन को समझाना चाहिए था।"

इस समय किशन तो कुछ कहने की हालत में नहीं था।

तब हिम्मत करके राहुल ने कहा, "जीजी, पहले हमारी पूरी बात तो सुन लो।"

"क्या सुन लूं, राहुल? क्या सुन लूं? सुनकर ही तो यहाँ आई हूँ। वह तो अच्छा हुआ ... मैं जाग रही थी। वरना तुम सब तो पता नहीं क्या कर डालते और उन्हीं की तरह राक्षस बन जाते।"

✍️ रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः