अभी तक आपने पढ़ा कि पंकज ने रितु को दिलासा देते हुए कहा कि वह हमेशा उसका साथ देगा और उसे इस दर्द से बाहर निकालेगा। रितु अभी भी टूट चुकी थी और पंकज को स्वीकार नहीं कर पा रही थी, लेकिन उसका परिवार पंकज की मौजूदगी को सहारा मान रहा था। डॉक्टर ने चेतावनी दी कि रितु की मानसिक स्थिति नाज़ुक है और परिवार को उसे आत्महत्या से बचाने के लिए हर पल ध्यान रखना होगा, साथ ही पंकज का साथ उसके लिए बहुत सहायक साबित हो सकता है। अब इसके आगे पढ़ें-
डॉक्टर से बात करने के बाद किशन ने अपने पापा से कहा, "पापा, डॉक्टर ने कहा है कि जीजी को एक हफ़्ते बाद चैकअप के लिए लाना होगा। इसलिए अभी हम गाँव नहीं जाएंगे। हम लोग यहीं एक कमरा किराए पर ले लेते हैं।"
रमन ने कहा, "हाँ, ठीक है बेटा, हमें ऐसा ही करना चाहिए। गाँव में लोग पूछेंगे तो उन्हें क्या कहेंगे? हम तो कहीं मुँह दिखाने के लायक नहीं रहे।"
रितु वहीं उनके पीछे आकर खड़ी थी और यह किशन और रमन को नहीं पता था। रितु ने जैसे ही अपने पिता के मुँह से ये शब्द सुने, वह तुरंत ही बालकनी की तरफ़ भागी, लेकिन किशन ने उसे देख लिया और दौड़कर पकड़ लिया।
उसने रितु को अपने सीने से लगाकर कहा, "जीजी, यह क्या कर रही थीं? जीजी, प्लीज़ अपने आप को संभालो। जो भी हुआ, उसमें तुम्हारी तो कोई गलती है ही नहीं। जिनकी गलती है, उन्हें उनके कर्मों की सज़ा तो ज़रूर मिलेगी। जीजी तुम चली जाओगी तो मुझे आगे कौन पढ़ाएगा? तुम मुझे बहुत प्यार करती हो न, फिर मुझे बीच भँवर में अकेला छोड़कर कैसे जा सकती हो? यह दुनिया एक भँवर जैसी ही तो है, जिसमें आज हमारा परिवार डूब रहा है। लेकिन हम तैरेंगे जीजी, हम तैरेंगे ... और तैरकर बाहर भी ज़रूर निकलेंगे।"
रितु ने किशन को अपने सीने से लगा लिया और इतने आँसू बहाए, जितने इतने दिनों से उसने अंदर ही अंदर भरकर रखे थे।
उसके बाद वे लोग अस्पताल से बाहर निकले। बाहर पंकज खड़ा था। पंकज को देखते ही रितु धीरे से किशन की पीठ के पीछे चली गई। वह पंकज से नज़रें नहीं मिलाना चाहती थी। किशन भी यह समझ गया था।
तभी पंकज किशन के पास आया और कहा, "किशन, मेरा कमरा मैंने खाली कर दिया है। तुम सब लोग वहाँ चलो। मैं तुम्हें वहाँ छोड़कर अपने एक दोस्त के पास चला जाऊँगा।"
रमन ने कहा, "बेटा पंकज, तुम बहुत नेक दिल इंसान हो। भला ऐसे दुख और मुसीबत के समय में कौन साथ देता है?"
किशन ने कहा, "हाँ पंकज, मेरे बाबूजी बिल्कुल ठीक कह रहे हैं। हम एक हफ़्ते बाद डॉक्टर को दिखाने के बाद अपने गाँव वापस चले जाएंगे।"
पंकज ने कहा, "ठीक है किशन, मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ। तुम बिल्कुल चिंता मत करना। कोई भी समस्या हो तो मुझे फ़ोन कर लेना, रितु के पास मेरा नंबर है।"
इतना कहकर उसने धीरे से रितु की ओर देखा। वह चुपके से उसी को देख रही थी और उसकी बातें भी सुन रही थी। लेकिन जब पंकज से उसकी नज़रें मिलीं, तब पंकज ने उसकी आँखों में जो दर्द देखा, उसे देखकर उसका दिल भी उसी दर्द को महसूस करने लगा।
पंकज से नज़रें मिलते ही रितु ने तुरंत अपनी आँखों को नीचे ज़मीन में गड़ा दिया, जहाँ उसकी आँखों से आँसू गिर रहे थे। तभी अनायास ही बारिश की हल्की-सी फुहार ज़मीन को भिगोने लगी। ऐसा लग रहा था मानो धरती माता भी उन आँसुओं में शायद अपने आँसू मिला रही थी कि उनकी छाती के ऊपर यह कैसा अनर्थ हो रहा है? उस समय जब उन पापियों का इरादा दुष्कर्म करने का हुआ था, तो तब वह फट क्यों नहीं गई? काश वह फट जाती और उन भेड़ियों की अपने अंदर ही कब्र बनाकर उन्हें समाप्त कर देती।
चाहे हमारा मन कुछ भी सोचे लेकिन जैसा हम चाहते हैं वैसा ही होना असंभव होता है। ऊपर वाले का लिखा कभी मिटता नहीं किंतु समझ नहीं आता कि वह किसी के भाग्य में ऐसा लिखता ही क्यों है।
✍️ रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः