अभी तक आपने पढ़ा कि डॉक्टर की सलाह पर किशन और रमन ने शहर में ही रितु के लिए किराए का कमरा लेने का निर्णय किया। पिता के शब्द सुनकर रितु टूट गई और आत्महत्या की कोशिश करने लगी, लेकिन किशन ने उसे संभाल लिया और हिम्मत दी। बाहर पंकज ने भी परिवार को सहारा दिया, जबकि रितु अब भी उससे नज़रें मिलाने से बच रही थी, और उसका दर्द बारिश की बूंदों की तरह ज़मीन पर छलक रहा था। अब इसके आगे पढ़ें-
एक हफ़्ते तक रितु और उसका परिवार पंकज के कमरे में ही रहा। पंकज वहाँ आता-जाता रहा और उन सबका ख़्याल भी रखता रहा।
उसके बाद सातवें दिन वे सब रितु को लेकर फिर अस्पताल पहुँचे। डॉक्टर ने उसे देखकर कुछ और दवाइयाँ दीं और कहा, "अब आप लोग चाहें तो अपने घर जा सकते हैं। बस जैसा कि मैंने, किशन, तुम्हें पहले ही कहा था ... उसका ख़्याल रखना। उसके सामने कोई ऐसी बात न कहे जिससे उसे सदमा लगे।"
किशन ने कहा, "ठीक है, डॉक्टर।"
डॉक्टर ने एक बार फिर किशन को समझाते हुए कहा, "किशन, तुम्हें ध्यान रखना होगा कि जो भी उसके साथ घटा है, उसे भूलना तो असंभव है, लेकिन रितु को उस हादसे से बाहर निकालने की कोशिश तुम्हारा परिवार ज़रूर कर सकता है।"
किशन ने कहा, "जी हाँ, हम लोग अपनी पूरी जान लगा देंगे। डॉक्टर साहब अस्पताल का बिल मैंने दे दिया है। आपको धन्यवाद कहना चाहता था, आपने मेरी बहन का बहुत ध्यान रखा है।"
डॉक्टर ने किशन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "यह तो मेरा फ़र्ज़ था, किशन। नौकरी एक तरफ़ और इंसानियत एक तरफ़। मैं भी एक स्त्री हूँ, उसकी वेदना को समझ सकती हूँ। यदि आगे कुछ भी, कैसी भी ज़रूरत हो तो तुम मुझे मेरे पर्सनल नंबर पर कॉल कर सकते हो," इतना कहते हुए डॉक्टर ने किशन को अपना नंबर दे दिया।
"थैंक यू, डॉक्टर।"
उसके बाद जैसे ही डॉक्टर की नज़र रितु से मिली उसकी आँखों का दर्द देखकर वह उसके पास आईं और उसके सर पर हाथ फिराते हुए कहा, "रितु तुम्हें बहुत हिम्मत से काम लेना होगा। तुम्हें कभी भी शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं है।"
उसके बाद वे सब वहाँ से जाने लगे। जैसे ही वे वापस पंकज के कमरे पर पहुँचे, पंकज वहीं था। किशन और रमन दोनों उसके पास आकर बैठ गए।
रितु और बसंती उनसे काफ़ी पीछे चल रही थीं, क्योंकि अब भी रितु को चलने में थोड़ी तकलीफ़ हो रही थी। किंतु कमरा बहुत दूर नहीं था, इसलिए वे पैदल ही आ रहे थे।
रमन ने पंकज की पीठ थपथपाते हुए कहा, "धन्यवाद बेटा। अब हमारा इस शहर से मन उचट गया है। काश, मैंने अपनी रितु को यहाँ न भेजा होता। मन में इस बात का बार-बार पछतावा होता ही रहता है।"
पंकज कुछ कहता, उससे पहले ही किशन ने कहा, "पापा, इस शहर से तो नाता अब जुड़ गया है। उन पापियों को मैं नहीं छोड़ूँगा, भले ही मुझे फ़ाँसी दे दी जाए। मैं हर रात, हर समय बदले की आग में जल रहा हूँ। जिन्होंने मेरी जीजी के जीवन में ज़हर घोला है, मैं उनका जीना हराम कर दूँगा।"
रमन ने कहा, "नहीं किशन, इतनी बर्बादी क्या काफ़ी नहीं है जो और ..."
तभी पंकज बोला, "किशन, अंकल ठीक कह रहे हैं। क़ानून है न, वही देगा उन्हें सज़ा।"
किशन ने कहा, "और जो क़ानून के रखवाले अपने सवालों से मेरी बहन को और शर्मिंदा करेंगे, उसका क्या? मैं वह मौक़ा ही नहीं आने दूँगा।"
इतने में रितु और बसंती कमरे में आ गईं। किशन चुप हो गया। वह नहीं चाहता था कि रितु यह कुछ भी सुने या जाने।
✍️ रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)
स्वरचित और मौलिक
क्रमशः