डाकिनी शैतानी आत्मा Samar Samar द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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    एक बहुत ही सुंदर और शांत गांव था। चारों ओर दूर-दूर तक फैले ह...

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डाकिनी शैतानी आत्मा

एक बहुत ही सुंदर और शांत गांव था। चारों ओर दूर-दूर तक फैले हरे-भरे खेत, लहलहाती फसलें, रंग-बिरंगे फूल और पक्षियों की मधुर चहचहाहट उस गांव की पहचान थे। वहां रहने वाले लोग एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। किसी के घर कोई परेशानी आती तो पूरा गांव उसकी मदद के लिए खड़ा हो जाता। गांव में न झगड़े होते थे और न ही किसी के मन में किसी के लिए बैर था। हर दिन हंसी-खुशी से बीतता था।

सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही गांव की गलियां चहल-पहल से भर जाती थीं। बच्चे स्कूल जाने की तैयारी करते, किसान अपने खेतों की ओर निकल पड़ते और गांव की औरतें टोकरी लेकर सब्जी वाली के पास पहुंच जाती थीं। वहां केवल सब्जियां ही नहीं खरीदी जाती थीं, बल्कि घंटों तक हंसी-मजाक और बातें भी होती थीं।

उस दिन भी सब्जी वाली अपनी दुकान सजाकर बैठी थी। उसकी टोकरियों में ताजी-ताजी भिंडी, बैंगन, आलू, प्याज, टमाटर, गोभी और हरी मिर्च रखी हुई थीं। सबसे पहले कमला आई। उसने मुस्कुराते हुए कहा, "बहन, आज मुझे एक किलो ताजी भिंडी दे देना। मेरे बच्चों को भिंडी बहुत पसंद है।"

तभी रोशनी बोली, "मुझे बढ़िया वाले बैंगन देना। आज मैं भरवां बैंगन बनाऊंगी।"

राखी ने हंसते हुए कहा, "मुझे आलू और प्याज दे दो। आज गरमा-गरम आलू की सब्जी और पूरी बनाऊंगी।"

इतने में राशि भी वहां पहुंच गई। उसने गोभी उठाकर कहा, "आज मैं गोभी के पराठे बनाऊंगी। साथ में दही और मक्खन भी रखूंगी। मेरे पति और बच्चे बहुत खुश हो जाएंगे।"

सभी औरतें हंसने लगीं। कोई त्योहार की बातें कर रही थी, कोई बच्चों की शरारतें सुना रही थी। पूरा माहौल खुशियों से भरा हुआ था।

शाम होते ही गांव के सभी लोग पुराने बरगद के विशाल पेड़ के नीचे इकट्ठा हो जाते थे। बच्चे खेलते, बूढ़े किस्से सुनाते और जवान लोग खेतों की बातें करते। कोई बांसुरी बजाता तो कोई लोकगीत गाने लगता। ऐसा लगता था जैसे इस गांव में कभी कोई दुख आ ही नहीं सकता।

लेकिन इस खुशहाल गांव से कुछ दूरी पर, घने जंगल के बीच एक छोटी-सी टूटी हुई झोपड़ी थी। वहां एक बूढ़ी औरत अकेली रहती थी। उसका चेहरा झुर्रियों से भरा था, आंखें लाल थीं और उसके लंबे सफेद बाल हमेशा खुले रहते थे। गांव वाले उसे देखकर डर जाते थे।

हर रात वह झोपड़ी के अंदर अजीब मंत्र पढ़ती थी। कभी आग का बड़ा सा गोला जलाती, कभी जमीन पर काले रंग का गोल घेरा बनाकर घंटों तक तपस्या करती रहती। उसका विश्वास था कि एक दिन उसे ऐसी शैतानी शक्तियां मिल जाएंगी जिनसे पूरी दुनिया उसके सामने झुक जाएगी।

धीरे-धीरे गांव वालों को उसकी इन हरकतों का पता चल गया। कई लोगों ने रात के अंधेरे में उसकी झोपड़ी से अजीब रोशनी निकलते देखी। किसी ने डरावनी चीखें सुनीं, तो किसी ने कहा कि उसने झोपड़ी के आसपास काली परछाइयों को घूमते देखा है।

डर पूरे गांव में फैल गया।

एक दिन गांव के सभी लोग इकट्ठा हुए। बिना पूरी सच्चाई जाने उन्होंने फैसला कर लिया कि अगर उस औरत को नहीं रोका गया तो वह पूरे गांव को बर्बाद कर देगी।

उस रात अमावस्या थी। आसमान काले बादलों से ढका हुआ था। तेज हवा चल रही थी और जंगल में अजीब आवाजें गूंज रही थीं। गांव वाले मशालें लेकर उसकी झोपड़ी तक पहुंचे।

बूढ़ी औरत उस समय अपनी सबसे बड़ी साधना कर रही थी। उसने आंखें खोलीं और गांव वालों को देखकर कहा, "मुझे मत मारो... अभी समय है... अगर आज मुझे मारोगे तो तुम्हारी सबसे बड़ी भूल होगी।"

लेकिन गुस्से और डर में अंधे हो चुके गांव वालों ने उसकी एक भी बात नहीं सुनी।

उन्होंने झोपड़ी के चारों ओर आग लगा दी।

चारों तरफ आग की लपटें उठने लगीं।

बूढ़ी औरत आग के बीच खड़ी जोर-जोर से हंसने लगी। उसकी हंसी इतनी भयानक थी कि जंगल के सारे पक्षी उड़ गए और जानवर भागने लगे।

मरने से पहले उसने चीखकर कहा, "आज अमावस्या की रात है... मेरी मौत मेरा अंत नहीं... मेरा नया जन्म है... मैं लौटूंगी... तुम सबको एक-एक करके मौत दूंगी... कोई नहीं बचेगा..."

कुछ ही क्षणों में उसकी चीखें बंद हो गईं।

गांव वालों ने राहत की सांस ली। उन्हें लगा कि अब सब खत्म हो गया।

लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि जिस रात उन्होंने उसे जलाया था, वह साधारण अमावस्या नहीं थी। वह ऐसी रात थी जब उसकी अधूरी शैतानी साधना पूरी होने वाली थी। आग में जलकर मरने के बाद उसकी आत्मा और भी ज्यादा शक्तिशाली बन गई।

उसकी आत्मा ने एक भयानक डाकिनी का रूप धारण कर लिया।

उसकी आंखें अंगारों की तरह लाल थीं, दांत तलवार जैसे नुकीले थे, पूरे शरीर पर काली राख जमी हुई थी और उसके लंबे बाल हवा में अपने आप उड़ते रहते थे। उसकी चीख सुनकर पेड़ों के पत्ते तक कांप उठते थे।

गांव वाले इस बात से पूरी तरह अनजान थे।

समय बीतता गया।

एक साल...

दो साल...

फिर तीन साल...

सब कुछ पहले जैसा दिखाई देता था।

लेकिन तीसरे साल की एक अमावस्या की रात अचानक गांव में अजीब घटनाएं शुरू होने लगीं।

रात के सन्नाटे में किसी औरत के रोने की आवाज सुनाई देती। कभी किसी को लगता कि कोई उसकी खिड़की के बाहर खड़ा है। कई लोगों ने लाल आंखों वाली एक डरावनी परछाईं को खेतों में घूमते देखा।

सुबह जब लोग वहां जाते तो मिट्टी पर किसी इंसान जैसे नहीं, बल्कि किसी विशाल पंजे के निशान बने होते।

गांव के जानवर बिना वजह गायब होने लगे। कई गायें और बकरियां जंगल के किनारे मरी हुई मिलीं। उनके शरीर पर एक भी घाव नहीं था, लेकिन उनके शरीर का सारा खून गायब था।

लोग डरने लगे।

बच्चों को शाम ढलने से पहले घर बुला लिया जाता। कोई भी अंधेरा होने के बाद घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं करता था।

एक रात गांव का चौकीदार अपनी लाठी लेकर पहरा दे रहा था। अचानक उसे दूर जंगल की तरफ एक सफेद साया दिखाई दिया। उसने हिम्मत करके उसके पीछे जाना शुरू किया।

जैसे ही वह पुराने बरगद के पास पहुंचा, उसके सामने वही भयानक डाकिनी खड़ी थी।

उसकी आंखें जलते अंगारों जैसी थीं।

चेहरे पर डरावनी मुस्कान थी।

वह धीरे-धीरे हवा में तैरते हुए चौकीदार की ओर बढ़ने लगी।

चौकीदार डर के मारे चीख पड़ा।

लेकिन अगले ही पल उसकी चीख पूरे गांव में गूंजकर हमेशा के लिए शांत हो गई।

सुबह गांव वालों को उसकी टूटी हुई लाठी तो मिली, लेकिन चौकीदार का कहीं कोई पता नहीं चला।

उस दिन के बाद पूरे गांव में ऐसा डर फैल गया, जैसा पहले कभी नहीं देखा गया था।

लोग समझ चुके थे कि तीन साल पहले जिस बूढ़ी औरत को उन्होंने आग में जलाकर मारा था, उसकी कहानी खत्म नहीं हुई थी।

असल में उसी दिन से उनकी बर्बादी की शुरुआत हुई थी।और अब वह भयानक डाकिनी अपना बदला लेने वापस लौट चुकी थी...