एक बहुत सुंदर गाँव था, जिसके चारों ओर घना जंगल फैला हुआ था। उस गाँव में किरण नाम की एक गरीब लड़की रहती थी। उसके पिता का कई वर्ष पहले देहांत हो चुका था और घर की सारी ज़िम्मेदारी अब उसी के कंधों पर थी। हर सुबह सूरज निकलने से पहले वह अपनी कुल्हाड़ी लेकर जंगल में लकड़ियाँ काटने चली जाती। उन्हीं लकड़ियों को बेचकर वह अपनी बूढ़ी माँ का इलाज कराती और घर का खर्च चलाती।
उस दिन आसमान पर हल्के बादल छाए हुए थे। जंगल के रास्ते पर चलते हुए किरण को एक अजीब-सी बेचैनी महसूस हो रही थी। हवा सामान्य दिनों की तुलना में कहीं अधिक ठंडी थी और पेड़ों की शाखाएँ बिना तेज़ हवा के भी धीरे-धीरे हिल रही थीं। गाँव के बुज़ुर्ग हमेशा कहते थे कि जंगल के बीचों-बीच कभी मत जाना, क्योंकि वहाँ सदियों पुराना एक रहस्य दफ़न है। लेकिन आज अच्छी लकड़ियों की तलाश में किरण अनजाने में उसी दिशा में निकल गई...किरण धीरे-धीरे जंगल के और भीतर बढ़ती चली गई। जितना वह आगे जाती, उतना ही जंगल का रंग बदलता दिखाई देता। ऊँचे-ऊँचे साल और सागौन के पेड़ों ने आसमान को लगभग ढक लिया था। धूप की किरणें पत्तों के बीच से छनकर ज़मीन पर पड़ रही थीं, जिससे ऐसा लगता था मानो धरती पर सुनहरी चादर बिछी हो। चारों ओर गहरा सन्नाटा था। केवल पक्षियों की कभी-कभार सुनाई देने वाली आवाज़ और सूखे पत्तों पर उसके कदमों की चरमराहट उस सन्नाटे को तोड़ रही थी।
कुछ देर बाद उसे एक सूखा हुआ विशाल पेड़ दिखाई दिया। उसने सोचा कि आज इतनी लकड़ियाँ मिल जाएँगी कि दो-तीन दिन तक जंगल आने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। उसने कुल्हाड़ी उठाई और तने पर पहला वार किया। फिर दूसरा। तीसरे वार के साथ ही अचानक एक अलग तरह की धातु जैसी आवाज़ सुनाई दी।
किरण चौंक गई। उसने कुल्हाड़ी नीचे रखी और आसपास की सूखी पत्तियाँ हटाने लगी। थोड़ी मिट्टी हटाते ही उसे एक पुराना लोहे का बक्सा दिखाई दिया। बक्सा पूरी तरह जंग से ढका हुआ था, लेकिन उस पर बनी अजीब आकृतियाँ अब भी साफ़ दिखाई दे रही थीं। उन निशानों को देखकर ऐसा लगता था जैसे किसी ने बहुत सोच-समझकर उन्हें उकेरा हो।
किरण ने बक्से को बाहर निकाला। वह काफ़ी भारी था। उसने उसका ढक्कन खोलने की कोशिश की, मगर वह नहीं खुला। तभी उसकी नज़र एक छोटे से गोल निशान पर पड़ी। जैसे ही उसने उसे दबाया, बक्से का ताला अपने आप खुल गया।
ढक्कन धीरे-धीरे ऊपर उठा और उसके भीतर से हल्की नीली रोशनी निकलने लगी। किरण कुछ पल के लिए वहीं खड़ी रह गई। उसने पहले कभी ऐसा दृश्य नहीं देखा था। रोशनी के शांत होते ही उसकी नज़र बक्से के बीचों-बीच रखी एक सुनहरी अंगूठी पर पड़ी।
वह अंगूठी साधारण नहीं थी। उसके बीच में जड़ा हुआ नीला रत्न किसी जीवित चीज़ की तरह धड़क रहा था। हर धड़कन के साथ उसकी चमक तेज़ और फिर धीमी हो जाती।
किरण ने घबराते हुए हाथ बढ़ाया। जैसे ही उसकी उँगलियाँ अंगूठी से छुईं, जंगल में अचानक तेज़ हवा चलने लगी। ऊपर बैठे पक्षी एक साथ उड़ गए। दूर कहीं बिजली गरजी, जबकि आसमान बिल्कुल साफ़ था।
वह डरकर पीछे हटना चाहती थी, लेकिन न जाने क्यों उसकी नज़र अंगूठी से हट ही नहीं रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे वह अंगूठी उसे अपने पास बुला रही हो।
धीरे से उसने अंगूठी उठा ली।
उसी समय बक्से के अंदर रखा एक पुराना कागज़ हवा में उड़कर उसके पैरों के पास आ गिरा। उसने उसे उठाकर पढ़ना शुरू किया।
उस पर लिखा था—
"जो इस अंगूठी को धारण करेगा, उसे ऐसी शक्तियाँ प्राप्त होंगी जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। लेकिन याद रखना, शक्ति जितनी बड़ी होती है, उसकी परीक्षा भी उतनी ही कठिन होती है। यदि तुम्हारे मन में लालच या छल आया, तो यही अंगूठी तुम्हारे विनाश का कारण बनेगी।"
किरण ने कागज़ को दोबारा पढ़ा। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह सब सच भी हो सकता है। उसने सोचा कि शायद किसी ने मज़ाक किया होगा।
उसी समय उसकी माँ का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूम गया। कई दिनों से दवा न मिलने के कारण उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी।
किरण ने गहरी साँस ली और धीरे से अंगूठी अपनी उँगली में पहन ली।
अंगूठी पहनते ही उसके पूरे शरीर में एक अजीब-सी गर्माहट दौड़ गई। उसकी आँखों के सामने कुछ पल के लिए सब कुछ धुंधला हो गया। जब उसने दोबारा आँखें खोलीं, तो जंगल पहले जैसा नहीं था।
अब उसे पेड़ों के चारों ओर हल्की नीली रोशनी दिखाई दे रही थी। हवा की आवाज़ साफ़ शब्दों में बदल चुकी थी। ऐसा लग रहा था मानो पूरा जंगल जीवित होकर उससे बातें कर रहा हो।
अचानक पास की झाड़ी से एक बूढ़ा हिरण बाहर आया। उसने सीधे किरण की ओर देखा और शांत आवाज़ में कहा,
"तुमने उसे जगा दिया है...
किरण का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा।
"क...किसे?" उसने काँपती आवाज़ में पूछा।
हिरण ने जंगल के सबसे गहरे हिस्से की ओर देखा।
"जिसकी अंगूठी तुम्हारी उँगली में है।"
यह कहकर हिरण मुड़ा और कुछ ही क्षणों में पेड़ों के बीच गायब हो गया।
किरण को लगा जैसे उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई हो। वह जल्दी-जल्दी अपना लकड़ियों का गट्ठर उठाकर गाँव की ओर लौटने लगी।
लेकिन उसे यह पता नहीं था कि जंगल की सबसे ऊँची चट्टान पर खड़ी एक काली परछाईं उसे लगातार देख रही थी।
उस परछाईं की आँखें अंगारों की तरह लाल थीं।
उसने धीमी, डरावनी हँसी हँसी और बोला
"आख़िरकार... सदियों बाद... मेरी मायावी अंगूठी को पहनने वाला मिल ही गया।"
किरण तेज़ कदमों से जंगल से बाहर निकल गई, लेकिन उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि उसकी ज़िंदगी अब हमेशा के लिए बदल चुकी है।