तेरी मेरी खामोशियां। - 17 Mystic Quill द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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तेरी मेरी खामोशियां। - 17


रात के उस हादसे के बाद, जब अमन ने नायरा को बेड पर बिठाकर पट्टी बांधी थी, कमरे में फिर से वही भारी सन्नाटा पसर गया था। अमन अपने किए पर अंदर ही अंदर झल्ला रहा था। उसे लगा कि वह कमज़ोर पड़ रहा है, और यही बात उसे परेशान कर रही थी। वह बिना कुछ और बोले वापस सोफे पर जाकर लेट गया और पूरी रात उसकी पीठ नायरा की तरफ रही।

सुबह की पहली किरण के साथ ही अमन अपनी आदत के मुताबिक उठ गया। रात की वह हल्की सी नर्मी अब उसके चेहरे से पूरी तरह गायब थी। उसकी आँखों में वही पुरानी बेरुखी लौट आई थी।

नायरा की आँख खुली तो उसने देखा कि अमन तैयार होकर बाहर जाने की फिराक में था।
"अमन जी... सुबह का नाश्ता?" नायरा ने धीमी आवाज़ में पूछा।

अमन दरवाज़े के पास रुका, उसने मुड़कर देखा भी नहीं। उसकी कड़वी जुबान फिर चली, "अपनी फिक्र खुद करो। और हाँ, रात जो कुछ भी हुआ, उसे अपनी कोई जीत मत समझ लेना। मुझे किसी बैसाखी की आदत नहीं है और न ही किसी के नाटक की। इस घर में रहना है, तो बड़ों के सामने सीधे रहने का ढोंग बंद करो।"

बिना नायरा का जवाब सुने, वह दरवाज़ा बंद करके बाहर निकल गया। नायरा का दिल एक बार फिर टूट कर बिखरा, मगर उसने एक गहरी सांस ली। वह जानती थी कि यह अमन का गुस्सा नहीं, बल्कि उसका डर है जो उसे कड़वा बोलने पर मजबूर कर रहा है।

दादी का कमरा - सुबह का वक्त
अमन सीधा सीढ़ियों से उतरकर नीचे जाने के बजाय दादी के कमरे की तरफ गया। सुबह-सुबह वह हमेशा दादी के पास जाता था।

दादी जान अपनी तस्बीह हाथ में लिए बैठी थीं। उन्होंने अमन को अंदर आते देखा, तो उसके चेहरे पर छाई हुई कड़वाहट को तुरंत पढ़ लिया।
"अमन... बैठो यहाँ," दादी ने बिस्तर की तरफ इशारा किया।

अमन चुपचाप उनके पास बैठ गया। दादी ने उसके सिर पर हाथ फेरा, "रात को कुछ आवाज़ आई थी नीचे? सब ठीक तो है?"

अमन ने नजरें झुका लीं, "कुछ नहीं दादी, बस एक गुलदस्ता गिर गया था। और... नायरा का पैर उस कांच पर पड़ गया। उसे हल्की चोट आई है।"

दादी के चेहरे पर फिक्र आ गई, "चोट आई है? और तुम उसे कमरे में अकेला छोड़कर यहाँ आ गए? अमन, मैंने तुमसे क्या कहा था? वह लड़की इस घर की इज्ज़त है, तुम्हारी शरीक-ए-हयात है।"

"मैंने उसकी पट्टी कर दी थी दादी," अमन ने ठंडे लहजे में कहा, "उससे ज़्यादा की उम्मीद मुझसे मत रखिए। मैं सिर्फ आपका कहा मानकर इस रिश्ते में हूँ, मगर मैं अपना दिल किसी को नहीं दे सकता। वह कल भी खाली था, आज भी खाली है।"

दादी ने एक ठंडी आह भरी, "दिल कोई तिजोरी नहीं है अमन, जिसे तुम बंद करके चाबी फेंक दो। वक्त आने पर यह ताला भी टूटेगा।"

अमन कुछ नहीं बोला। उसने दादी के हाथ चूमे और कमरे से बाहर निकल गया।

दोपहर का वक्त - 

दोपहर को सुल्तान मेंशन के हॉल में  नजमा बेगम, रुकसाना बुआ और सानिया बैठी थीं। मेहमानों के आने की बात चल रही थी, क्योंकि शादी के बाद कुछ करीबी रिश्तेदारों का आना-जाना लगा रहता है।

निखार सीढ़ियों से उतरकर सीधे अपनी माँ (रुकसाना) के पास आकर बैठ गई। उसकी नजरें बार-बार ऊपर अमन के कमरे की तरफ जा रही थीं।

"क्या हुआ निखार? बड़ी परेशान दिख रही हो?" रुकसाना बुआ ने पूछा।

निखार ने जानबूझकर आवाज़ में एक बनावटी चिंता लाते हुए कहा, "अम्मी, वो... मैं सुबह ऊपर अमन के कमरे की तरफ गई थी। सुना है रात को नायरा के पैर में चोट लग गई है। अमन सुबह से बहुत गुस्से में बाहर चला गया। मुझे तो लगता है कि आते ही नायरा ने घर में अपने नखरे दिखाने शुरू कर दिए हैं। अमन जैसा सीधा लड़का भी आज सुबह परेशान घूम रहा था।"

नजमा बेगम ने फिक्र से कहा, "बहू को चोट लगी है? मैं अभी जाकर देखती हूँ।"

मगर रुकसाना बुआ ने उन्हें रोक दिया, "अरे रुक जाओ नजमा। अभी दो दिन की आई लड़की के पीछे तुम खुद जाओगी? निखार, तू जा और उसे कह कि अगर पैर में ज़रा सी खरोंच है, तो नीचे आकर घर की औरतों का हाथ बंटाए। सुल्तान मेंशन में बहुएं दोपहर तक कमरों में बंद नहीं रहतीं।"

निखार को यही मौका चाहिए था। उसके होठों पर एक शातिर मुस्कान आई, "जी अम्मी, मैं अभी जाकर उसे देखकर आती हूँ।"

शाम का वक्त -
शाम ढल चुकी थी। अमन अपने काम से वापस सुल्तान मेंशन लौट आया था। वह थका हुआ सीधे अपने कमरे की तरफ बढ़ा।

उधर कमरे में, नायरा बेड पर बैठी अपने पैर के दर्द को सह रही थी। तभी निखार हाथ में गर्म सूप का प्याला लिए कमरे के अंदर दाखिल हुई। इस वक्त उसके चेहरे पर कोई मिठास नहीं थी, सिर्फ नफ़रत थी।
"लो, बड़ी अम्मी ने तुम्हारे लिए सूप भेजा है," निखार ने रूखे और कड़े लहजे में कहा और प्याला आगे बढ़ाया।

नायरा ने निखार की आँखों में छिपी उस आग को देख लिया था, फिर भी उसने अदब से हाथ आगे बढ़ाया, "शुक्रिया।"

मगरजैसे ही नायरा ने प्याला पकड़ने के लिए अपनी उंगलियां आगे बढ़ाईं, निखार ने जानबूझकर अपना हाथ पीछे खींच लिया और प्याले को ढीला छोड़ दिया।
क्लिक... छपाक!

खौलता हुआ गरम सूप सीधे बेडशीट पर गिरा और कुछ हिस्सा नायरा के हाथों और कलाई पर जा गिरा। गरम सूप की वजह से नायरा की नाज़ुक त्वचा तुरंत लाल पड़ गई।

"आह!" दर्द के मारे नायरा के मुंह से एक तेज़ चीख निकल गई।

"ओह गॉड! क्या बद्तमीज़ी है यह!" निखार ने उल्टा खुद ही कमरे को सिर पर उठा लिया और चिल्लाने लगी, "सूप नहीं पीना था तो साफ़ मना कर देतीं, हाथ झटकने की क्या ज़रूरत थी? सुल्तान मेंशन में आने से पहले तमीज़ नहीं सीखी क्या तुमने?"

ठीक उसी सेकंड, अमन ने कमरे का दरवाज़ा खोला। उसने अंदर का नज़ारा देखा, नायरा का हाथ बुरी तरह जल चुका था, बेड पर सूप बिखरा था और निखार गुस्से में हांफ रही थी। अमन का दिमाग तुरंत अतीत के उस काले पन्ने पर चला गया, जहाँ एक लड़की अक्सर घर के लोगों पर ऐसे ही चिल्लाया करती थी और ड्रामा करती थी। उसका पुराना घाव फिर से हरा हो गया।

"यह सब क्या बकवास हो रही है यहाँ?!" अमन की आवाज़ पूरे कमरे में गूंज उठी।

"देखो अमन!" निखार ने तुरंत अपनी चाल चली, "मैं तो बड़ी अम्मी के कहने पर इसके लिए सूप लाई थी। पर इसने जैसे ही मुझे देखा, गुस्से में प्याला हाथ से मारकर गिरा दिया। इसे शायद मेरा इस कमरे में आना पसंद नहीं है।"

अमन का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। पुरानी कड़वाहट और नफ़रत उसकी आँखों में उतर आई। उसने गुस्से से तमतमाते हुए नायरा की तरफ देखा, "नायरा! इस घर में हर किसी के साथ अपनी यह बद्तमीज़ी बंद करो! निखार सिर्फ़ तुम्हारी मदद के लिए आई थी और तुमने अपनी अकड़ में..."

नायरा हैरान रह गई। अमन की आँखों में अपने लिए वही पुरानी नफ़रत और बिना सोचे-समझे लगाया गया इल्जाम देखकर उसका दिल अंदर तक छलनी हो गया। मगर इस बार, वह रोई नहीं। उसने अपने जलते हुए हाथ की परवाह किए बिना, अपनी भीगी हुई मगर मज़बूत आँखों से सीधे अमन की कड़वी आँखों में झांका...