तेरी मेरी खामोशियां। - 9 Mystic Quill द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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तेरी मेरी खामोशियां। - 9

कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही, निम्मी ने झट से परदे गिराए और अपनी खास वाली चप्पल पहन ली — वही, जो वो हर सीरियस बात सुनते वक़्त पहनती थी।


"अब बता, तेरे चेहरे का रंग बता रहा है कि मामला हलवा नहीं बिरयानी है… तुने मुझसे कुछ छुपाया है!" निम्मी ने घूरते हुए कहा।


नायरा कुछ देर चुप रही, उसकी आँखें नम थीं। फिर हल्की आवाज़ में बोली,

"रिश्ता आ गया है… सब कुछ तय हो गया। अगले हफ्ते शादी है…"


निम्मी की आँखें फैल गईं, "क्या! कब? किससे? तूने मुझसे पूछा तक नहीं? और तुने 'हाँ' कैसे कर दी?"


नायरा ने लंबी साँस ली, फिर बगल रखे तकिए को अपनी गोद में रखकर बोली,

"मैंने लड़के का नाम भी नहीं पूछा, फोटो भी नहीं देखा… बस… बस एक उलझन से भाग रही थी…"


"कौनसी उलझन?" निम्मी पास सरक आई।


नायरा की आँखें कहीं दूर देखने लगीं…

"कुछ दिन पहले बस्टॉप पर एक लड़का दिखा था… दो बार देखा है… कुछ नहीं कहा उसने… मगर न जाने क्यों… वो आंखें… वो खामोशी… दिल को अजीब सा कर जाती है…"


नायरा की बात सुनकर निम्मी की आँखों में हैरानी और अफसोस एक साथ झलक उठा।

"तू पागल हो गई है क्या?" उसने धीमे लेकिन ठहरे हुए लहजे में कहा, "ना फोटो देखा, ना नाम जाना… और 'हाँ' कर दी? नायरा, ये कोई गुलाब का फूल थोड़ी है जो हाथ में लिया और कह दिया— अच्छा है!"


नायरा की आँखें भर आईं। उसने खुद को संभाला और बोली,

"मैं जानती हूँ निम्मो, पर अब कुछ समझ नहीं आता… कोई रास्ता साफ नहीं दिखता।"


निम्मी ने अपना सवाल वापस निगल लिया।

वो जानती थी कि इस वक़्त नायरा को ताने या सवाल नहीं, समझदारी की ज़रूरत है।

उसने अपना हाथ उसके हाथ पर रखा और गहराई से बोली,

"कभी-कभी हम अपने ही जज़्बातों से इतना डर जाते हैं, कि कुछ भी तय कर लेते हैं… बस उस डर से भागने के लिए। पर नायरा, शादी कोई रास्ता नहीं होती— ये तो एक मुकाम है। सोच समझ कर लिया गया फ़ैसला, वरना एक पूरी ज़िंदगी उलझ जाती है…" फिर उसने एक गहरी साँस ली, और मुस्कुरा दी,

"चल, बहुत हो गया। अब तुझे ज़्यादा सोचने नहीं दूँगी। तू नीचे चल, अम्मी ने तेरे लिए कुछ स्पेशल बनाया है।"


नायरा ने इंकार करना चाहा, मगर तभी निम्मी की अम्मी आकर बोलीं,

"बेटा, ऐसे कैसे जा सकती हो? खाना खाकर ही जाना होगा, वरना नाराज़गी लगेगी हमें…"


नायरा कुछ न कह सकी। सिर झुकाया और धीमे से मुस्कुरा दी।


रात का खाना, निम्मी का घर


नायरा निम्मी के साथ नीचे आई तो माहौल कुछ अलग ही था।

टेबल पर रंग-बिरंगे पकवान, अम्मी की हाथ की बनी ख़ास दाल, चटपटा आलू का भरता और निम्मी के अब्बू का पसंदीदा खट्टा-मीठा सलाद। दादी ने तो रोटियों में घी भी कुछ ज्यादा ही लगा दिया था आज।


"बेटा, तू ऐसे चुपचाप नहीं बैठेगी," अम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा, "तुझे देखकर लगता है जैसे हमारे घर की रौनक लौट आई हो।"


"हाँ, बिल्कुल!" निम्मी के अब्बू बोले, "और देखो ज़रा, ये हमारी निम्मी तो आजकल फोन में ही घुसी रहती है। नायरा आ गई तो थोड़ी जान पड़ी खाने में भी।"


नायरा हौले से मुस्कुराई, लेकिन वो मुस्कान थोड़ी झिझकी हुई थी।


"अरे बिटिया, तेरे जैसी बहू हो तो घर ही महक जाए!" दादी ने प्यार से सिर पर हाथ फेरा, "कभी-कभी लगता है तू हमारी ही होती तो…"


नायरा का दिल कुछ पल को कांपा। ये अपनापन… जो वो अपने घर में भी अब कम महसूस करती है।


तभी निम्मी का छोटा भाई प्लेट में मिठाई लेकर आया और बोला,

"अगर आप सबको नायरा दीदी इतनी पसंद हैं, तो एक बात सुन लो—जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, तो मैं इनसे ही शादी करूँगा! कोई नहीं रोक सकता मुझे!"


सभी हँस पड़े, लेकिन नायरा की आँखें थोड़ी नम हो गईं।

निम्मी ने उसे कोहनी मारी, "अबे शरमा मत, आज तू ही स्टार है इस घर की।"


नायरा ने हँसते हुए उस छोटे भाई की नाक खींच ली,

"अरे ओ मियाँ, तुम्हारी दाढ़ी मूछें आए तब बात करेंगे शादी की!"


"तो क्या हुआ! मैं आप जैसी लड़की फिर कहाँ ढूँढूँगा?" उसने मासूमियत से कहा।


सबकी हँसी देर तक गूंजती रही, लेकिन उस हँसी के बीच नायरा का मन बार-बार कुछ ढूँढता रहा—एक खालीपन जो उसकी अपनी दुनिया से गायब था।


रात गहराती गई, खाने की महक, चाय की खुशबू और हल्की सी गुलाबी ठंड सब कुछ मिलकर एक अल्हड़, मोहब्बत भरा माहौल बना रहे थे।

नायरा थोड़ी देर बरामदे में बैठी, चुपचाप। निम्मी की दादी उसके पास आईं,

"बिटिया, कभी-कभी हम जिन रास्तों को समझ नहीं पाते, वही हमें सही मंज़िल तक ले जाते हैं… बस दिल से सुनना चाहिए, और वक्त पर भरोसा रखना चाहिए।"


नायरा ने उनकी आँखों में झाँका… जैसे कोई माँ उसे समझा रही हो।


थोड़ी देर बाद...


"अब तो जाना पड़ेगा," नायरा ने कहा।


"इतनी जल्दी?" अम्मी ने पूछा।


"हाँ… वरना अम्मी समझेंगी, मैं भाग गई शादी करने," नायरा ने मज़ाक किया।


सब फिर हँस पड़े।


बाहर निकलते वक़्त…


नायरा ने एक बार पीछे मुड़कर देखा—वो घर, वो हँसी, वो अपनापन… शायद आज की रात उसके अंदर कुछ बदलने आया था।


लखनऊ की रात… सवा नौ बजे।


हल्की ठंडी हवा और शांत सड़कें, नायरा के कदम घर की ओर बढ़ रहे थे।

निम्मी के घर की चहल-पहल ने उसे थोड़ा सुकून ज़रूर दिया था, मगर अमन की यादें अब भी दिल के किसी कोने में किरकिरा कर रही थीं।


हवा एक बार फिर शरारती हो उठी।

नायरा की दुपट्टा हवा के संग उड़ता हुआ फिर उसी के चेहरे से टकराया—

अमन ने दुपट्टा थामा... मगर इस बार उसने नज़रें नहीं हटाईं।


आँखें मिलीं।

वो एक पल... ठहर गया।

नायरा का दिल जैसे सीने से बाहर आ जाएगा।

और वो—जैसे कोई पुराना ज़ख्म फिर से ताज़ा हुआ हो… उसकी आँखों में कुछ भीगी सी उदासी थी।


“तुम्हें शायद हवा से कहना चाहिए… कि बार-बार यूँ मुझे परेशान न करे…”

उसने धीरे से कहा, बमुश्किल कुछ शब्द, मगर हर लफ़्ज़ दिल से टकराता हुआ।


नायरा चौंकी।

उसने पहली बार उसे बोलते सुना था।

और ये आवाज़…

जैसे किसी वीराने में कोई पुराना राग छेड़ दिया गया हो।


“माफ़ कीजिए... हवा मेरी नहीं सुनती,”

नायरा ने हल्का सा मुस्कुरा कर जवाब दिया।

उसने सोचा शायद अब कोई और बात होगी... मगर वो कुछ नहीं बोला।

बस दुपट्टा उसके हाथ में थामे… एक पल तक उसे देखता रहा। फिर धीरे से उसकी ओर बढ़ाया।


“रात गहरी होती जा रही है... अकेले मत चलिए।”


इतना कहकर वो आगे बढ़ गया...

नायरा वहीं खड़ी रही...

सांसें अटकी, दिल धड़कता… और दिमाग़ में बस एक ही सवाल—


“ये लड़का कौन है…?”


मगर इस बार... उसकी खामोशी ने एक अजीब सी हलचल उसके अंदर छोड़ दी थी।