तेरी मेरी खामोशियां। - 16 Mystic Quill द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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तेरी मेरी खामोशियां। - 16

रात गहराने के साथ ही सुल्तान मेंशन की बत्तियाँ एक-एक कर बुझने लगी थीं। मगर अमन और नायरा के कमरे में सन्नाटा पसरा हुआ था। अमन हमेशा की तरह सोफे पर लेटा हुआ था, उसकी एक करवट नायरा की तरफ थी, मगर आँखें बंद थीं। बेड पर लेटी नायरा खिड़की से आते चाँद के उजाले को देख रही थी। उसके दिमाग में अभी भी रहीम चाचा की बातें और गाड़ी में हुआ वह हादसा घूम रहा था।

'रोबोट हैं पूरे!' अपने ही कहे लफ्ज़ याद कर नायरा के होठों पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई, मगर अगले ही पल अमन की कड़वी बातें याद आते ही उसका दिल भारी हो गया।

तभी अचानक, बाहर लॉबी से किसी चीज़ के गिरने की ज़ोरदार आवाज़ आई—छनन्नन!

कांच टूटने की आवाज़ से नायरा झटके से उठकर बैठ गई। सोफे पर सो रहा अमन भी हड़बड़ाकर उठ बैठा। उसकी आदत वैसे भी बहुत कच्ची थी।
"क्या हुआ? यह आवाज़ कहाँ से आई?" नायरा ने घबराते हुए पूछा।

अमन ने बिना कोई जवाब दिए बेडसाइड टेबल से टॉर्च उठाई और दरवाज़े की तरफ बढ़ा। नायरा भी डर के मारे उसके पीछे-पीछे चलने लगी।

"तुम यहीं रुको," अमन ने मुड़कर सख्त लहजे में कहा।
"नहीं, मैं भी आऊँगी। मुझे अकेले डर लगता है," नायरा ने उसका कुर्ता पीछे से हल्का सा पकड़ते हुए कहा।

अमन ने अपनी कलाई छुड़ाने की कोशिश नहीं की, बस एक ठंडी सांस ली और कमरे का दरवाज़ा खोला। लॉबी में घाना अंधेरा था। अमन ने टॉर्च की रोशनी नीचे फर्श पर डाली। वहाँ कांच के एक खूबसूरत गुलदस्ते के टुकड़े बिखरे पड़े थे, जो शायद हवा के झोंके या किसी बिल्ली के पैर लगने से गिर गया था।
"कुछ नहीं है, बस गुलदस्ता गिरा है। चलो अंदर," अमन ने कहा और मुड़ने लगा।

मगर नायरा का ध्यान नीचे फर्श पर नहीं था। अंधेरे में उसका पैर सीधे कांच के एक बड़े टुकड़े पर पड़ गया।
"आह!" नायरा के मुंह से एक सिसकी निकली और वह अपना संतुलन खो बैठी।

अमन ने फुर्ती से टॉर्च एक तरफ घुमाई और गिरती हुई नायरा को अपनी बाँहों में थाम लिया। एक बार फिर, दोनों बहुत करीब थे। अंधेरे में सिर्फ टॉर्च की एक हल्की सी लकीर दीवार पर पड़ रही थी। नायरा का पूरा वजन अमन के सीने पर था। अमन को महसूस हुआ कि नायरा दर्द से कांप रही थी।

"अक्ल नाम की चीज़ है या नहीं तुममें? नीचे कांच बिखरा है और तुम्हारी नजरें आसमान में हैं?" अमन की ज़ुबान कड़वी थी, मगर इस बार उसकी आवाज़ में गुस्से से ज़्यादा एक अनजानी सी फिक्र थी।

उसने बिना कुछ सोचे नायरा को अपनी बाँहों में उठा लिया। नायरा ने घबराहट में अपने हाथ अमन के गले में डाल दिए। अमन उसे उठाकर कमरे के अंदर लाया और धीरे से बेड पर बैठा दिया।

टॉर्च जलाकर जब उसने नायरा का पैर देखा, तो अंगूठे के पास से खून की एक पतली लकीर बह रही थी।
अमन तुरंत उठा और अलमारी से फर्स्ट-एड बॉक्स निकाल लाया। वह फर्श पर नायरा के पैरों के पास बैठ गया। जब उसने नायरा का पैर अपने हाथ में लिया, तो नायरा ने अपना पैर पीछे खींचने की कोशिश की।

"हिलो मत," अमन ने बिना सिर उठाए हुक्म दिया, "दर्द सहने का शौक है तो बताओ, मैं रख देता हूँ ये सब।"
"नहीं... दुख रहा है," नायरा ने बच्चों की तरह मासूमियत से कहा।

अमन ने रुई में एंटीसेप्टिक लगाया और उसके ज़ख्म पर छुआया।
"उईई... अम्मा!" नायरा की आँखें कसकर बंद हो गईं और उसने अनजाने में बेडशीट को कसकर पकड़ लिया।

अमन ने उसकी इस हरकत को देखा। उसके सख्त चेहरे पर एक पल के लिए बहुत हल्की सी, अदृश्य मुस्कान आई जो तुरंत गायब हो गई। उसने बहुत आहिस्ते से पट्टी बांधी।

"हो गया। अब चुपचाप सो जाओ और सुबह तक पैर नीचे मत रखना," अमन ने उठते हुए कहा।

नायरा ने पट्टी को देखा और फिर अमन को। "शुक्रिया, अमन जी। कड़वे हैं आप, मगर उतने बुरे भी नहीं हैं।"
अमन रुक गया। उसने कड़क आवाज़ में कहा, "मैंने यह सब इसलिए किया ताकि सुबह तुम दादी के सामने जाकर रोना मत रो कि तुम्हारे पैर में चोट लग गई और मैंने कुछ नहीं किया। तुम्हारी भलाई में मेरा कोई जज़्बात नहीं छुपा है।"

उसने टॉर्च बुझाई और वापस सोफे पर जाकर लेट गया।

नायरा बेड पर लेटी मुस्कुरा रही थी। वह जानती थी कि अमन ऊपर से चाहे जितनी दीवारें खड़ी कर ले, मगर उसका अंदर का इंसान अभी भी ज़िंदा है।

अगली सुबह: सुल्तान मेंशन की रसोई

निखार सुबह-सुबह रसोई में आई थी। उसने रात को लॉबी में कांच टूटने की आवाज़ सुनी थी और उसे उम्मीद थी कि सुबह घर में कोई न कोई तमाशा ज़रूर होगा।

तभी सानिया भाभी रसोई में आईं और बोलीं, "निखार, ज़रा अम्मी की दवाइयाँ उनके कमरे में दे आना। और हाँ, नायरा कहाँ है? आज सुबह से दिखी नहीं।"
निखार ने मौका देखा और कहा, "भाभी, मैं देखकर आती हूँ। नई नवेली दुल्हन हैं ना, शायद अभी तक सो रही होंगी।"

निखार सीढ़ियाँ चढ़कर अमन और नायरा के कमरे की तरफ बढ़ी। दरवाज़ा आधा खुला हुआ था क्योंकि सुबह रहीम चाचा कमरे के बाहर पानी की बोतल रखकर गए थे। निखार ने जैसे ही अंदर झांका, उसकी आँखों में जलन की आग भड़क उठी।

कमरे में अमन सोफे पर बैठा था और बेड पर बैठी नायरा के सामने एक प्लेट में सेब के टुकड़े रखे थे। दरअसल, पैर में चोट की वजह से अमन ने खुद नीचे जाने के बजाय रहीम चाचा से नाश्ता कमरे में ही मँगवा दिया था। वह नायरा को अपने हाथों से तो नहीं खिला रहा था, मगर उसके पास बैठकर बहुत शांति से कुछ कह रहा था।

"ज़्यादा नखरे मत करो, चुपचाप इसे खा लो ताकि दवा ले सको," अमन कह रहा था।
"मगर मुझे सेब नहीं पसंद, मुझे आम खाना है," नायरा ने थोड़ा मुंह बनाते हुए कहा।
"यह कोई होटल नहीं है। जो मिला है, खाओ," अमन ने कड़क अंदाज़ में कहा, मगर उसकी कड़कड़ाहट में आज नफ़रत नहीं थी।

दरवाज़े के पीछे खड़ी निखार की मुट्ठियाँ भिंच गईं। "यह लड़की तो अमन के सिर चढ़ रही है। अमन जो किसी को अपने कमरे में बर्दाश्त नहीं करता था, आज इसके नखरे सह रहा है? नहीं... अब मुझे कुछ बड़ा करना होगा।"
निखार के दिमाग में एक खतरनाक साज़िश आकार लेने लगी थी।