मेहर
"अवंतिका।" मेहर ने chips रख दिए। "छह साल से जानती हूँ तुझे। तेरा 'हाँ' वाला झूठ मुझे पहचान आता है।" वह बिस्तर पर बैठ गई। "बता क्या हुआ।"
अवंतिका ने एक पल सोचा और फिर सब कुछ बता दिया—कमला बाई की बातें, माँ के बारे में खुलासे, धुन, और वह तिल।
मेहर चुपचाप सुनती रही। पूरा ध्यान देकर।
जब अवंतिका खत्म हुई, तो मेहर ने पूछा,
"तेरी माँ ने कभी नहीं बताया कि वह राजस्थान से थीं?"
"नहीं… उन्होंने कहा था कि वह UP से हैं," अवंतिका ने कहा।
"और वह धुन?" मेहर ने धीरे से पूछा। "तुझे सच में familiar लगी?"
"हाँ…" अवंतिका की आवाज़ हल्की काँपी। "मेहर… वह धुन मेरी माँ की लोरी थी। मुझे याद है।"
कमरे में थोड़ी देर खामोशी रही।
"तो इसका मतलब…" मेहर ने धीरे कहा, "तेरी माँ को इस जगह के बारे में पता था। इस हवेली के बारे में। और उन्होंने यह बात तुझसे छुपाई।"
"हाँ," अवंतिका ने कहा।
"क्यों?"
"यही तो जानना है मुझे।"
रात के करीब दस बजे मेहर अपने कमरे में चली गई।
अवंतिका ने खिड़की बंद की। कमला बाई की बातें उसके दिमाग में घूम रही थीं।
लाइट बंद की और वह लेट गई।
लेकिन नींद नहीं आई।
वह छत को देखती रही, अंधेरे में डूबी हुई।
माँ के बारे में सोचती रही, चंदनगढ़ के बारे में, और उस नाम श्यामला के बारे में।
पता ही नहीं चला कब नींद आ गई।
करीब तीन बजे अचानक उसकी आँख खुली।
जैसे किसी ने उसे जगा दिया हो।
कमरा पूरी तरह अंधेरा था, लेकिन हवा में एक ठंडक थी। ऐसी ठंड जो मई की रात में महसूस ही नहीं होनी चाहिए थी।
अवंतिका उठकर बैठ गई।
उसने फोन उठाया और टॉर्च ऑन की।
कमरे में सब कुछ वैसा ही था।
उसने टॉर्च बंद की और फिर लेट गई।
और तभी
एक आवाज़ आई।
खिड़की के पास से।
बहुत धीमी, बहुत मुलायम।
"अवंतिका..."
वही आवाज़, जो वह पहले भी सुन चुकी थी।
दिल जोर से धड़क उठा।
कमला बाई की बात याद आई
“जवाब मत देना…”
"अवंतिका… मुझे पता है तुम जाग रही हो…" आवाज़ फिर आई।
उसकी साँस रुक गई।
"बस एक बार दरवाज़ा खोल दो… मुझे तुमसे बात करनी है…"
आवाज़ में दर्द था, जैसे कोई बहुत दूर से पुकार रहा हो।
अवंतिका का हाथ अनजाने में उठ गया, खिड़की की तरफ।
लेकिन अगले ही पल उसने खुद को रोक लिया।
आँखें बंद कर लीं।
"अवंतिका…" आवाज़ और पास आ गई, जैसे बिल्कुल खिड़की के बाहर हो।
"मुझे अकेला मत छोड़ो… चार सौ साल से अकेली हूँ… बस एक बार…"
अवंतिका के गालों पर आँसू बहने लगे।
उसे खुद समझ नहीं आ रहा था क्यों, लेकिन उस आवाज़ का दर्द उसे तोड़ रहा था।
फिर भी उसने न दरवाज़ा खोला, न खिड़की।
बस चुप रही।
कुछ देर बाद
आवाज़ बदल गई।
दर्द गायब हो गया।
और उसकी जगह आ गया ठंडापन।
"ठीक है।"।
बस ये दो शब्द।
लेकिन उनमें एक ऐसा डर था जो किसी चीख से भी ज्यादा भारी था।
और फिर सब शांत हो गया।
ठंड धीरे-धीरे खत्म होने लगी।
कमरा फिर से सामान्य हो गया।
अवंतिका काफी देर तक वैसे ही लेटी रही—चुप, स्थिर।
धीरे-धीरे उसकी सांसें सामान्य हुईं और फिर वह सो गई।
सुबह जब उसकी आँख खुली, तो वह सीधे खिड़की की तरफ गई।
खिड़की बंद थी।
लेकिन शीशे के बाहर की तरफ धूल में कुछ लिखा था—उंगली से।
तीन शब्द।
अवंतिका ने पढ़ा
"तू मेरी है।"
वह वहीं जम गई।
कुछ देर तक वह सिर्फ उस लाइन को देखती रही।
उस सुबह चंदनगढ़ में सूरज निकला था।
लेकिन काली कोठी के ऊपर नहीं।
उस हवेली पर हमेशा की तरह एक अजीब-सा अंधेरा छाया हुआ था।
और उस अंधेरे में कहीं…
एक मुस्कान थी।
श्यामला की।
क्योंकि उसे पता था—अवंतिका ने इस बार जवाब नहीं दिया था।
आज नहीं।
लेकिन शायद कल…
या परसों…
वह जवाब दे देगी।