सुबह लगभग छह बजे अलार्म बजा तो अवंतिका ने धीरे-धीरे आँखें खोलीं।
रात भर उसे ठीक से नींद नहीं आई थी। आँख बंद करते ही वही सफ़ेद कपड़ों वाली औरत सामने आ जाती। कभी सड़क की लाइट के नीचे खड़ी दिखाई देती, तो कभी काली कोठी की खिड़की में।
कुछ पल तक वह चुपचाप छत को देखती रही। फिर तकिए के पास रखा मोबाइल उठाया और सबसे पहले वही तस्वीर खोली।
काली कोठी...
उसने तस्वीर को ज़ूम करके खिड़की वाला हिस्सा देखा।
इस बार वहाँ कुछ भी साफ़ नज़र नहीं आ रहा था। बस धुंधली-सी दीवार और पुरानी तस्वीर का धुंधलापन।
अवंतिका हल्का-सा मुस्कुराई।
"लगता है सच में मैं ज़रूरत से ज़्यादा सोच रही हूँ..."
उसने मोबाइल बंद किया और बिस्तर से उठ गई।
आज उसे चंदनगढ़ के लिए निकलना था।
रात में ही सारा सामान पैक कर चुकी थी। उसने एक बार बैग खोला, ज़रूरी चीज़ें दोबारा देखीं—लैपटॉप, कैमरा, नोटबुक, रिकॉर्डर, चार्जर और कुछ कपड़े।
सब कुछ ठीक था।
फिर भी पता नहीं क्यों उसके मन में एक अजीब-सी बेचैनी थी। जैसे कोई अनदेखा डर उसे रोकना चाहता हो।
उसने गहरी साँस ली और खुद से बोली,
"Relax... यह सिर्फ़ एक assignment है।"
कुछ देर बाद वह कमरे का दरवाज़ा बंद करके नीचे उतर गई।
करीब साढ़े सात बजे वह कश्मीरी गेट बस अड्डे पहुँच गई।
दूर से ही मेहर उसे हाथ हिलाती दिखाई दी।
"मैडम! इधर!"
अवंतिका उसके पास पहुँची और उसे ऊपर से नीचे तक देखकर हँस पड़ी।
"मेहर... हम हॉरर हवेली में जा रहे हैं या फ़ैशन शो में?"
मेहर ने अपने बड़े से बैग का स्ट्रैप ठीक किया।
"क्या पता वहाँ कोई राजकुमार मिल जाए। तैयारी पूरी होनी चाहिए।"
"भूत मिलेगा..."
"कोई बात नहीं... अगर हैंडसम हुआ तो सोच लेंगे।"
दोनों हँस पड़ीं।
तभी पीछे से एक भारी आवाज़ आई।
"दिदी..."
दोनों ने मुड़कर देखा।
चोटू पांडे दोनों कंधों पर बैग लटकाए खड़ा था। गले में हनुमान जी का लॉकेट, माथे पर चंदन का तिलक और चेहरे पर ऐसा भाव जैसे युद्ध पर जा रहा हो।
"इतना सामान?" अवंतिका ने पूछा।
चोटू ने गंभीरता से कहा,
"ज़रूरी है।"
"क्या है इसमें?"
"लहसुन... सेंधा नमक... गंगाजल... हनुमान चालीसा... कपूर... नींबू... लाल धागा..."
मेहर ने आँखें बड़ी कर लीं।
"बस कर... तू हवेली जीतने जा रहा है या भूत भगाने?"
चोटू बिल्कुल गंभीर था।
"सावधानी में ही सुरक्षा है।"
अवंतिका ने माथा पकड़ लिया।
"हे भगवान... पूरा रास्ता इसी के साथ बिताना है।"
कुछ देर बाद राजस्थान जाने वाली बस चल पड़ी।
दिल्ली की भीड़ धीरे-धीरे पीछे छूटने लगी।
ऊँची इमारतों की जगह खुले मैदान आने लगे। फिर खेत... और कुछ घंटों बाद रेत का लंबा फैलाव।
अवंतिका खिड़की के पास बैठी बाहर देख रही थी।
उसकी गोद में वही फ़ाइल रखी थी जो तिवारी जी ने दी थी।
उसने उसे खोला।
पहले पन्ने पर मोटे अक्षरों में लिखा था
काली कोठी — चंदनगढ़
उसने अगला पन्ना पलटा।
मृतक: राहुल मेहरा
उम्र: 28 वर्ष
मौत का कारण (Police Report): ऊँचाई से गिरना।
नीचे लाल पेन से किसी ने लिखा था
"Locals disagree."
अवंतिका ने अगला पन्ना देखा।
दो और पुराने केस।
दोनों अधूरे।
दोनों की मौत उसी हवेली से जुड़ी हुई।
उसने नोटबुक निकाली और लिखना शुरू किया
Case 1 – Accident?
Case 2 – Unsolved
Case 3 – Tourist Death
उसने पेन रोक दिया।
तीन मौतें...
एक ही जगह...
क्या यह सिर्फ़ संयोग था?
या सचमुच काली कोठी अपने अंदर कोई राज़ छिपाए बैठी थी?
उधर मेहर सीट पर बैठते ही गहरी नींद में जा चुकी थी।
चोटू धीरे-धीरे हनुमान चालीसा पढ़ रहा था।
अवंतिका ने मुस्कुराकर दोनों को देखा।
"एक सो रही है...
दूसरा भगवान को duty report दे रहा है...
और मैं पता नहीं किस मुसीबत में फँसने जा रही हूँ..."
बस लगातार आगे बढ़ती रही।
राजस्थान की सुनहरी धरती अब पूरी तरह सामने फैल चुकी थी।
लेकिन जाने क्यों...
जितना चंदनगढ़ पास आ रहा था...
अवंतिका के दिल की धड़कन उतनी ही तेज़ होती जा रही थी।
शाम करीब चार बजे बस चंदनगढ़ बस स्टैंड पर रुकी।
ड्राइवर ने ऊँची आवाज़ में कहा, "चंदनगढ़... जिन यात्रियों को यहीं उतरना है, अपना सामान ले लें।"
अवंतिका ने बस की खिड़की से बाहर देखा।
चंदनगढ़ एक छोटा-सा कस्बा था। सड़क के दोनों ओर पुरानी दुकानें, कुछ कच्चे-पक्के मकान और दूर मंदिर की ऊँची पताका दिखाई दे रही थी। पहली नज़र में सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन अगले ही पल उसे कुछ अजीब महसूस हुआ।
बस रुकते ही आसपास खड़े लोगों की नज़रें उन पर टिक गईं। कुछ पल तक सब उन्हें देखते रहे, फिर बिना कुछ बोले अपने-अपने रास्ते चल पड़े। किसी के चेहरे पर उत्सुकता नहीं थी, बल्कि एक अनजाना डर साफ़ दिखाई दे रहा था।
"यार... यहाँ कितना सन्नाटा है।" मेहर ने बस से उतरते हुए कहा। उसने चश्मा उतारा और चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई। "जगह तो काफ़ी सुंदर लग रही है।"
चोटू ने तुरंत सिर हिलाया।
"सुंदर नहीं, अजीब है।"
"अब क्या हो गया?"
"चार बज रहे हैं, लेकिन बाज़ार लगभग खाली है। न बच्चे खेल रहे हैं, न कोई आराम से बैठा है। सब लोग ऐसे भाग रहे हैं जैसे शाम होने से पहले घर पहुँचना ज़रूरी हो।"
अवंतिका ने ध्यान से आसपास देखा।
इस बार उसे भी चोटू की बात सही लगी।
छोटे कस्बों में नए लोगों को देखकर लोग बात करने आ जाते हैं, लेकिन यहाँ हर कोई उनसे नज़रें चुराकर आगे बढ़ रहा था।
"चलो," अवंतिका ने बैग उठाते हुए कहा, "पहले गेस्ट हाउस चलते हैं।"
तिवारी जी ने उनके लिए "मेहमान निवास" नाम के गेस्ट हाउस में कमरे बुक करवा दिए थे।
करीब दस मिनट बाद तीनों वहाँ पहुँच गए।
गेस्ट हाउस काफी पुराना था। दीवारों का रंग उखड़ चुका था और रिसेप्शन पर एक बुज़ुर्ग आदमी कुर्सी पर ऊँघ रहा था।
अवंतिका ने काउंटर पर रखी घंटी बजाई।
घंटी की आवाज़ सुनते ही वह चौंककर उठ बैठा।
"जी... आइए।"
"हमारी बुकिंग रमेश तिवारी जी के नाम से है।"
उसने रजिस्टर देखा, फिर दराज़ से तीन चाबियाँ निकालकर उनकी ओर बढ़ा दीं।
"ऊपर पहली मंज़िल पर कमरे हैं।"
अवंतिका ने चाबियाँ लेते हुए सहज स्वर में पूछा,
"यहाँ काली कोठी किस तरफ़ पड़ेगी? हम उसी पर रिपोर्ट बनाने आए हैं।"
यह सुनते ही बूढ़े के चेहरे का रंग उड़ गया।
उसके हाथ वहीं रुक गए।
कुछ पल तक वह चुपचाप अवंतिका को देखता रहा।
"काली... कोठी?"
उसने बहुत धीमी आवाज़ में कहा।
"जी। उसके बारे में कुछ जानते हैं?"
बूढ़े ने गहरी साँस ली।
"जानता तो पूरा चंदनगढ़ है... लेकिन कोई उसका नाम लेना भी पसंद नहीं करता।"
"क्यों?"
उसने एक-एक करके तीनों की तरफ़ देखा।
"आप लोग दिल्ली से आए हैं?"
"हाँ।"
बूढ़े ने बिना किसी भाव के कहा,
"अगर मेरी बात मानो... तो वापस लौट जाओ।"
कुछ पल के लिए वहाँ खामोशी छा गई।
पीछे खड़े चोटू ने धीरे से कहा,
"दिदी... मैंने पहले ही कहा था।"
अवंतिका ने कोई जवाब नहीं दिया।
तीनों अपने-अपने कमरों में चले गए।
अवंतिका का कमरा सबसे आख़िर में था। कमरे की खिड़की कस्बे के बाहर की तरफ़ खुलती थी।
उसने परदा हटाया और खिड़की खोल दी।
दूर क्षितिज पर काले पत्थरों से बनी एक विशाल इमारत दिखाई दे रही थी।
काली कोठी।
इतनी दूर होने के बावजूद उसकी ऊँची दीवारें और पुराना बुर्ज साफ़ दिखाई दे रहे थे।
अवंतिका कुछ देर तक उसे देखती रही।
एक पल के लिए उसे लगा जैसे ऊपर वाली किसी खिड़की का पल्ला खुला हो।
उसने ध्यान से देखा।
सब कुछ पहले जैसा था।
शायद उसे भ्रम हुआ था।
उसने खिड़की बंद की और कमरे से बाहर निकल गई।
रात का खाना खाने के लिए तीनों पास के एक ढाबे पर पहुँचे।
ढाबे में मुश्किल से चार-पाँच लोग बैठे थे।
खाना आने तक चोटू ने आँखें बंद करके भगवान का नाम लेना शुरू कर दिया।
मेहर मुस्कुराई।
"इतनी लंबी प्रार्थना?"
चोटू ने आँखें खोले बिना कहा,
"Extra protection माँग रहा हूँ।"
अवंतिका हँसे बिना नहीं रह सकी।
उसी समय उसकी नज़र ढाबे के कोने में बैठे एक अधेड़ आदमी पर पड़ी।
वह लगातार उनकी तरफ़ देख रहा था।
जैसे ही अवंतिका की नज़र उससे मिली, उसने तुरंत चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया।
कुछ देर बाद अवंतिका खुद उसके पास चली गई।
"भाई साहब... क्या आप हमें जानते हैं?"
वह आदमी घबरा गया।
"न... नहीं।"
"हम दिल्ली से आए हैं। काली कोठी पर रिपोर्ट बनाने आए हैं।"
'काली कोठी' का नाम सुनते ही उसके चेहरे पर डर और दर्द एक साथ उभर आया।
वह धीमे स्वर में बोला,
"बेटी... वहाँ मत जाना।"
"क्यों?"
उसने चारों तरफ़ देखा, फिर फुसफुसाकर कहा,
"जो भी उस हवेली में गया... या तो लौटकर नहीं आया... और जो वापस आया... वह पहले जैसा कभी नहीं रहा।"