टूटता हुआ मन - भाग 3 prem chand hembram द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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टूटता हुआ मन - भाग 3



उस दिन विद्यालय का सभागार खचाखच भरा था। शांतनु मंच पर खड़ा था। उसकी आवाज़ में न कृत्रिमता थी, न प्रदर्शन—केवल अपने परिवार के प्रति सहज श्रद्धा थी।
"मैंने अपने दादू को कभी देखा नहीं। वे एक साधारण शिक्षक थे, पर उनके विचार असाधारण थे। पूरे बांकुड़ा जिले में उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या के विरुद्ध जो अलख जगाई, उसने हजारों बेटियों को नया जीवन दिया। लोग उनका नाम सम्मान से लेते हैं। उन्हें अनेक पुरस्कार मिले, पर मेरी माँ कहती हैं कि उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार लोगों का विश्वास था।
माँ मुझे बचपन से एक ही बात कहती थीं—'बेटा, अपने मम्मी-पापा जैसा नहीं, अपने दादू जैसा बनना। जीवन उपदेशों से नहीं, अपने उदाहरण से सँवारना।'
मेरी माँ एक मुस्लिम परिवार से हैं। वे नमाज़ भी पढ़ती हैं और आरती भी करती हैं। उन्होंने मुझे सिखाया कि धर्म मनुष्यों को जोड़ने के लिए होता है, बाँटने के लिए नहीं।
मेरे पापा ने शादी के बाद मेरी मम्मी की पढ़ाई कभी रुकने नहीं दी। कठिन परिस्थितियों में भी उनका साथ नहीं छोड़ा। आज मेरी मम्मी एक सफल डॉक्टर हैं। मैं भगवान से बस यही प्रार्थना करता हूँ कि हर बच्चे को मेरे जैसे मम्मी-पापा मिलें।"
शांतनु के अंतिम शब्द समाप्त होते ही पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।
पर उन तालियों की प्रतिध्वनि दो हृदयों पर हथौड़े की चोट बनकर पड़ रही थी।
फरजाना का चेहरा पीला पड़ गया। उसकी पलकों पर ठहरे आँसू अब रुक नहीं पा रहे थे। उसने दुपट्टे से अपना चेहरा ढक लिया, मानो स्वयं से ही नज़रें चुराना चाहती हो।
जिस पुत्र ने अभी कुछ क्षण पहले मंच पर अपनी माँ को अपना आदर्श बताया था, वही शब्द अब उसके अंतःकरण में शूल बनकर चुभ रहे थे।
उसके मन में एक-एक कर दृश्य उभरने लगे—रमेश का संघर्ष, उसका निस्वार्थ प्रेम, पढ़ाई के दिनों का साथ, रात-रात भर जागकर उसकी सहायता करना, उसकी सफलता पर सबसे अधिक प्रसन्न होना... और फिर अपना स्वयं का भटक जाना।
उसे पहली बार लगा कि उसने केवल पति का विश्वास ही नहीं तोड़ा, बल्कि अपने बच्चों के भविष्य और अपने दादू के आदर्शों को भी कहीं न कहीं आहत किया है।
रमेश ने धीरे से उसके काँपते हाथ पर अपना हाथ रखा। उसके स्वर में न कोई कटाक्ष था, न क्रोध; केवल वर्षों के साथ का अपनापन था।
"फरजाना... बच्चे माता-पिता की संपत्ति नहीं होते। वे हमारे चरित्र का प्रतिबिंब होते हैं। जीवन में कभी-कभी मनुष्य रास्ता भूल जाता है, पर यदि विवेक जाग जाए तो वही भूल जीवन का सबसे बड़ा गुरु बन जाती है।"
फरजाना फूट पड़ी।
"रमेश... मैं अपने ही मन से हार गई।"
रमेश ने उसकी ओर देखा। उसकी आँखों में पीड़ा थी, पर कहीं न कहीं करुणा भी थी। उसने कोई उत्तर नहीं दिया, क्योंकि कुछ मौन ऐसे होते हैं जो हजारों शब्दों से अधिक प्रभावशाली होते हैं।
उसी समय मंच से घोषणा हुई—
"आज का कार्यक्रम केवल बच्चों की प्रतिभा का नहीं, परिवार के संस्कारों का उत्सव है। सभी अभिभावक अपने बच्चों के साथ मंच पर आएँ और परिवार के सम्मान तथा संस्कारों की रक्षा का संकल्प लें।"
फरजाना के कदम ठिठक गए।
उसे लगा जैसे मंच नहीं, उसकी अंतरात्मा उसे पुकार रही हो।
तभी शांतनु और उसका छोटा भाई दौड़ते हुए आए। दोनों ने अपने-अपने छोटे हाथों से माता-पिता की उँगलियाँ थाम लीं।
"मम्मी... चलो न!"
फरजाना ने दोनों बच्चों को सीने से लगा लिया। उस आलिंगन में वर्षों का दबा हुआ मातृत्व, पश्चाताप और खोया हुआ विश्वास एक साथ उमड़ पड़ा।
वह रमेश के साथ मंच की ओर बढ़ी। प्रत्येक कदम उसे ऐसा अनुभव करा रहा था मानो वह भीड़ की ओर नहीं, बल्कि अपने ही अंतःकरण की अदालत की ओर जा रही हो—जहाँ न कोई न्यायाधीश था, न कोई वकील; केवल उसका जागा हुआ विवेक था।
शायद उसी क्षण उसके भीतर परिवर्तन का पहला बीज अंकुरित हो चुका था ।
दूसरे दिन शहर के अति प्रतिष्ठित हॉस्पिटल एम एम  दास के एक केबिन में कई डॉक्टर बैठे हैं सभी कल के प्रोग्राम के बारे में चर्चा कर रहे हैं इतने में डॉक्टर विवेक बोले 
",भाई कल तो फरजाना के बेटे ने कमाल की सीख दी ,
उपदेश नहीं उदाहरण बनो , मै तो मंत्रमुग्ध हो के सुन रहा था " 
डॉक्टर सीमा ' मुझे नहीं पता था रमेश के पिता इतने बड़े व्यक्तित्व के मालिक हैं , क्या नाम बताता उसका ?
डॉक्टर मृणाल सेन ' सीमा मै बांकुड़ा से ही हूं मैं बचपन से ही उसके बारे में पढ़ते आया हूं कई किताबें और टेली फिल्में बन चुकी हैं ,उनको कई पार्टियों ने न्योता दिया पर उसने संघर्ष चुनी ' पूरी श्रद्धा से सभी उसे :,तपन घोष कहते हैं पर वह बंगाल में " घोष जेठू ' के नाम से प्रसिद्ध है ।
केबिन के दुसरे कोने में डॉक्टर सुहैल चुपचाप बैठे बातें सुन रहा था तभी उसके मन में कई विचार एक साथ उमड़ पड़ा.......
क्रमशः 
जयगुरु 🙏 🙏🙏
वंदे पुरुषोत्तमम 
चंद्रा सत्संग केंद्र ,बोकारो (झारखंड)