टूटता हुआ मन - भाग 2 prem chand hembram द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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टूटता हुआ मन - भाग 2


रमेश अपनी पत्नी फरजाना की बेवफाई से भीतर ही भीतर टूट चुका था। कभी हँसी, विश्वास और अपनत्व से भरा उसका घर अब अजीब-सी खामोशी का बसेरा बन गया था। डॉक्टर सुहैल से फरजाना की बढ़ती निकटता ने उसके जीवन की सारी खुशियाँ जैसे छीन ली थीं।
दोनों प्रतिष्ठित डॉक्टर थे। धन, सम्मान, प्रभाव और समाज में ऊँचा स्थान—सब कुछ उनके पास था। रमेश एक साधारण इंजीनियर था। उसके पास न सत्ता थी, न पहुँच और न ही ऐसा कोई साधन जिससे वह इस संबंध के विरुद्ध खुलकर खड़ा हो पाता। कानून, समाज और परिस्थितियाँ—तीनों उसे असहाय बना रही थीं।
लेकिन उससे भी बड़ी बेड़ियाँ उसके अपने बच्चे थे।
जब भी वह सोचता कि इस रिश्ते को समाप्त कर दे, तभी चौदह वर्षीय शांतनु और आठ वर्षीय शानू की मासूम आँखें उसके सामने आ जातीं। वह सोचता—यदि यह घर टूट गया, तो इन बच्चों का क्या होगा? वे किसके सहारे बड़े होंगे? माँ-बाप के संघर्ष का सबसे बड़ा मूल्य तो हमेशा बच्चे ही चुकाते हैं।
इसी विचार से वह हर बार अपने आँसुओं को भीतर ही भीतर पी जाता।
कहते हैं—"इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छिपते।" यही हुआ। जो बात कभी केवल घर की चारदीवारी तक सीमित थी, वह धीरे-धीरे अस्पताल के गलियारों से निकलकर पूरे शहर में चर्चा का विषय बन गई।
किसी की जुबान पर सहानुभूति थी, तो किसी की आँखों में उपहास।
लोग कहते—"बेचारा रमेश... कितना सीधा आदमी है।"
दूसरे व्यंग्य करते—"इतनी पढ़ाई-लिखाई भी क्या काम की, जब अपना ही घर न बचा सके।"
रमेश इन बातों को सुनकर भी अनसुना कर देता। क्योंकि उसे पता था कि समाज घावों पर मरहम कम और नमक अधिक छिड़कता है।
उसने फरजाना को समझाने का कोई अवसर नहीं छोड़ा।
कभी वह पुराने दिनों की बातें करता। कभी बच्चों का भविष्य याद दिलाता। कभी दोनों परिवारों के सम्मान की दुहाई देता।
एक रात उसने काँपते स्वर में कहा—
"फरजाना... यदि मुझसे कोई भूल हुई है तो मुझे दंड दे दो, पर बच्चों को मत दंडित करो। यदि मैं अच्छा पति नहीं बन पाया, तो मुझे एक अवसर और दे दो। मैं स्वयं को बदल लूँगा।"
कुछ क्षणों तक कमरे में सन्नाटा पसरा रहा।
फरजाना ने उसकी ओर देखा, लेकिन उसकी आँखों में पहले जैसा अपनापन नहीं था। वहाँ एक अजनबीपन था, जैसे दो लोग वर्षों से एक ही छत के नीचे रहते हुए भी एक-दूसरे से बहुत दूर हो चुके हों।
उसने धीमे स्वर में केवल इतना कहा—
"अब बहुत देर हो चुकी है, रमेश।"
ये चार शब्द किसी तलवार से कम न थे।
उस रात रमेश देर तक छत को निहारता रहा। नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। उसके मन में बार-बार एक ही प्रश्न उठ रहा था—
"क्या सचमुच प्रेम इतना कमजोर होता है कि वर्षों का विश्वास कुछ महीनों के आकर्षण के सामने हार जाए?"
उत्तर कहीं नहीं था।
उधर फरजाना भी पूरी तरह निश्चिंत नहीं थी। बाहर से वह जितनी कठोर दिखाई देती, भीतर कहीं न कहीं उसका अंतर्मन उसे धिक्कारता था। जब भी शांतनु या शानू हँसते हुए उससे लिपटते, एक पल के लिए उसका मन काँप उठता। उसे लगता मानो उसके अपने ही बच्चे अनजाने में उससे पूछ रहे हों—
"माँ, हमारा घर क्यों बदल रहा है?"
पर अगले ही क्षण मोह का पर्दा उसके विवेक पर फिर से छा जाता।
पुराने लोग ठीक ही कहते हैं—
"जवानी का उन्माद और बुढ़ापे का लोभ, यदि विवेक पर हावी हो जाएँ, तो बड़े-बड़े ज्ञानी भी भटक जाते हैं।"
इसी बीच यह चर्चा शहर से निकलकर डॉक्टर सुहैल के घर तक भी पहुँच गई।
सुहैल की पत्नी, जो हैदराबाद के पुराने निज़ाम खानदान की पाँचवीं पीढ़ी से थी, अत्यंत शिक्षित, आत्मसम्मानी और स्वाभिमानी महिला थी। उसका नाम ज़ोया था।
लंबा कद, शांत व्यक्तित्व, कमर तक लहराते काले बाल, तेजस्वी आँखें और सादगी में भी झलकता शाही संस्कार—उसे देखने वाला सहज ही प्रभावित हो जाता।
वह केवल रूपवान ही नहीं, अत्यंत कर्मठ भी थी। फैशन डिज़ाइन की शिक्षा लेकर उसने अपने परिश्रम से शहर में पाँच सफल बुटीक स्थापित किए थे। उसकी आय किसी बड़े डॉक्टर से कम नहीं थी।
सात वर्ष की उसकी बेटी आयरा उसकी दुनिया थी।
जब लोगों की कानाफूसियाँ उसके कानों तक पहुँचीं, तब पहले उसने विश्वास नहीं किया। उसे लगा—समाज अक्सर सफल लोगों के बारे में झूठी बातें फैलाता है।
किन्तु जब एक के बाद एक संकेत मिलने लगे, तो उसके भीतर की पत्नी बेचैन हो उठी।
उसने न कोई हंगामा किया, न किसी पर आरोप लगाया।
उसने केवल मन-ही-मन निश्चय किया—
"यदि यह सब असत्य है, तो मैं सबसे पहले अपने पति से क्षमा माँगूँगी। लेकिन यदि यह सत्य निकला... तो निर्णय भी सत्य के आधार पर ही होगा।"
उसे नहीं पता था कि आने वाले कुछ दिनों में एक विद्यालय का छोटा-सा कार्यक्रम अनेक लोगों का जीवन बदल देगा।
वहीं से एक टूटते परिवार की वापसी की यात्रा आरंभ होने वाली थी।
शहर से दूर विस्तृत भूभाग में फैला तपोवन कॉन्वेंट स्कूल अपनी उत्कृष्ट शिक्षा और नैतिक मूल्यों के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ मुख्यतः प्रतिष्ठित और सम्पन्न परिवारों के बच्चे पढ़ते थे। लाखों रुपये की वार्षिक फीस होने के कारण प्रवेश भी चुनिंदा विद्यार्थियों को ही मिलता था।
एक दिन शांतनु उत्साह से अपनी माँ फरजाना के पास आया।
"अम्मी, पच्चीस मार्च, शनिवार को स्कूल में नैतिक एवं कौशल विकास प्रतियोगिता है। उसमें बच्चों के साथ माता-पिता का रहना भी जरूरी है। आप चलेंगी न?"
फरजाना ने बिना उसकी ओर देखे कहा—
"नहीं बेटा, उस दिन मुझे अस्पताल जाना है। तुम दोनों अपने पापा के साथ चले जाना।"
उसी समय रमेश घर के भीतर आया।
शांतनु ने वही बात दोबारा पापा को बताई।
रमेश ने शांत स्वर में फरजाना की ओर देखकर कहा—
"बच्चों के लिए हमें थोड़ा अपने आपको समायोजित करना पड़ेगा।"
फरजाना कुछ क्षण चुप रही, फिर अनमने मन से बोली—
"हूँ... ठीक है।"
देखते ही देखते पच्चीस मार्च का दिन भी आ गया।
स्कूल रंग-बिरंगी सजावट से जगमगा रहा था। चारों ओर बच्चों की चहल-पहल, अभिभावकों की मुस्कान और परिवारों की आत्मीयता वातावरण को उत्सवमय बना रही थी।
लेकिन उसी भीड़ में रमेश और फरजाना अजनबियों की तरह अलग-अलग खड़े थे। दोनों के बीच न कोई संवाद था, न पति-पत्नी जैसा अपनापन।
शांतनु कभी अपने माता-पिता को देखता, तो कभी दूसरे बच्चों के परिवारों को। उसके कोमल हृदय में दोनों के लिए अथाह प्रेम था। वह किसी एक को भी खोना नहीं चाहता था। पर वह अपने पिता की तरह असहाय था।
उसने मन ही मन आँखें बंद कर प्रार्थना की—
"हे प्रभु... हमारा घर मत टूटने देना।"
तभी मंच संचालक की आवाज़ पूरे प्रांगण में गूँज उठी...
"मेरे प्यारे बच्चों एवं आदरणीय अभिभावकों! आप सभी का इस नैतिक एवं कौशल विकास प्रतियोगिता में हार्दिक स्वागत है..."

जयगुरु🙏🙏 🙏 
वंदे पुरुषोत्तमम 
चंद्रा सत्संग केंद्र बोकारो झारखंड