समस्या नहीं , समाधान की चर्चा prem chand hembram द्वारा मनोविज्ञान में हिंदी पीडीएफ

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समस्या नहीं , समाधान की चर्चा


समस्या नहीं, समाधान की चर्चा
जड़ों को सींचने की आवश्यकता
समाज की अनेक समस्याओं पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है—नारी सम्मान पर, कन्या सुरक्षा पर, बुजुर्गों की सेवा पर, परिवारों के विघटन पर और नैतिक पतन पर भी। निस्संदेह इन प्रयासों का प्रभाव पड़ा है। सद्विचार कभी निष्फल नहीं होते। वे किसी न किसी हृदय में अंकुरित होकर परिवर्तन का कारण बनते हैं।
किन्तु आज मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि केवल समस्याओं की चर्चा पर्याप्त नहीं है। अब समय उन जड़ों की ओर देखने का है जहाँ से ये समस्याएँ जन्म लेती हैं।
वास्तव में समस्या कहाँ उत्पन्न होती है?
मेरे विचार से अप्रेम, अश्रद्धा, निन्दा, चुगली, असम्मान और अहंकार ही वे सूक्ष्म दोष हैं जो व्यक्ति, परिवार और समाज को भीतर से खोखला कर देते हैं। ये उसी प्रकार हैं जैसे श्वेत वस्त्र पर पड़े काले धब्बे। देखने में छोटे लगते हैं, पर धीरे-धीरे सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित कर देते हैं।
हम अक्सर समस्याओं पर चर्चा करते हैं, पर मुझे लगता है कि समस्या से अधिक समाधान पर चर्चा होनी चाहिए।
यदि किसी व्यक्ति के चरित्र को जानना हो तो उसका प्रमाण पड़ोसी से नहीं, बल्कि उसकी पत्नी, उसके बच्चों, उसके माता-पिता और उसके भाई-बहनों से लेना चाहिए। जो लोग उसके साथ दिन-रात रहते हैं, वही उसके वास्तविक स्वभाव और चरित्र के साक्षी होते हैं।
यदि पत्नी से पूछा जाए तो उसे गर्व होना चाहिए कि वह अपने पति की पत्नी है। यदि बच्चों से पूछा जाए तो वे यह न कहें कि उनके माता-पिता प्रतिदिन झगड़ते और एक-दूसरे का अपमान करते हैं, बल्कि वे गर्व से कहें—"मैंने अपने जीवन में कभी अपने माता-पिता को एक-दूसरे का अनादर करते नहीं देखा।"
श्रद्धा परिवार की पहली नींव है। किसी को प्रणाम करने का वास्तविक अर्थ केवल शरीर झुकाना नहीं, बल्कि अपने अहंकार को गलाना है।
घर के बड़े-बुजुर्गों और गुरुजनों को प्रतिदिन तथा प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य के आरम्भ से पूर्व श्रद्धापूर्वक प्रणाम करना चाहिए। प्रणाम का उद्देश्य केवल शरीर झुकाना नहीं, बल्कि मन को विनम्र बनाना है। जब यह संस्कार परिवार में स्थापित होता है, तब बच्चों के मन में भी अनुशासन, विनय और सम्मान के बीज पड़ते हैं।
प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त की पवित्र बेला में जब घर में प्रार्थना, नाम-स्मरण, ध्यान और बीज-मंत्र का उच्चारण होता है, तब धीरे-धीरे घर का वातावरण तामसिकता से ऊपर उठकर सात्विकता की ओर अग्रसर होने लगता है। अहंकार, निन्दा और अप्रेम के विकार शान्त होने लगते हैं। जब अहंकार गलता है तब श्रद्धा जन्म लेती है, और जहाँ श्रद्धा की खेती होती है वहाँ प्रेम का अंकुर स्वतः फूट पड़ता है। जिस घर में प्रेम की खेती होती है, वहाँ कलह अधिक समय तक टिक नहीं सकती।
आज की एक बड़ी विडम्बना यह भी है कि घर में रहने वाले लोगों के पास एक-दूसरे से बात करने का समय कम होता जा रहा है। परिवार के प्रत्येक सदस्य के हाथ में मोबाइल है और मन बाहर की दुनिया की खबरों में उलझा हुआ है। दूर देशों की घटनाओं की जानकारी तो तुरंत मिल जाती है, किन्तु उसी घर में बैठे वृद्ध माता-पिता को दो प्रेमभरे शब्द सुनाने की फुरसत किसी के पास नहीं होती।
धीरे-धीरे घरों में संवाद कम हो रहा है और एकाकीपन बढ़ रहा है। लोग साथ रहते हुए भी एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। रिश्तों के बीच निष्काम प्रेम का अभाव स्पष्ट दिखाई देता है। अपेक्षाएँ बढ़ रही हैं, पर अपनापन घटता जा रहा है; सुविधाएँ बढ़ रही हैं, पर आत्मीयता कम होती जा रही है।
बच्चे हमारे कहे हुए शब्दों से कम और हमारे आचरण से अधिक सीखते हैं। माता-पिता यदि झूठ बोलते हैं, बात छिपाते हैं या एक-दूसरे का अनादर करते हैं, तो बच्चे अनजाने में उसी का अनुकरण करने लगते हैं। अच्छी बातें समझने में समय लग सकता है, किन्तु बुरी आदतें बहुत शीघ्र प्रभाव डालती हैं। इसलिए बच्चों को संस्कार सिखाने का सर्वोत्तम उपाय उपदेश नहीं, बल्कि अपना जीवन उदाहरण बनाना है।
वास्तव में परिवार केवल एक छत के नीचे रहने का नाम नहीं है। परिवार वह स्थान है जहाँ व्यक्ति सम्मान पाता है, अपनी बात कह पाता है, प्रेम अनुभव करता है और कठिन समय में सहारा प्राप्त करता है। जब घरों से प्रेम, संवाद और श्रद्धा का वातावरण समाप्त होने लगता है, तब उसके दुष्परिणाम समाज में अनेक रूपों में दिखाई देने लगते हैं।
नारी सम्मान, बुजुर्गों का आदर, मातृत्व की रक्षा और बच्चियों की सुरक्षा की पाठशाला किसी विद्यालय में नहीं, बल्कि घर से प्रारम्भ होती है। कोई आतंकवादी, बलात्कारी, चोर, दलाल या भ्रष्ट व्यक्ति आकाश से नहीं उतरता। वह भी किसी न किसी घर, वातावरण और संस्कार का परिणाम होता है।
यदि समस्या की जड़ संस्कारों का अभाव है, तो समाधान संस्कारों का विकास है। संस्कार अच्छी आदतों से आते हैं और आदतें मन द्वारा संचालित होती हैं।
जैसे बाह्य शरीर असंख्य कोशिकाओं से निर्मित है, वैसे ही मनुष्य का अंतर्जगत उसके विचारों, प्रवृत्तियों, आदतों और संस्कारों से निर्मित होता है। मन ही वह भूमि है जहाँ अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के बीज अंकुरित होते हैं।
मन अत्यंत चंचल है। जैसे माचिस की तीली को बारूद पर रगड़े बिना अग्नि प्रकट नहीं होती, वैसे ही मन रूपी चंचल घोड़े पर लगाम लगाए बिना उत्तम आदतें और श्रेष्ठ संस्कार विकसित नहीं होते।
संसार में अधिकांश लोग यह जानते हैं कि कौन-सा कर्म उचित है और कौन-सा अनुचित। फिर भी मनुष्य अनेक बार वही करता है जिसे वह स्वयं गलत मानता है। इसका कारण अज्ञान नहीं, बल्कि प्रवृत्तियों की दासता है। वह जानता कुछ और है, करता कुछ और है।
तब प्रश्न उठता है कि मन का स्वामी कैसे बना जाए?
क्या केवल शास्त्रों का अध्ययन पर्याप्त है? नहीं।
क्या केवल सत्संग में जाना पर्याप्त है? नहीं।
क्या केवल पूजा-पाठ या धार्मिक अनुष्ठान पर्याप्त हैं? नहीं।
ये सभी साधन अत्यंत सहायक हैं, किन्तु मन के वास्तविक रूपांतरण के लिए निरंतर अभ्यास आवश्यक है। मेरे विचार से सत्-दीक्षा, नाम-स्मरण, आत्मनिरीक्षण और नियमित साधना इस दिशा में अत्यंत प्रभावी साधन हैं। जब मनुष्य निरंतर अभ्यास करता है, तब धीरे-धीरे उसका मन संयमित होने लगता है। प्रवृत्तियों की दासता कम होती है और आत्मनियंत्रण बढ़ता है।
यह विचार किसी एक धर्म, सम्प्रदाय या मत-विशेष तक सीमित नहीं है। जहाँ कहीं भी मनुष्य नियमित रूप से ईश्वर-स्मरण, प्रार्थना, आत्मचिंतन और अनुशासित जीवन का अभ्यास करता है, वहाँ उसके सकारात्मक परिणाम दिखाई देते हैं।
मैंने अनेक मुस्लिम भाइयों को देखा है जो नियमित रूप से पाँच वक्त की नमाज़ अदा करते हैं, कुरआन की आयतें पढ़ते हैं, उन पर मनन करते हैं और अपने बच्चों को भी इस प्रक्रिया में सहभागी बनाते हैं। स्वाभाविक रूप से ऐसे परिवारों में अनुशासन, बड़ों का सम्मान और धार्मिक संस्कार अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देते हैं।
इसी प्रकार विभिन्न मतों और समुदायों में भी जहाँ परिवार के सदस्य नियमित रूप से सामूहिक प्रार्थना, उपासना, सत्संग या धार्मिक-अध्यात्मिक अभ्यास में सम्मिलित होते हैं, वहाँ बच्चों के मन में श्रद्धा, जिज्ञासा और अनुशासन के बीज स्वतः पड़ने लगते हैं। संभव है कि सभी बच्चे उस मार्ग को पूर्ण रूप से न अपनाएँ, किन्तु उनके भीतर एक सकारात्मक संस्कार और आध्यात्मिक जिज्ञासा अवश्य जन्म लेती है।
यहाँ किसी विशेष पूजा-पद्धति की श्रेष्ठता का प्रश्न नहीं है। पद्धतियाँ भिन्न हो सकती हैं, भाषाएँ भिन्न हो सकती हैं, उपासना के तरीके भिन्न हो सकते हैं, किन्तु मन को संयमित और संस्कारित करने का उद्देश्य सभी में समान है।
भारतीय चिंतन में कहा गया है—"मनुष्य के बंधन और मुक्ति दोनों का कारण मन ही है।" यदि यह बात सत्य है, तो समस्या भी मन में है और समाधान भी मन में है। साधना का वास्तविक उद्देश्य बाहरी प्रदर्शन नहीं, बल्कि मन का परिष्कार है।
यहीं से अच्छे विचार जन्म लेते हैं। अच्छे विचारों से अच्छे कर्म, अच्छे कर्मों से अच्छी आदतें, अच्छी आदतों से संस्कार और संस्कारों से श्रेष्ठ परिवार तथा श्रेष्ठ समाज का निर्माण होता है।
अतः आवश्यकता केवल समस्याओं की गणना करने की नहीं, बल्कि जड़ों को सींचने की है। शिक्षा से विवेक, दीक्षा से चरित्र, सुविवाह से संस्कारित परिवार और संस्कारित परिवार से सुसंस्कृत समाज का निर्माण होता है।
हम अक्सर पत्तों को सींचने में लगे रहते हैं, जबकि आवश्यकता जड़ों को जल देने की है। जड़ स्वस्थ होगी तो शाखाएँ, पत्ते, फूल और फल सब अपने आप स्वस्थ हो जाएँगे।
जब घरों में प्रेम होगा, श्रद्धा होगी, संवाद होगा और संस्कार होंगे, तब नारी सम्मान, कन्या सुरक्षा, बुजुर्गों का आदर और सामाजिक सद्भाव किसी अभियान का विषय नहीं रहेंगे, बल्कि जीवन का स्वाभाविक व्यवहार बन जाएँगे।
समाज का परिवर्तन संसदों, अदालतों और कानूनों से पहले घरों में प्रारम्भ होता है। और घर का परिवर्तन व्यक्ति के मन से प्रारम्भ होता है। इसलिए यदि हम वास्तव में एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें समस्याओं की शाखाओं से अधिक उनके मूल कारणों पर ध्यान देना होगा।
पानी पत्तों में नहीं, जड़ों में देने की आवश्यकता है।
यही स्थायी समाधान है।
"समस्या भी मन में है और समाधान भी मन में है " 

जयगुरु 🙏 🙏 🙏 
वंदे पुरुषोत्तमम 
चंद्रा सत्संग केंद्र , बोकारो (झारखंड)