अध्याय 2: पुस्तकालय और लड़का
ज़िला पुस्तकालय हवेली से तीन किलोमीटर दूर था। पुरानी इमारत, टूटी सीढ़ियाँ, पंखे जो आवाज़ करते हुए चलते थे। पर गौरी के लिए वह पूरी दुनिया थी।
वह हफ़्ते में दो बार जाती, बहाना बना कर, “मंदिर जा रही हूँ” या “सहेली से मिलने।” ड्राइवर को छुट्टी दे देती, पैदल जाती। कोई पूछता तो कहती घूमने निकली थी।
वहीं उसकी मुलाक़ात आरव से हुई।
कुर्ता पजामा, हवाई चप्पल, आँखों में एक आग जो गौरी ने पहले कभी किसी में नहीं देखी थी। उसके बाबा मज़दूर थे, गुज़र गए थे जब आरव बारह साल का था। माँ लोगों के घरों में बर्तन माँजती थी, सुबह से शाम तक। आरव खुद ट्यूशन पढ़ा कर अपना खर्चा निकालता था, और बाकी समय वही परीक्षा की तैयारी करता था जिसका सपना गौरी देखती थी।
पहली बार बात हुई जब गौरी की किताब ज़मीन पर गिर गई और आरव ने उठा कर दी।
“भारतीय संविधान?” उसने पन्ने देखे। “तुम भी पढ़ाई कर रही हो इसके लिए?”
गौरी ने सिर हिलाया, फिर रुक गई। “तुम यहाँ क्यों हैरान हो रहे हो?”
आरव हँसा। “नाराज़ मत होना, पर… तुम्हारी गाड़ी बाहर खड़ी देखी थी मैंने। सेठ धरमचंद की बेटी हो ना?”
“हाँ। तो?”
“तो ये है कि इतनी बड़ी हवेली वालों को आमतौर पर ये किताबें नहीं चाहिए होती। उनके पास तो सब कुछ पहले से है।”
गौरी की आवाज़ में थोड़ी तेज़ी आ गई। “सपने अमीर गरीब नहीं देखते, आरव।” फिर रुक गई, “तुम्हारा नाम कैसे…”
“लाइब्रेरियन अंकल बताते हैं हर नए चेहरे का नाम।” उसने मुस्कुराते हुए कहा। “तुम्हें क्या लगता है, पैसा होने से पंख मिल जाते हैं?”
दोनों हँस दिए।
फिर रोज़ मिलना शुरू हो गया। एक बेंच, दो किताबें, एक सपना।
बहस होती, “राजनीति में नैतिकता बची है क्या?” आरव कहता नहीं, गौरी कहती हाँ, बहुत देर तक दोनों अपनी अपनी बात पर अड़े रहते।
हँसी भी होती। एक दिन गौरी ने मज़ाक में कहा, “अगर मैं अफ़सर बनी तो सबसे पहले तेरा घर पक्का करवाऊँगी।”
आरव ने तुरंत जवाब दिया, “और अगर मैं अफ़सर बना तो तेरी हवेली के सामने साइकिल स्टैंड खोलूँगा। फ़्री पार्किंग, सिर्फ़ हवेली वालों के लिए।”
गौरी हँसते हँसते रुक नहीं पाई। बहुत दिनों बाद किसी ने उसे ऐसे हँसाया था।
आरव की बातों में एक सच्चाई थी जो हवेली के झूठे शिष्टाचार में नहीं मिलती थी। वह सीधा बोलता, बिना डरे, बिना ये सोचे कि सामने वाला उसकी बात से नाराज़ हो जाएगा।
एक दिन गौरी ने पूछा, “तुम्हें डर नहीं लगता? इतनी मुश्किलें हैं, फिर भी पढ़ रहे हो।”
आरव ने किताब बंद की। “डर लगता है, गौरी। हर दिन लगता है। माँ का बुढ़ापा, पैसों की कमी, सब। पर अगर डर के बैठ जाऊँ तो ज़िंदगी वैसी ही रहेगी जैसी मेरे बाबा की थी। मैं बदलाव चाहता हूँ। सिर्फ़ अपने लिए नहीं, अपने जैसे सब लोगों के लिए।”
गौरी ने पहली बार किसी को इतनी साफ़गोई से अपना सपना बोलते सुना था।
“मेरे लिए ये पिंजरा तोड़ने जैसा है,” उसने कहा। “तुम्हारे लिए ये पिंजरे से बाहर निकलने जैसा है। शायद हम दोनों एक ही जगह मिल रहे हैं।”
आरव ने उसकी तरफ़ देखा, पहली बार थोड़ी देर तक कुछ नहीं बोला। फिर बस मुस्कुरा दिया।
घर में सब कुछ अकेलेपन से भरा था। पुस्तकालय में ज़िंदगी थी।
अध्याय 3: रिश्ता और इनकार
“बात पक्की हो गई है,” धरमचंद ने एक शाम ऐलान किया, जैसे कोई बिज़नेस डील सुना रहे हों। पूरा परिवार बैठक में था, बुआ भी, चाचा भी।
“अग्रवाल जी का लड़का। दुबई में रहता है। पंद्रह दिन में सगाई, तीन महीने में शादी।”
सब ने तालियाँ बजाई। माँ की आँखों में आँसू थे, खुशी के या किसी और वजह से, गौरी समझ नहीं पाई।
गौरी अपने कमरे में गई और सीधी दर्पण के सामने बैठ गई। उसके हाथ काँप रहे थे।
रात को धरमचंद खुद उसके कमरे में आए, हाथ में एक डिब्बा। खोला तो हीरे का हार था, चमकता हुआ।
“ये ले। सगाई पर पहनना। और वो परीक्षा वैक्षा का भूत उतार दे दिमाग़ से। मेरी बेटी किसी दफ़्तर में बैठ कर हुकुम नहीं बजाएगी। हुकुम देगी, अपने घर में, अपने पति पर।”
गौरी ने हार की तरफ़ देखा भी नहीं। “बाउजी, मैं हुकुम नहीं, इंसाफ़ देना चाहती हूँ। उन लड़कियों को जिनकी आवाज़ आप जैसे बाप दबा देते हैं।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
धरमचंद का चेहरा बदल गया। “ये क्या बोल रही है तू?”
“सच, बाउजी। आप मुझे प्यार करते हैं, मुझे पता है। पर आपका प्यार मुझे एक पिंजरे में बंद करना चाहता है। मैं वो नहीं बनना चाहती जो आप चाहते हैं। मैं वो बनना चाहती हूँ जो मैं बन सकती हूँ।”
“बंद कर ये बकवास!” धरमचंद की आवाज़ पहली बार इतनी ऊँची हुई। “तुझे पता है इस रिश्ते के लिए मैंने क्या क्या किया? अग्रवाल जी से मेरे बिज़नेस के रिश्ते हैं। ये शादी सिर्फ़ तेरी नहीं, हमारी इज़्ज़त की बात है।”
“तो ये मेरी ज़िंदगी नहीं, आपकी इज़्ज़त का सौदा है?”
हाथ उठा, पर रुक गया हवा में। धरमचंद ने अपने आप को रोक लिया, साँस भारी हो गई।
“तू समझ नहीं रही, गौरी। दुनिया ऐसी नहीं चलती जैसा तू सोचती है। लड़कियाँ सपने नहीं, घर बनाती हैं।”
गौरी की आँखों में आँसू थे, पर आवाज़ में नहीं। “फिर मैं वो लड़की नहीं बनूँगी, बाउजी।”
धरमचंद हार वापस डिब्बे में रख कर चले गए, दरवाज़ा ज़ोर से बंद करते हुए।
माँ बाहर खड़ी सब सुन रही थी, पर अंदर नहीं आई।
गौरी ने उस रात नींद नहीं ली। डायरी निकाली, लिखा, “पहली बार बोली। डर लगा, पर अच्छा भी लगा। शायद यही शुरुआत है।”
अगले दिन हवेली में सब कुछ सामान्य लग रहा था, पर हवा में एक तनाव था जो सब महसूस कर रहे थे। नौकर भी धीरे बोलते, बुआ की नज़रें गौरी पर टिकी रहती।
गौरी पुस्तकालय गई उस दिन भी। आरव को सब बताया।
“उन्होंने मुझे शादी के लिए मजबूर करने की कोशिश की,” उसने कहा, आवाज़ काँप रही थी। “मैंने इनकार कर दिया।”
आरव ने उसका हाथ पकड़ा, पहली बार। “तुम्हें डर लग रहा है?”
“बहुत। पर पछतावा नहीं है।”
“यही फ़र्क़ होता है, गौरी, डरने और हार मानने में। तुम डर सकती हो, पर हार मत मानना।”
गौरी ने उसकी तरफ़ देखा और जाना कि ये सिर्फ़ शुरुआत थी। आगे जो आने वाला था, वह इससे कहीं ज़्यादा कठिन होगा।