अध्याय 4: तूफ़ान...
सुबह हवेली में एक अजीब सी खामोशी थी। नौकर इधर उधर घूम रहे थे, पर कोई किसी से नहीं बोल रहा था। गौरी जानती थी कि ये तूफ़ान से पहले की शांति है।बुआ सुबह सुबह धरमचंद के कमरे में गई थीं, दरवाज़ा बंद करके। आधे घंटे बाद धरमचंद बाहर निकले, चेहरे पर वह सख़्ती जो गौरी ने पहले कभी नहीं देखी थी।“गौरी को बुलाओ,” उन्होंने नौकर से कहा, आवाज़ ठंडी, बर्फ़ जैसी।गौरी बैठक में आई तो पूरा परिवार वहाँ बैठा था। माँ एक कोने में सिर झुकाए, बुआ अपनी जगह पर ऐसे बैठी थीं जैसे कोई फ़ैसला सुनने वाली हों। चाचा भी थे, और दो तीन नौकर दरवाज़े के पास खड़े, बिन बुलाए तमाशा देखने।“बैठ,” धरमचंद ने कहा।गौरी खड़ी रही। “क्या बात है, बाउजी?”धरमचंद ने एक काग़ज़ उसकी तरफ़ फेंका। गौरी ने उठाया, देखा, हाथ काँपने लगे। ये पुस्तकालय की सदस्यता का फ़ॉर्म था, उसके नाम का, और साथ में एक नोट जिसमें आरव का नाम भी लिखा था, लाइब्रेरियन की लिखावट में, “मिस गौरी और मिस्टर आरव, दोनों एक साथ पढ़ते हैं, रोज़।”“बुआ ने पता लगाया,” धरमचंद बोले, हर शब्द तराशा हुआ। “तीन महीने से तू झूठ बोल रही है। मंदिर के नाम पर, सहेली के नाम पर। और जा कर बैठती है किसी मज़दूर के बेटे के साथ, बेंच पर, सरेआम।”“उसका नाम आरव है, बाउजी। और वो मज़दूर का बेटा नहीं, वो…”“मुझे उसका नाम नहीं जानना!” धरमचंद की आवाज़ इतनी ऊँची हुई कि बाहर खड़े नौकर भी चौंक गए। “मुझे ये जानना है कि मेरी बेटी, सेठ धरमचंद की बेटी, गली के एक लड़के के साथ अकेली बैठती है, घंटों, और मुझे पता भी नहीं चला!”“हम पढ़ते हैं, बाउजी। सिर्फ़ पढ़ते हैं।”“पढ़ते हैं?” बुआ बीच में बोल पड़ी, आवाज़ में तंज़। “इतनी भोली मत बन, गौरी। मर्द औरत साथ बैठें, घंटों, रोज़, तो सिर्फ़ किताबें नहीं पढ़ी जाती। पूरे मोहल्ले में बात फैल गई है। कल हमारी हवेली के बाहर खड़े होकर लोग हँसेंगे।”“बात फैली है तो उन लोगों से पूछो जो फैला रहे हैं, बुआ। मैंने कुछ गलत नहीं किया।”“गलत नहीं किया?” धरमचंद अब खड़े हो गए थे। “एक हफ़्ते में सगाई होनी है तेरी, और तू कहती है गलत नहीं किया? अग्रवाल जी को पता चल गया तो क्या होगा, सोचा है? वो रिश्ता टूट जाएगा, और साथ में मेरी पूरी इज़्ज़त।”“तो ये सवाल इज़्ज़त का है, मेरी ज़िंदगी का नहीं?”“तेरी ज़िंदगी मेरी इज़्ज़त से अलग नहीं है, गौरी!” धरमचंद चिल्लाए। “तू समझ क्यों नहीं रही? इस घर में जो भी तू करती है, उसका असर हम सब पर पड़ता है। तेरा एक गलत कदम पूरे खानदान को बदनाम कर सकता है।”गौरी की आँखों में आँसू थे, पर इस बार गुस्से के। “तो मैं सिर्फ़ एक नाम हूँ, बाउजी? आपकी इज़्ज़त का बोर्ड, जिसे सही जगह टांगना है?”“ज़ुबान!” धरमचंद का हाथ उठा, इस बार रुका नहीं। थप्पड़ की आवाज़ पूरी बैठक में गूँज गई।सन्नाटा। माँ की सिसकी सुनाई दी, दबी हुई, डर में लिपटी हुई।गौरी का गाल लाल हो गया, पर वह हिली नहीं। आँखों में आँसू थे, पर आवाज़ सीधी रही। “आपने मुझे मारा। पहली बार। याद रखूँगी, बाउजी।”धरमचंद का हाथ अभी भी हवा में था, जैसे खुद उन्हें यकीन न हो कि उन्होंने क्या किया। उनकी आँखों में एक पल के लिए कुछ टूटा, पर फिर वही सख़्ती लौट आई, ज़्यादा गहरी।“तू ये घर छोड़ कर जा सकती है अगर तुझे वो लड़का इतना प्यारा है,” उन्होंने कहा, आवाज़ नीची पर ज़्यादा खतरनाक। “पर एक बार बाहर गई, तो वापसी का रास्ता बंद। समझी? जिस दिन तू उस मज़दूर के बेटे के साथ इस दरवाज़े से निकली, उस दिन से मेरे लिए तू मर गई।”“बाउजी, ऐसा मत बोलिए,” माँ रोते हुए उठीं, पर धरमचंद ने हाथ उठा कर उन्हें भी रोक दिया।“तू चुप रह। तूने ही इसे इतना खुला छोड़ दिया, किताबें पढ़ने दी, बाहर जाने दिया। आज का दिन तेरी गलती का नतीजा है।”गौरी ने माँ की तरफ़ देखा, फिर बाउजी की तरफ़। “आप सही कहते हैं, बाउजी। मैंने झूठ बोला, मंदिर के नाम पर बाहर गई। उसके लिए मैं माफ़ी माँगती हूँ। पर आरव के साथ बैठना, पढ़ना, सपना देखना, ये गलती नहीं थी। ये पहली सही बात थी जो मैंने अपने लिए की।”“सही बात?” बुआ ने मुँह बनाया। “इज़्ज़त खो कर सही बात?”“इज़्ज़त सिर्फ़ शादी से नहीं बनती, बुआ। इज़्ज़त तब बनती है जब इंसान अपने पैरों पर खड़ा हो। मैं वो बनना चाहती हूँ।”धरमचंद ने गहरी साँस ली, जैसे खुद को रोकने की आख़िरी कोशिश कर रहे हों। “गौरी, आख़िरी बार पूछ रहा हूँ। वो किताबें, वो लड़का, वो पागलपन, सब छोड़ दे। अग्रवाल जी के यहाँ खुश रहेगी। बड़ा घर, इज़्ज़त, सब मिलेगा।”“और अगर मैं ना कहूँ?”“तो आज ही इस घर से निकल जा। खाली हाथ। ना पैसा, ना गाड़ी, ना हमारा नाम। जैसी आई थी, वैसी जा।”कमरे में सब की निगाहें गौरी पर थीं। माँ की आँखों में एक मिनती थी, “रुक जा, बेटी।” बुआ की आँखों में जीत की चमक थी। चाचा खामोश, बस तमाशा देख रहे थे।गौरी ने एक पल के लिए आँखें बंद की। फिर खोली।“ठीक है, बाउजी। मैं जाती हूँ।”धरमचंद के चेहरे पर एक झटका लगा, जैसे उन्हें उम्मीद नहीं थी कि गौरी सच में हाँ कह देगी। “गौरी…”“आपने ही कहा था, बाउजी। खाली हाथ जाऊँ। ठीक है। पर एक बात याद रखिएगा, जिस दिन मैं अपने पैरों पर खड़ी होऊँगी, उस दिन मैं वापस आऊँगी। अपने नाम के साथ, आपकी इज़्ज़त भीख माँगने नहीं।”वह मुड़ी और सीढ़ियों की तरफ़ चली।“गौरी!” माँ चिल्लाई, दौड़ कर उसके पीछे आई। ऊपर कमरे में दोनों माँ बेटी लिपट गईं, माँ की सिसकियाँ रुक नहीं रही थीं।“मत जा, बेटी। तेरे बाउजी गुस्से में हैं, मान जाएँगे। रुक जा।”“माँ, ये गुस्सा नहीं है। ये वो हैं, जो हमेशा से थे। सिर्फ़ आज मैंने मानने से इनकार किया।”माँ ने उसका चेहरा हाथों में लिया। “मुझे डर लगता है, गौरी। बाहर की दुनिया कठिन है। यहाँ कम से कम तू सुरक्षित है।”“सुरक्षित, माँ? या बंद?” गौरी ने माँ के हाथ अपने हाथों में लिए। “मैं लौटूँगी, माँ। वादा करती हूँ। पर अपनी शर्तों पर।”उसने एक छोटा बैग उठाया, सिर्फ़ कुछ कपड़े और वो किताबें जो ट्रंक में छुपी थीं। डायरी सबसे ऊपर रखी।नीचे उतरते वक़्त धरमचंद दरवाज़े के पास खड़े थे, पीठ मोड़े। गौरी रुकी, एक पल, उम्मीद में कि वह मुड़ेंगे। नहीं मुड़े।वह बाहर निकल गई। हवेली का बड़ा दरवाज़ा उसके पीछे बंद हुआ, एक भारी आवाज़ के साथ, जैसे कोई अध्याय खत्म हुआ हो।अध्याय 5: नया आसराआरव के दरवाज़े पर खड़ी गौरी को खुद यकीन नहीं हो रहा था कि वह यहाँ पहुँच गई। हाथ में एक बैग, दिल में हज़ार सवाल, और पीछे एक हवेली जो अब उसका घर नहीं थी।आरव ने दरवाज़ा खोला तो उसका चेहरा एक पल के लिए डर से भर गया। “गौरी? क्या हुआ? तुम ठीक हो?”गौरी कुछ नहीं बोल पाई, बस आँसू बहने लगे। आरव ने उसे अंदर बुलाया।छोटा सा कमरा, दो खिड़कियाँ, एक चारपाई, एक मेज़ जिस पर किताबें करीने से रखी थीं। दीवार पर आरव के बाबा की एक धुंधली तस्वीर।आरव की माँ रसोई से बाहर आई, हाथ में आटे से सना कपड़ा। गौरी को देख कर हैरान रह गई।“बेटा, ये कौन है?”आरव ने झिझकते हुए सब बताया, जल्दी जल्दी, घर से निकलने तक की पूरी बात। माँ का चेहरा कई भावों से गुज़रा, हैरानी, चिंता, और आख़िर में एक नरमी।“बैठ, बेटी,” उन्होंने कहा, गौरी का हाथ पकड़ कर। “खाना खा कर बात करते हैं।”उस रात गौरी ज़मीन पर बिछी चटाई पर सोई, छत से पंखे की जगह एक टूटा हुआ पंखा हिल रहा था, बाहर से रिक्शों की आवाज़ें आ रही थीं। हवेली के नरम बिस्तर से बहुत अलग। पर पहली बार उसे लगा कि वह अपनी मर्ज़ी से कहीं है।दिन बदलने लगे। गौरी ने आरव की माँ के साथ काम बाँटना शुरू किया, सुबह झाड़ू, बर्तन, फिर दोपहर में दो घर ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया कुछ पैसे कमाने के लिए। शुरुआत में हाथ काँपते थे, हवेली की बेटी जो कभी अपने कपड़े खुद नहीं धोती थी, अब बर्तन माँज रही थी।आरव ने एक दिन देखा, हाथ में दर्द से उसकी मुश्किल। “रुक जाओ, गौरी। ये काम मत करो।”“क्यों ना करूँ? यहाँ रहूँगी, तो अपने हिस्से का काम करूँगी। मुझे बोझ नहीं बनना।”“तुम बोझ नहीं हो। तुम मेरी…” आरव की बात अधूरी रह गई, दोनों के चेहरे पर शर्म की हल्की लाली।रातें पढ़ाई में बीतती। दोनों एक ही मेज़ पर, मोमबत्ती की रोशनी में, क्योंकि बिजली का बिल बचाना ज़रूरी था। गौरी की किताबों के हाशिये पर अब नए नोट्स लिखे होते, आरव की लिखावट में सुझाव, गौरी के जवाब।एक रात आरव ने पूछा, “पछतावा होता है कभी?”गौरी ने किताब से नज़र उठाई। “किस बात का?”“हवेली छोड़ने का। वो ज़िंदगी, वो आराम।”गौरी मुस्कुराई, हल्की सी, थकी हुई पर सच्ची। “आराम और सुकून अलग चीज़ें हैं, आरव। हवेली में आराम था, पर सुकून यहाँ है। हर रात जब मैं इन किताबों के साथ सोती हूँ, मुझे लगता है मैं अपनी ज़िंदगी जी रही हूँ, किसी और की नहीं।”आरव ने कुछ नहीं कहा, बस उसकी तरफ़ देखता रहा, जैसे कोई दुर्लभ चीज़ देख रहा हो।पैसों की तंगी रोज़ की लड़ाई थी। किताबें महँगी, कोचिंग का खर्चा, घर का राशन। आरव दो जगह ट्यूशन पढ़ाता, फिर रात को पढ़ता। गौरी भी अब तीन घर पढ़ाने लगी थी।एक दिन गौरी की पुरानी सहेली बाज़ार में मिल गई, हवेली की दुनिया से। उसने हैरानी से देखा, “गौरी? तू… यहाँ? ये क्या हाल बना लिया है तूने?”गौरी ने मुस्कुरा कर जवाब दिया, “हाल बना नहीं, बना रही हूँ। फ़र्क़ है।”सहेली समझ नहीं पाई, सिर हिलाते हुए चली गई। गौरी को बुरा नहीं लगा। उसे पता था कि जो लोग पिंजरे के बाहर की दुनिया नहीं समझते, वो कभी समझ भी नहीं पाएँगे।रात को डायरी में लिखा, “आज पुरानी दुनिया से मिली। दया की नज़रों का सामना किया। पर अंदर कोई हलचल नहीं हुई। शायद यही मज़बूती है, जो पिंजरे में नहीं मिलती।”हवेली से कोई खबर नहीं आई। ना माँ का फ़ोन, ना बाउजी का संदेश। गौरी हर रोज़ इंतज़ार करती, और हर रोज़ खुद को समझाती कि इंतज़ार छोड़ देना ही बेहतर है।पर परीक्षा की तारीख़ नज़दीक आ रही थी, और गौरी अपनी सारी ताकत उसी एक लक्ष्य में लगाने लगी, जैसे वही उसका रास्ता हो, वापसी का, और खुद को साबित करने का यहाँ कम से कम तू सुरक्षित है।”
“सुरक्षित, माँ? या बंद?” गौरी ने माँ के हाथ अपने हाथों में लिए। “मैं लौटूँगी, माँ। वादा करती हूँ। पर अपनी शर्तों पर।”
उसने एक छोटा बैग उठाया, सिर्फ़ कुछ कपड़े और वो किताबें जो ट्रंक में छुपी थीं। डायरी सबसे ऊपर रखी।
नीचे उतरते वक़्त धरमचंद दरवाज़े के पास खड़े थे, पीठ मोड़े। गौरी रुकी, एक पल, उम्मीद में कि वह मुड़ेंगे। नहीं मुड़े।
वह बाहर निकल गई। हवेली का बड़ा दरवाज़ा उसके पीछे बंद हुआ, एक भारी आवाज़ के साथ, जैसे कोई अध्याय खत्म हुआ हो।
अध्याय 5: नया आसरा.....
आरव के दरवाज़े पर खड़ी गौरी को खुद यकीन नहीं हो रहा था कि वह यहाँ पहुँच गई। हाथ में एक बैग, दिल में हज़ार सवाल, और पीछे एक हवेली जो अब उसका घर नहीं थी।
आरव ने दरवाज़ा खोला तो उसका चेहरा एक पल के लिए डर से भर गया। “गौरी? क्या हुआ? तुम ठीक हो?”
गौरी कुछ नहीं बोल पाई, बस आँसू बहने लगे। आरव ने उसे अंदर बुलाया।
छोटा सा कमरा, दो खिड़कियाँ, एक चारपाई, एक मेज़ जिस पर किताबें करीने से रखी थीं। दीवार पर आरव के बाबा की एक धुंधली तस्वीर।
आरव की माँ रसोई से बाहर आई, हाथ में आटे से सना कपड़ा। गौरी को देख कर हैरान रह गई।
“बेटा, ये कौन है?”
आरव ने झिझकते हुए सब बताया, जल्दी जल्दी, घर से निकलने तक की पूरी बात। माँ का चेहरा कई भावों से गुज़रा, हैरानी, चिंता, और आख़िर में एक नरमी।
“बैठ, बेटी,” उन्होंने कहा, गौरी का हाथ पकड़ कर। “खाना खा कर बात करते हैं।”
उस रात गौरी ज़मीन पर बिछी चटाई पर सोई, छत से पंखे की जगह एक टूटा हुआ पंखा हिल रहा था, बाहर से रिक्शों की आवाज़ें आ रही थीं। हवेली के नरम बिस्तर से बहुत अलग। पर पहली बार उसे लगा कि वह अपनी मर्ज़ी से कहीं है।
दिन बदलने लगे। गौरी ने आरव की माँ के साथ काम बाँटना शुरू किया, सुबह झाड़ू, बर्तन, फिर दोपहर में दो घर ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया कुछ पैसे कमाने के लिए। शुरुआत में हाथ काँपते थे, हवेली की बेटी जो कभी अपने कपड़े खुद नहीं धोती थी, अब बर्तन माँज रही थी।
आरव ने एक दिन देखा, हाथ में दर्द से उसकी मुश्किल। “रुक जाओ, गौरी। ये काम मत करो।”
“क्यों ना करूँ? यहाँ रहूँगी, तो अपने हिस्से का काम करूँगी। मुझे बोझ नहीं बनना।”
“तुम बोझ नहीं हो। तुम मेरी…” आरव की बात अधूरी रह गई, दोनों के चेहरे पर शर्म की हल्की लाली।
रातें पढ़ाई में बीतती। दोनों एक ही मेज़ पर, मोमबत्ती की रोशनी में, क्योंकि बिजली का बिल बचाना ज़रूरी था। गौरी की किताबों के हाशिये पर अब नए नोट्स लिखे होते, आरव की लिखावट में सुझाव, गौरी के जवाब।
एक रात आरव ने पूछा, “पछतावा होता है कभी?”
गौरी ने किताब से नज़र उठाई। “किस बात का?”
“हवेली छोड़ने का। वो ज़िंदगी, वो आराम।”
गौरी मुस्कुराई, हल्की सी, थकी हुई पर सच्ची। “आराम और सुकून अलग चीज़ें हैं, आरव। हवेली में आराम था, पर सुकून यहाँ है। हर रात जब मैं इन किताबों के साथ सोती हूँ, मुझे लगता है मैं अपनी ज़िंदगी जी रही हूँ, किसी और की नहीं।”
आरव ने कुछ नहीं कहा, बस उसकी तरफ़ देखता रहा, जैसे कोई दुर्लभ चीज़ देख रहा हो।
पैसों की तंगी रोज़ की लड़ाई थी। किताबें महँगी, कोचिंग का खर्चा, घर का राशन। आरव दो जगह ट्यूशन पढ़ाता, फिर रात को पढ़ता। गौरी भी अब तीन घर पढ़ाने लगी थी।
एक दिन गौरी की पुरानी सहेली बाज़ार में मिल गई, हवेली की दुनिया से। उसने हैरानी से देखा, “गौरी? तू… यहाँ? ये क्या हाल बना लिया है तूने?”
गौरी ने मुस्कुरा कर जवाब दिया, “हाल बना नहीं, बना रही हूँ। फ़र्क़ है।”
सहेली समझ नहीं पाई, सिर हिलाते हुए चली गई। गौरी को बुरा नहीं लगा। उसे पता था कि जो लोग पिंजरे के बाहर की दुनिया नहीं समझते, वो कभी समझ भी नहीं पाएँगे।
रात को डायरी में लिखा, “आज पुरानी दुनिया से मिली। दया की नज़रों का सामना किया। पर अंदर कोई हलचल नहीं हुई। शायद यही मज़बूती है, जो पिंजरे में नहीं मिलती।”
हवेली से कोई खबर नहीं आई। ना माँ का फ़ोन, ना बाउजी का संदेश। गौरी हर रोज़ इंतज़ार करती, और हर रोज़ खुद को समझाती कि इंतज़ार छोड़ देना ही बेहतर है।
पर परीक्षा की तारीख़ नज़दीक आ रही थी, और गौरी अपनी सारी ताकत उसी एक लक्ष्य में लगाने लगी, जैसे वही उसका रास्ता हो, वापसी का, और खुद को साबित करने का।