खोटा सिक्काफागुन का महीना था।
आम के वृक्षों पर बौर आ चुके थे। पलाश के फूलों से पूरा गाँव मानो अग्नि की लालिमा से रंग उठा था। बेला की सुगंध हवा में घुलकर वातावरण को मधुर बना रही थी। खेतों में सरसों की अंतिम पीली छटा झिलमिला रही थी और कोयल की पहली कूक वसंत के आगमन की घोषणा कर रही थी।
उसी गाँव में पंडित रामशंकर झा का बड़ा नाम था।
संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान, महाविद्यालय के प्राध्यापक, सौ एकड़ उपजाऊ भूमि के स्वामी और समाज के सम्मानित व्यक्ति। विशाल हवेली, आम और लीची के बाग, नौकर-चाकर, धन-दौलत—किसी वस्तु की कमी नहीं थी।
उनकी पत्नी पद्मावती देवी सरल, करुणामयी और धर्मपरायण थीं।
उनके तीन पुत्र थे।
बड़ा पुत्र उमाशंकर एक प्रसिद्ध चिकित्सक था।
मंझला पुत्र अनिल विदेश की एक बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत था।
और सबसे छोटा पुत्र था शिवनन्दन।
सब उसे प्यार से शिबू कहते थे।
परन्तु रामशंकर झा के लिए वही जीवन की सबसे बड़ी निराशा था।
शिबू का मन पढ़ाई में कभी नहीं लगा। किसी तरह उसने दसवीं की परीक्षा उत्तीर्ण की थी।
लेकिन उसका मन उन चीज़ों में लगता था जिन्हें संसार महत्व नहीं देता।
वह घंटों गायों को निहारता रहता। घायल पक्षियों को घर ले आता। पेड़-पौधों से बातें करता। किसी किसान का बैल बीमार पड़ जाए तो उसकी सेवा में लग जाता। गाँव का कोई कुत्ता घायल हो जाए तो उसे अपने हाथों से खाना खिलाता।
उसे लगता था कि पशु-पक्षियों को भी उतने ही स्नेह और दुलार की आवश्यकता है जितनी मनुष्यों को।
लोग उसका मज़ाक उड़ाते।
"मास्टर साहब का बेटा होकर चरवाहा बना फिरता है!"
"इतने बड़े घर का लड़का और काम देखो इसका!"
धीरे-धीरे शिबू ने भी स्वयं को दूसरों की दृष्टि से देखना शुरू कर दिया।
उसे लगने लगा कि शायद वह सचमुच निकम्मा है।
उसी गाँव में सुचित्रा मिश्रा रहती थी।
बचपन से वह शिबू को जानती थी।
जब लोग उसकी कमियाँ देखते थे, तब वह उसके गुणों को देखती थी।
उसने हाल ही में पीएचडी पूरी की थी। लेकिन उसका सपना शहर में नौकरी करना नहीं था।
वह गाँव लौट आई थी और किसानों के लिए दुग्ध सहकारी संस्था बनाने में जुटी थी।
धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे के निकट आने लगे।
एक दिन फागुन की संध्या बेला के बगीचे में दोनों बैठे थे।
कुछ देर मौन रहने के बाद सुचित्रा ने पूछा—
"शिबू, क्या तुम मुझसे विवाह करोगे?"
शिबू स्तब्ध रह गया।
जिसे पूरा संसार निकम्मा कहता हो, उसे कोई सम्मान और प्रेम भी दे सकता है—यह उसने कभी सोचा न था।
उसकी आँखें भर आईं।
वह धीमे स्वर में बोला—
"सुचित्रा, तारा चाहे कितना भी चमके, वह चाँद को रोशन नहीं कर सकता।"
"मैं टूटा हुआ तारा हूँ।"
"तुम्हें देने के लिए मेरे पास क्या है?"
सुचित्रा मुस्कुराई।
"मुझे पद नहीं चाहिए शिबू।"
"मुझे मनुष्य चाहिए।"
लेकिन उसी समय नियति ने करवट ली।
पंडित रामशंकर झा वहाँ पहुँच गए।
दोनों को साथ देखकर उनका चेहरा क्रोध से लाल हो उठा।
उन्होंने सुचित्रा से कहा—
"तुम्हारे लिए क्या योग्य लड़कों की कमी पड़ गई है?"
फिर शिबू की ओर मुड़कर बोले—
"मेरी इतनी बेइज्जती करने के बाद भी तेरा मन नहीं भरा?"
"मुझे तुझे जन्म देते ही मार देना चाहिए था।"
ये शब्द बाण बनकर शिबू के हृदय में उतर गए।
वह काँपती आवाज़ में बोला—
"ठीक है पिताजी।"
"यदि मेरा जन्म ही आपके लिए कलंक है, तो वचन देता हूँ—आज के बाद आपको अपना चेहरा नहीं दिखाऊँगा।"
और वह चला गया।
बिना पीछे मुड़े।
क्रमशः
Jayguru 🙏 🙏 🙏
वंदे पुरुषोत्तमम